विचार: अमेरिका के भरोसे न रहे भारत
देखा जाए तो प्रशांत क्षेत्र की संयुक्त सैन्य कमान को हिंद-प्रशांत कमान का नाम देना, क्वाड को सुदृढ़ बनाना और भारत को अमेरिका की हिंद-प्रशांत रणनीति के केंद्र में रखना न चीन को रास आ रहा था, न पाकिस्तान को।
HighLights
जी-7 में मोदी-ट्रंप मुलाकात, रिश्तों में दिखी असहजता।
अमेरिकी हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत का मुद्दा।
यूएस ने इंडो-पैसिफिक कमांड का नाम बदलकर पैसिफिक किया।
शिवकांत शर्मा। अपने बोतलबंद पानी और स्वास्थ्यवर्धक झरनों के लिए प्रसिद्ध फ्रांस के प्रमुख पर्यटन केंद्र एवियां-ले-बान में जी-7 की शिखर बैठक से अधिक उत्सुकता अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भारत के प्रधानमंत्री मोदी की बैठक को लेकर थी, जो 16 महीनों बाद हो रही थी। औपचारिक न होने के कारण इससे किसी निर्णय की उम्मीद तो नहीं थी, मगर यह अनुमान लगने की आशा अवश्य थी कि टैरिफ जंग छेड़ने के बाद से भारत के हितों और सम्मान को ठेस पहुंचाते आ रहे ट्रंप प्रशासन के फैसलों और बयानों का आपसी रिश्तों पर कितना असर पड़ा है और उनकी भावी दिशा क्या हो सकती है? बैठक से पहले दो-तीन ऐसी घटनाएं हुईं, जिनकी शिकायत करना भी अनिवार्य हो गया था।
इससे एक सप्ताह पहले ही अमेरिकी नौसेना ने ओमान की खाड़ी से गुजर रहे तेल टैंकर पर हमला करके तीन भारतीय नाविकों को मार डाला था। एक दिन पहले पेंटागन ने प्रशांत से लेकर हिंद महासागर तक फैले क्षेत्र में अमेरिकी सुरक्षा हितों को देखने वाली अपनी इंडो-पैसिफिक कमान के नाम से इंडो शब्द हटाते हुए उसका पुराना नाम पैसिफिक कमान रखने का एलान किया था। भारत के लिए इससे भी बड़ी चिंता का विषय वह मानचित्र था, जिसे यूएस पैसिफिक कमान के नए नामकरण के साथ दिखाया गया। इस मानचित्र में गुलाम कश्मीर को पाकिस्तान और अक्साई चिन को चीन के भाग के रूप में दिखाया गया है, जिसे भारत कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता।
ट्रंप के साथ बैठक के बाद प्रेस को दिए वक्तव्यों में पीएम मोदी ने विश्व भर में कार्यरत भारतीय नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की बात उठाई। उनका इशारा स्पष्ट रूप से अमेरिकी हमले में मारे गए तीन भारतीय नाविकों की तरफ था। ट्रंप इस पर पूछे गए सवाल को गोल कर गए। उन्होंने न तो भारतीय नाविकों की मौत पर खेद प्रकट किया और न ही भविष्य में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के बारे में कुछ कहा। उन्होंने व्यापार वार्ताओं में प्रगति की बात कही, पर व्यापार समझौता कब तक हो सकता है, इसका कोई संकेत नहीं दिया। भारत की यात्रा करने की बात कही, पर यह यात्रा कब होगी, इसका भी कोई संकेत नहीं दिया। अमेरिका में बसे और वहां जाने के इच्छुक प्रशिक्षित भारतीय सेवाकर्मियों के लिए खड़ी की जा रही मुश्किलों के सवाल पर वे केवल उनकी प्रतिभा की तारीफ करके रुक गए। वास्तव में ट्रंप ने दोनों देशों के संबंधों पर पूछे गए हर कठिन प्रश्न का उत्तर मोदी की तारीफ और उनके साथ अपनी घनिष्ठता की बातों से देने की कोशिश की।
ट्रंप की तारीफ और विनोद भरी बातों पर प्रधानमंत्री मोदी की खामोश मुस्कुराहट और हाथ मिलाने के अंदाज में पुरानी गर्मजोशी की जगह थोड़ी असहजता झलक रही थी। ऐसा लगा कि दोनों नेताओं के बीच बैठक में कुछ बेबाक बातें हुईं, जिनकी झेंप मिटाने के लिए तारीफों से माहौल खुशनुमा बनाने की कोशिश की जा रही थी। वैसे गत माह क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक में भाग लेने भारत आए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने यह भरोसा दिलाने की कोशिश की थी कि भारत अमेरिका के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारों में से एक है। वह क्वाड ही नहीं, बल्कि अमेरिका की समूचे हिंद-प्रशांत की रणनीति की आधारशिला है। वहीं, जब भारत ने अपने नाविकों की हत्या पर कड़ा विरोध दर्ज कराया तो रूबियो खेद प्रकट करने की जगह याद दिलाने लगे कि होर्मुज की अमेरिकी नाकेबंदी का उल्लंघन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अमेरिकी युद्ध मंत्री पीटर हेगसेथ तो रूबियो से भी दो कदम आगे बढ़ गए। उन्होंने अपनी संयुक्त सैनिक कमान के नाम से हिंद शब्द हटा दिया, जिसे 2018 में पिछली ट्रंप सरकार ने ही जोड़ा था। उस समय रक्षा मंत्री रहे जिम मैटिस ने इसके पीछे यह तर्क दिया था कि चीन के नौसैनिक विस्तार और उसकी बेल्ट एंड रोड परियोजनाओं को देखते हुए हिंद महासागर को रणनीतिक दृष्टि से प्रशांत महासागर से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
उस समय यह भी माना गया था कि अमेरिका के लिए भारत एशिया में शक्ति संतुलन से जुड़ी रणनीति की अनिवार्य धुरी बन चुका है। क्वाड के जरिये अमेरिका, भारत, जापान और आस्ट्रेलिया की साझा सामरिक रणनीति बनाने का उद्देश्य भी यही था, लेकिन वर्तमान ट्रंप सरकार के सत्ता में आने के बाद से गाड़ी उलटी दिशा में चलती नजर आती है। क्वाड की शिखर बैठक पिछले दो साल से नहीं हुई है। अमेरिका की नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के हिंद-प्रशांत अध्याय में भारत का उल्लेख न के बराबर हुआ है। गत मई की चीन यात्रा के बाद से ट्रंप ने अमेरिका और चीन की नई जोड़ी 'जी2' को विशेष महत्व देना शुरू कर दिया है। अपनी संभावित भारत यात्रा की बात करते समय भी वे जी-2 शिखर बैठक का जिक्र करने से नहीं चूके।
देखा जाए तो प्रशांत क्षेत्र की संयुक्त सैन्य कमान को हिंद-प्रशांत कमान का नाम देना, क्वाड को सुदृढ़ बनाना और भारत को अमेरिका की हिंद-प्रशांत रणनीति के केंद्र में रखना न चीन को रास आ रहा था, न पाकिस्तान को। यह देखते हुए कमान के नाम का पाकिस्तान की मध्यस्थता से हुई ईरान सहमति के बाद और मोदी-ट्रंप बैठक से ठीक पहले बदला जाना कुछ प्रश्न खड़े करता है। हालांकि ट्रंप और उनके मंत्री यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि हिंद-प्रशांत सैन्य कमान का नाम बदलने से अमेरिका की हिंद-प्रशांत रणनीति में कोई बदलाव नहीं आएगा, पर रणनीतिक विशेषज्ञों को संदेह है कि कहीं ट्रंप सरकार पाकिस्तान को उसकी मध्यस्थता का और चीन को संबंध बेहतर बनाने का इनाम देने की कोशिश तो नहीं कर रही है? क्वाड को लेकर अमेरिका की बढ़ती उदासीनता को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। शशि थरूर ने तो इसे क्वाड के ताबूत में कील की संज्ञा तक दे डाली। कुछ अमेरिकी कूटनयिकों का भी यही मानना है कि अमेरिका अब अपनी एशिया-प्रशांत रणनीति के विकल्प खुले रखना चाहता है, ताकि जरूरत पड़ने पर पाकिस्तान का पश्चिम और मध्य एशिया में प्रयोग कर सके। ऐसे में भारत को भी अपनी रणनीति के विकल्प खुले रखते हुए नए समीकरण बनाने होंगे।
(लेखक बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक हैं)












