विचार: जन विश्वास से सुगम होता जीवन
बदलाव सिर्फ दृष्टिकोण में आया है। शासन अब संदेह से विश्वास, अभियोजन से सुधार और भय से स्वतंत्रता की ओर बढ़ रहा है।
HighLights
जन विश्वास अधिनियम 79 कानूनों के 784 प्रावधानों को संशोधित करता है।
मामूली अपराधों को गैर-आपराधिक बनाकर नागरिकों के लिए जीवन सुगम बनाता है।
न्यायिक बोझ कम कर भारत में विदेशी निवेश को बढ़ावा देता है।
पीयूष गोयल। भारत की नियामकीय प्रणाली हमेशा दुविधा की मानसिकता के साथ काम करती थी और अक्सर छोटी प्रक्रियागत त्रुटियों या केवल आरोपों के कारण नागरिकों को कड़े दुष्परिणाम भुगतने पड़ते थे। मोदी सरकार ने प्रत्येक नागरिक के लिए विश्वास, सहानुभूति और सम्मान में निहित शासन को बढ़ावा देते हुए एक महत्वपूर्ण बदलाव की शुरुआत की है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नागरिकों और व्यवसायों का समर्थन करने, अनुपालन को सरल बनाने और व्यवसायों के समक्ष व्यावहारिक कठिनाइयों का संज्ञान लेते हुए भारत के कानूनी परिदृश्य में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। चाहे अनुपालन बोझ घटाना हो, डिजिटलीकरण बढ़ाना हो, या एकल-खिड़की मंजूरी हो, कुल मिलाकर बदलाव का मकसद शासन को अधिक तर्कसंगत और कुशल बनाना रहा है।
प्रधानमंत्री का विश्वास और सहानुभूति पर आधारित शासन का मंत्र स्पष्ट रूप से जन विश्वास अधिनियम, 2026 और 2023 के इसी तरह के एक कानून में दिखाई देता है। नागरिक-अनुकूल नियामकीय परिवेश बनाने और अनुपालन को प्रोत्साहित करने के लिए नया कानून मामूली अपराधों से निपटने के लिए स्पष्ट सिद्धांत अपनाता है: दंड से पहले चेतावनी देना, अपराध की गंभीरता के अनुसार जुर्माना तय करना, त्वरित एवं पारदर्शी समाधान और जुर्माने का एक गतिशील ढांचा, जिसमें समय-समय पर संशोधन होता हो, ताकि नियम लागू करने का तरीका प्रभावी, प्रासंगिक और समय के साथ उत्तरदायी बना रहे। यह दृष्टिकोण, अनुपालन और प्रवर्तन के तरीके में एक बड़ा बदलाव है, जो प्रधानमंत्री के इस दृष्टिकोण के अनुरूप है कि 21वीं सदी के भारत की आकांक्षाएं औपनिवेशिक शासन के पुराने तरीकों के माध्यम से पूरी नहीं हो सकतीं।
इस सुधार का पैमाना अभूतपूर्व है। जन विश्वास अधिनियम 23 मंत्रालयों के 79 केंद्रीय कानूनों से जुड़े 784 प्रविधानों को संशोधित करता है। यह लोगों के जीवन को सुगम बनाने के लिए 717 प्रविधानों को अपराधमुक्त करता है और 67 प्रविधानों को तर्कसंगत बनाता है। यह स्वतंत्र भारत के विधायी इतिहास में सबसे बड़ी अपराधमुक्ति पहल है। यह 1,000 से अधिक अपराधों को तर्कसंगत बनाता है। पुराने अप्रचलित अपराधों को समाप्त कर आपराधिक न्यायालयों के बाहर निर्णय और अपील की व्यवस्था को मजबूत करता है। पूर्व की व्यवस्था में किसी घर, इमारत या वाहन में सूर्यास्त और सूर्योदय के बीच उपस्थिति को लेकर संतोषजनक जवाब न देने पर किसी व्यक्ति को तीन महीने तक की जेल हो सकती थी।
औपनिवेशिक काल में सामान्य आवाजाही की संदेह की दृष्टि से देखे जाने वाले इस प्रविधान को समाप्त कर दिया गया है। पहले किसी के ड्राइविंग लाइसेंस की समयसीमा समाप्त होने के तुरंत बाद गाड़ी चलाते पकड़े जाने पर उसे अपराध की दृष्टि से देखा जाता था। नए कानून में इस मोर्चे पर 30 दिन की छूट अवधि दी गई है। इसी क्रम में अप्रेंटिसशिप अधिनियम के तहत पंजीकरण का विवरण अद्यतन न कर पाना पहले आपराधिक कृत्य था, पर अब केवल नियमों की बार-बार अवहेलना पर ही सख्त कार्रवाई होगी। पहले किसी खनन कंपनी की दस्तावेजीकरण प्रक्रिया में चूक के कारण जेल तक हो सकती थी, लेकिन अब जुर्माना ही पर्याप्त है।
इस संदर्भ में जन विश्वास कानून वस्तुत: समस्त नागरिकों के जीवन को सुगम बनाने के पीएम मोदी के प्रयासों का ही प्रतीक है। प्रधानमंत्री के तौर पर देश-सेवा के 12 वर्षों में और उससे पहले गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर यह उनका प्रमुख मिशन रहा है। जन विश्वास, 2026 एक महत्वपूर्ण स्तंभ पर आधारित है। भारत ने 2023 में पहले जन विश्वास अधिनियम के माध्यम से 42 अधिनियमों के 183 प्रविधानों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था। इस प्रयास ने दिखाया कि नियमों को लागू करने की प्रक्रिया को कमजोर किए बिना गैर-अपराधीकरण से शासन में सुधार संभव है।
2026 का कानून इस प्रक्रिया को लगभग चार गुना बढ़ाता है, जो यह संकेत है कि यह कोई एक बार की गई पहल नहीं है, बल्कि सुधार की दिशा में निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। समग्रता में देखें तो कम गंभीरता वाले आपराधिक प्रविधानों की जगह प्रशासनिक और मौद्रिक व्यवस्थाएं लाना, न सिर्फ आम नागरिक के लिए स्वागतयोग्य है, बल्कि छोटे व्यवसायों की भी मदद करता है। इससे प्रवर्तन एजेंसियां भी रोजमर्रा की तकनीकी गलतियों के बजाय गंभीर उल्लंघनों पर ध्यान केंद्रित कर सकती हैं। वहीं, अदालतें उन मामलों पर ध्यान दे सकती हैं, जिनमें सचमुच न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता है।
नियमों में सुगमता के लाभ अर्थव्यवस्था और निवेश के मोर्चे पर भी मिलते हैं। तेजी से प्रतिस्पर्धी होती वैश्विक अर्थव्यवस्था में नियमों की विश्वसनीयता बहुत मायने रखती है। वर्षों तक मामूली गलतियों के लिए कानूनी शिकंजे का डर निवेश की राह में बड़ा अवरोध बना हुआ था, लेकिन अब नियमों को सुगम बनाने का परिणाम निवेश रुझानों में स्पष्ट दिखता है। देश में 2014 से 2025 के बीच प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) में 143 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो सिलसिला निरंतर तेज हो रहा है। स्पष्ट है कि इन कदमों का उद्देश्य भारत को निवेश और कारोबार के लिए अधिक भरोसेमंद और स्थायित्व से परिपूर्ण गंतव्य बनाकर इस रुझान को और गति प्रदान करना है।
ऐसे सुधारों से न्यायिक प्रणाली को भी राहत मिलेगी। देश की विभिन्न अदालतों में लगभग 5.5 करोड़ मुकदमे लंबित हैं और इनमें एक बड़ी संख्या छोटे-मोटे उल्लंघनों की है, जिन्हें अब अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया है। ऐसे मामलों को प्रशासनिक निर्णय के लिए भेजना सिर्फ एक कारोबारी सुधार नहीं, बल्कि न्यायिक सुधार भी है। इससे अदालतों को अपने सीमित समय और संसाधनों को गंभीर विवादों और न्याय से जुड़े अहम सवालों पर केंद्रित करने का मौका मिलता है। इस बीच यह न भूला जाए कि गंभीर उल्लंघनों के लिए सख्त कार्रवाई जारी रहेगी। जहां सख्ती जरूरी है, वहां कानून पूरी तरह सख्त बना रहेगा। बदलाव सिर्फ दृष्टिकोण में आया है। शासन अब संदेह से विश्वास, अभियोजन से सुधार और भय से स्वतंत्रता की ओर बढ़ रहा है।
(लेखक केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री हैं)












