प्रो. गौरव वल्लभ। भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां चुनौतियां भी हैं और अवसर भी। एक ओर खुदरा महंगाई दर रिजर्व बैंक के लक्ष्य से नीचे बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर थोक महंगाई में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। हाल के भू-राजनीतिक तनावों में कमी के बाद रुपया फिर मजबूती की ओर बढ़ा है, देश का विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत है और भारत सबसे तेजी से बढ़ती हुई बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है। यह तस्वीर आश्वस्त करने वाली है, पर इसके भीतर कुछ ऐसे संकेत भी छिपे हैं, जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता। सबसे महत्वपूर्ण संकेत थोक और खुदरा महंगाई के बीच बढ़ता अंतर है। हाल में थोक महंगाई तेजी से बढ़ी है, जबकि खुदरा महंगाई अपेक्षाकृत नियंत्रित रही है। यह स्थिति लंबे समय तक नहीं रहती। उत्पादन लागत में होने वाली वृद्धि का बोझ अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंचता ही है। इसलिए आज जो दबाव उद्योगों और उत्पादकों पर दिखाई दे रहा है, उसका असर आने वाले समय में आम उपभोक्ता की जेब पर भी पड़ सकता है।

थोक महंगाई मुख्यतः उन लागतों को दर्शाती है, जिनका सामना उत्पादकों को करना पड़ता है। जब ऊर्जा, परिवहन, आयातित कच्चे माल और विनिर्माण की लागत बढ़ती है, तब कंपनियां शुरुआत में अपने मुनाफे में कटौती करके कुछ बोझ स्वयं वहन करती हैं, पर यदि लागत का दबाव बना रहता है तो अंततः कीमतों में वृद्धि करनी पड़ती है। थोक महंगाई में हाल की तेजी को केवल एक अस्थायी घटना मानना उचित नहीं होगा। इस बढ़ोतरी का एक बड़ा कारण ऊर्जा लागत है। वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता का सीधा असर हमारी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ईंधन और बिजली की ऊंची कीमतों ने उत्पादन लागत को बढ़ाया है। सकारात्मक पक्ष यह है कि पश्चिम एशिया में तनाव कम होने से वैश्विक तेल कीमतों में नरमी आई है। भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए यह राहत के साथ एक महत्वपूर्ण रणनीतिक अवसर भी है।

अक्सर कम तेल कीमतों को अतिरिक्त खर्च करने का अवसर समझ लिया जाता है, पर यह दृष्टिकोण दूरदर्शी नहीं होगा। बाजारों के उतार-चढ़ाव स्थायी नहीं होते। समझदारी इसी में है कि अनुकूल परिस्थितियों का उपयोग आर्थिक बुनियाद को मजबूत करने में किया जाए। सबसे पहले घटी तेल कीमतों से होने वाले लाभ का उपयोग बाहरी क्षेत्र की मजबूती के लिए किया जाना चाहिए। जब तेल आयात बिल घटता है तो चालू खाते का संतुलन बेहतर होता है। इस अवसर का उपयोग विदेशी मुद्रा भंडार को और मजबूत करने में किया जा सकता है। मजबूत भंडार केवल आर्थिक शक्ति का प्रतीक नहीं होते, बल्कि भविष्य के वैश्विक झटकों के खिलाफ सुरक्षा कवच भी प्रदान करते हैं।

दूसरा, यह ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ने का उपयुक्त समय है। पिछले एक दशक में भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए कई बड़े कदम उठाए हैं। सौर ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिक वाहनों में प्रत्येक नई प्रगति भारत की आयातित ऊर्जा पर निर्भरता को कम करेगी। यह पर्यावरण संरक्षण संग आर्थिक सुरक्षा का भी प्रश्न है। तीसरा, कम ऊर्जा लागत भारत के निर्यात क्षेत्र के लिए भी अवसर लेकर आई है। ढुलाई खर्च घटने से भारतीय उत्पाद वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकते हैं। लक्ष्य निर्यात बढ़ाने के साथ वैश्विक बाजार में हिस्सेदारी को स्थायी रूप से मजबूत करना होना चाहिए।

यह समय ऊर्जा आधारित विनिर्माण क्षेत्रों में निवेश आकर्षित करने के भी अनुकूल है। बेहतर अवसंरचना, विशाल घरेलू बाजार, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाएं और अपेक्षाकृत कम ऊर्जा लागत भारत को वैश्विक निवेशकों के लिए आकर्षक विकल्प बनाती हैं। यदि नीतिगत स्थिरता और सुधारों की गति बनी रहती है तो भारत वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में अपनी भूमिका और मजबूत कर सकता है। हालांकि इन अवसरों का पूरा लाभ तभी मिलेगा, जब वित्तीय अनुशासन कायम रहे। तेल कीमतों में गिरावट के समय सरकारों पर अतिरिक्त खर्च बढ़ाने का दबाव बनता है, पर दीर्घकालिक आर्थिक हित इसी में हैं कि इस बचत का उपयोग पूंजीगत निवेश बढ़ाने, राजकोषीय घाटा कम करने और रणनीतिक भंडार निर्माण में किया जाए। हाल के वर्षों में भारत ने राजकोषीय विश्वसनीयता को अपनी एक बड़ी ताकत बनाया है। इससे निवेशकों का भरोसा बढ़ा है, उधारी की लागत कम हुई है और रुपये को स्थिरता मिली है। इस उपलब्धि को बनाए रखना महत्वपूर्ण है।

हमारी आर्थिकी अभी भी मानसून जैसे कारकों के प्रति संवेदनशील है। यदि वर्षा कम हुई तो खाद्य महंगाई बढ़ सकती है। इसलिए खाद्यान्न भंडार और आपूर्ति शृंखलाओं को मजबूत बनाए रखना आवश्यक है। वास्तविक आर्थिक नेतृत्व की पहचान संकट के बाद प्रतिक्रिया देने में नहीं, बल्कि संकट आने से पहले तैयारी करने में होती है। तेल की कीमतें फिर बढ़ सकती हैं, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं फिर बाधित हो सकती हैं और पूंजी प्रवाह अधिक अस्थिर हो सकता है। महान राष्ट्र केवल संकटों का सामना करके नहीं, बल्कि अवसरों का सही उपयोग करके आगे बढ़ते हैं। आज भारत के सामने ऐसा ही एक अवसर है।

(लेखक प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य हैं)