विकास सारस्वत। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आम बजट में उच्च शिक्षा आवंटन को 11 प्रतिशत बढ़ाकर 55,727 करोड़ कर दिया है। इसके साथ ही प्रमुख औद्योगिक गलियारों में पांच विश्वविद्यालय टाउनशिप स्थापित कर शैक्षणिक क्षेत्रों को अनुसंधान और उद्योग के साथ एकीकृत करने का प्रस्ताव है। जहां चीन जैसे देश का उच्च शिक्षा बजट भारत से छह गुना अधिक है, वहां यह उतना पर्याप्त तो प्रतीत नहीं होता, किंतु यह सराहनीय है कि इस मोर्चे पर एक पहल तो हुई है। हालांकि आवंटन से परे चिंता की बात यह है कि सरकार विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक परिवेश को लेकर कितनी गंभीर है।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी के कुछ नियमों ने बीते दिनों समाज के कुछ वर्गों में असंतोष बढ़ाने का काम किया। घोषित रूप से ये नियम शिक्षण संस्थानों में अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ी जाति एवं महिला उत्पीड़न को रोकने के लिए बनाए गए थे, परंतु सामान्य वर्ग को इन नियमों के दुरुपयोग का भय था, क्योंकि निगरानी टीमों में सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व की स्पष्ट बात नहीं थी और झूठी शिकायतों पर कार्रवाई का प्रविधान भी नहीं था। इनके दुरुपयोग की आशंका अकारण नहीं थी। एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग के कई मामले सामने आते रहे हैं।

जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न भारतीय समाज का दुखद पहलू रहा है और आज भी कई क्षेत्रों में इससे मुक्ति नहीं मिली है, परंतु शैक्षणिक संस्थानों में शायद यह समस्या उतनी बड़ी नहीं है। वहां तो विभिन्न पृष्ठभूमियों से आए युवाओं के बीच आजीवन चलने वाली मित्रता बनती हैं। आंकड़े देखे जाएं तो 2023-24 में 3,000 शिक्षा संस्थानों से 378 ऐसी शिकायत मिली थीं। ऐसे में गंभीर मामलों में पहले से मौजूद कानूनी प्रविधानों के तहत कार्रवाई हो सकती थी और नए विद्यार्थियों को ओरिएंटेशन आदि से संवेदनशील बनाया जा सकता है। फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय ने इन नियमों को स्थगित कर दिया है, परंतु सवाल सरकार की बुद्धिमत्ता पर उठता है, जो उच्च शिक्षा के स्तर को सुधारने के बजाय विश्वविद्यालयों को सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष का मैदान बनाए दे रही है।

पश्चिम में यूनिवर्सिटी कैंपसों को संघर्ष एवं क्रांति का मैदान बनाने की कवायद तब से जारी है, जब से मार्क्सवादियों का विश्वास उस सर्वहारा क्रांति से उठा, जिसमें मजदूर वर्ग पूंजीवादी व्यवस्था को उखाड़ सत्ता पर नियंत्रण करता। इसके बाद सांस्कृतिक मार्क्सवाद की परिवर्तित अवधारणा ने क्रांति की उम्मीद जातीय, नस्लीय, मजहबी एवं लैंगिक अल्पसंख्यकों की गोलबंदी और उग्र फेमिनिज्म एवं पर्यावरण आदि आंदोलनों को जोड़कर बनाई। फ्रैंकफर्ट विश्वविद्यालय में इंस्टीट्यूट फार सोशल रिसर्च नामक संस्थान में प्रथम विश्व युद्ध के बाद इन नव-मार्क्सवादी विचारों का जन्म हुआ, लेकिन नाजी शासन में यह संस्थान अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय में स्थानांतरित हो गया।

अमेरिका के शीर्ष शिक्षण संस्थानों में पैर जमा चुके नव-वामपंथियों ने विश्वविद्यालयों को जब अपना युद्धक्षेत्र बनाया, तब इसमें कुछ भी दबी-छिपी बात नहीं थी। फ्रैंकफर्ट स्कूल के अतिवादी विचारक हर्बर्ट मारक्यूज ने उच्च शिक्षा संस्थानों के माध्यम से क्रांतिकारी चेतना के प्रसार की वकालत की। इसी विचार के हिमायती रूडी डुट्सके ने “लांग मार्च थ्रू द इंस्टीट्यूशंस” नामक प्रस्ताव रखा। इन अतिवादी विचारों ने अमेरिकी अकादमिक परिदृश्य को इस कदर बदला कि विश्वविद्यालयों में पारंपरिक सिद्धांतों के पठन-पाठन के लिए कोई जगह नहीं है। उनमें वामपंथी विचारों को ही परोसा जा रहा है। समाज का विश्लेषण नस्लीय सामूहिक पहचानों के माध्यम से करने वाली क्रिटिकल रेस थ्योरी हर पहलू को उत्पीड़क और पीड़ित वर्गों में बांट कर करती है।

अमेरिका के सबसे बड़े शिक्षक संघ नेशनल एजुकेशन एसोसिएशन ने दावा किया था कि अमेरिका में होने वाली सैट परीक्षा में अश्वेतों के उत्तीर्ण होने की दर इसलिए खराब है, क्योंकि प्रश्नपत्र श्वेत प्राध्यापक तय करते हैं। राहुल गांधी ने इसी बेतुकी बात को आधार बनाकर कहा कि जेईई परीक्षा में दलित परीक्षार्थियों के कम अंक आने का कारण “उच्च जाति” के प्राध्यापकों द्वारा प्रश्न पत्र तय करना है। इसी तरह अमेरिकी संस्था “द सेंटेंसिंग प्रोजेक्ट” समेत अन्य बुद्धिजीवियों ने जेलों में अश्वेत कैदियों की बड़ी संख्या का दोषी श्वेत लोगों द्वारा बनाए गए कानून और न्याय व्यवस्था को बताया। भारत में इसी प्रतिरूप को परिवर्तित कर मुस्लिमों के बड़ी संख्या में जेलों में होने के लिए बहुसंख्यक राजनीति को जिम्मेदार ठहराया जाता है और इस बाबत कई विपक्षी सांसदों ने लगातार प्रश्न उठाए हैं। कई मुस्लिमों ने इन आंकड़ों को मुसलमानों के उत्पीड़न के प्रमाण के रूप में पेश किया है। ऐसा ही आरोप दिल्ली दंगों के आरोपित शरजील इमाम ने भी लगाया था।

आज उच्च शिक्षा के भारतीय संस्थानों की रैंकिंग भी निरंतर गिरती जा रही है। नवीनतम क्यूएस रैंकिंग में मलेशिया का प्रदर्शन भी भारत से बेहतर है।
जेएनयू में ब्राह्मणों के प्रति हिंसात्मक नारे लग रहे हैं। आइआइटी दिल्ली जैसे संस्थानों में “हिंदू विहीन भारत की कल्पना” जैसे विषयों पर गोष्ठी आयोजित हो रही हैं। दिल्ली दंगों में जेएनयू और जामिया के कई छात्र आरोपित बनाए गए थे। दो माह पहले जिस विश्वविद्यालय के डाक्टरों ने लाल किले पर बम ब्लास्ट किया था, उस अल फलाह की 2018 से मान्यता समाप्त थी और कोई देखने वाला नहीं था। दूसरी तरफ गिरते शैक्षणिक स्तर और कैंपसों में व्याप्त अराजकता से बेपरवाह यूजीसी जाति-जाति खेलने में लग गई। दुख की बात यह है कि एक राष्ट्रवादी सरकार ने नव-मार्क्सवादी एजेंडे के सामने उस समय घुटने टेके, जब दुनिया प्रौद्योगिकी, विशेषकर एआइ की उत्तरोत्तर होती प्रगति के कारण युग परिवर्तन के पड़ाव पर खड़ी है। ऐसा एजेंडा न केवल समाज के विभिन्न वर्गों में अविश्वास की खाई बढ़ाएगा, बल्कि विकसित भारत की लक्ष्यपूर्ति में भी बाधा बनेगा।

(लेखक इंडिक अकादमी के सदस्य एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)