जागरण संपादकीय: लापरवाही की आग
लापरवाही की यह आग केवल लोगों की जिंदगियां ही नहीं लील रही, बल्कि देश की बदनामी भी करा रही है।
HighLights
लखनऊ में कोचिंग सेंटर में आग से 15 छात्रों की मौत।
अग्नि सुरक्षा उपायों की अनदेखी और सरकारी एजेंसियों की लापरवाही।
दिल्ली अग्निकांड के बाद भी नहीं सुधरे हालात, जवाबदेही का अभाव।
बहुत दिन नहीं हुए, जब देश की राजधानी में अवैध रूप से बनाए और संचालित किए जा रहे होटल में आग लगने से 20 से अधिक लोग मारे गए थे। माना गया था कि इस दिल दहलाने वाली घटना से सीख ली गई होगी और कम से कम देश के प्रमुख शहरों में सभी व्यावसायिक इमारतों में आग से बचाव के उपायों की जांच-परख की गई होगी, लेकिन उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक व्यावसायिक इमारत में आग लगने की घटना से पता चलता है कि ऐसा नहीं किया गया। इस घटना में इस इमारत में चल रहे एक कोचिंग सेंटर के 15 से अधिक छात्रों की जान चली गई।
इस घटना पर राज्य सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि आग लगने के कारणों की गहन जांच की जाएगी और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा, लेकिन हर बार ऐसा ही तो होता है। जब भी किसी अग्निकांड में बड़ी संख्या में लोग मारे जाते हैं तो कुछ दिन तक शासन-प्रशासन की संवेदना, सजगता और सक्रियता दिखती है, लेकिन फिर सब कुछ पहले की तरह हो जाता है। ऐसी अधिकतर घटनाओं में आम तौर पर यही सामने आता है कि संबंधित इमारत में या तो आग से बचाव के पर्याप्त उपाय नहीं थे या वे काम नहीं कर रहे थे।
आग लगने की कई घटनाओं में यह भी सामने आता है कि बड़ी-बड़ी इमारतों में हर तरह की गतिविधियां अग्निशमन विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र लिए बिना ही शुरू हो जाती हैं। यह भी किसी से छिपा नहीं कि यदि आग लगने की घटनाओं की जांच रपट समय रहते आ भी जाती है तो ठोस कार्रवाई नहीं होती। कई घटनाओं में इस कारण भवन स्वामी की तो गिरफ्तारी हो जाती है कि उसने आग से बचाव के पर्याप्त प्रबंध नहीं कर रखे थे, पर सरकारी एजेंसियों के वे अधिकारी-कर्मचारी कठिनाई से ही किसी कठोर कार्रवाई के दायरे में आते हैं, जिन पर यह देखने की जिम्मेदारी होती है कि प्रत्येक इमारत में आग से बचाव के प्रभावी उपाय हों।
लखनऊ की दर्दनाक घटना पर अभी यह सामने आना शेष है कि आग ने इतना विकराल रूप क्यों ले लिया और उसमें फंसे लोगों को सुरक्षित निकालने में वांछित सफलता क्यों नहीं मिली, लेकिन इसमें तो कोई संशय ही नहीं कि कहीं न कहीं लापरवाही बरती गई। हादसे कहीं भी हो सकते हैं, पर वे तब बड़ी जनहानि का कारण बनते हैं, जब सुरक्षा उपायों की अनदेखी एक तरह की अंधेरगर्दी में बदल जाती है।
लापरवाही की यह आग केवल लोगों की जिंदगियां ही नहीं लील रही, बल्कि देश की बदनामी भी करा रही है। दिल्ली और लखनऊ जैसी घटनाएं यही बताती हैं कि अपने यहां प्रमुख शहरों में भी सार्वजनिक सुरक्षा एक तरह से भगवान भरोसे है। हम विकसित देश बनने के तो आकांक्षी हैं, लेकिन उन जैसे तौर-तरीके अपनाने के लिए तत्पर नहीं। हमें प्रायः ही इसकी बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ती है।












