विचार: फिर दोराहे पर खड़ा बांग्लादेश
लंदन में 17 वर्षों के निर्वासन के बाद खालिदा जिया के पुत्र तारिक रहमान ने बीएनपी की कमान संभाली है। पिछले साल 25 दिसंबर को उनकी बांग्लादेश वापसी के दौरान उमड़ी भीड़ से स्पष्ट हुआ कि 2024 के आंदोलन का राजनीतिक लाभ बीएनपी को मिला है और आगामी चुनावों में उससे काफी उम्मीदें हैं।
HighLights
अवामी लीग की अनुपस्थिति, नए राजनीतिक समीकरणों में चुनाव।
जुलाई 2024 आंदोलन के बाद युवा वर्ग की भूमिका महत्वपूर्ण।
बीएनपी, जमात, एनसीपी का उदय; धर्मनिरपेक्षता, भारत संबंध प्रभावित।
ऋषि गुप्ता। बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने जा रहे आम चुनावों के लिए सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी कमर कस चुके हैं। चुनावी परिणाम ही नए बांग्लादेश की दिशा निर्धारित करेंगे। इस बार अवामी लीग प्रतिबंध के कारण चुनाव से बाहर है, लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना फिर भी चुनावी विमर्श का प्रमुख मुद्दा बनी हुई हैं। पिछले तीन दशकों में यह पहला अवसर है, जब बांग्लादेश की ‘दो बेगमों’-अवामी लीग की शेख हसीना और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की खालिदा जिया चुनावी मैदान में नहीं हैं।
ऐसे में यह चुनाव नए राजनीतिक समीकरणों के बीच लड़ा जा रहा है। 13वें संसदीय चुनाव में युवाओं की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि 2024 में जुलाई में शेख हसीना के खिलाफ हुए आंदोलन और उनके इस्तीफे में यही वर्ग सबसे आगे रहा। वर्तमान में 18-35 आयु वर्ग की आबादी लगभग 30 प्रतिशत है, जो आधुनिक तकनीक और सोशल मीडिया से लैस है और जुलाई आंदोलन का प्रमुख प्रतिनिधि मानी जाती है। सवाल यह है कि क्या यह युवा वर्ग छात्र आंदोलन से उभरी जातीय नागरिक पार्टी यानी नेशनल सिटिजंस पार्टी (एनसीपी) को समर्थन देगा या पारंपरिक दल अपने प्रशासनिक अनुभव और संगठनात्मक मजबूती के बल पर फिर सत्ता में लौटेंगे?
लंदन में 17 वर्षों के निर्वासन के बाद खालिदा जिया के पुत्र तारिक रहमान ने बीएनपी की कमान संभाली है। पिछले साल 25 दिसंबर को उनकी बांग्लादेश वापसी के दौरान उमड़ी भीड़ से स्पष्ट हुआ कि 2024 के आंदोलन का राजनीतिक लाभ बीएनपी को मिला है और आगामी चुनावों में उससे काफी उम्मीदें हैं। ढाका पहुंचने पर तारिक रहमान ने कहा, ‘आइ हैव ए प्लान यानी मेरे पास बांग्लादेश के विकास की योजना है।’
इसी आधार पर पार्टी ने अपने घोषणा पत्र सबसे पहले राष्ट्रीय बदलाव, सामाजिक समानता, आर्थिक स्थिरता, क्षेत्रीय विकास और धार्मिक सौहार्द जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी है। बांग्लादेश के चुनावी इतिहास में मुद्दों से अधिक पार्टी और नेतृत्व का प्रभाव रहा है और तारिक रहमान ने पिछले डेढ़ वर्षों में इसी दिशा में काम किया है। विदेश में रहते हुए भी वे आनलाइन माध्यम से पार्टी से जुड़े रहे। चुनावी गणित के लिहाज से बीएनपी इस समय एक मजबूत पार्टी मानी जा रही है, जिसे अवामी लीग की अनुपस्थिति का भी लाभ मिल सकता है। हालांकि बीएनपी मजहबी ध्रुवीकरण से बचते हुए अल्पसंख्यक और अवामी लीग समर्थक वोटों को आकर्षित करने की कोशिश कर रही है।
जमात-ए-इस्लामी पहली बार खुलकर नेतृत्व की राजनीति में सामने आई है। 1971 के मुक्ति आंदोलन में पाकिस्तान का साथ देने के कारण यह संगठन लंबे समय तक विवादों में रहा। शेख हसीना के दो दशकों के शासन में इसके कई नेता जेल में रहे या भूमिगत हो गए थे, लेकिन उनकी सरकार के पतन के बाद जमात फिर सक्रिय हुई और उसका नेतृत्व सामने आया, जिसमें प्रमुख अमीर शफीकुर रहमान शामिल हैं। अवामी लीग की अनुपस्थिति ने जमात को अलग राजनीतिक पहचान दी है और अपने मजहबी आधार के सहारे वह चुनावी मैदान में उतरी है। हालांकि जमात के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। उसकी कट्टरपंथी छवि, महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण और संविधान को इस्लामी स्वरूप देने की कोशिशें चिंता का विषय हैं।
बांग्लादेश की स्थापना उदारवाद, धार्मिक सद्भाव और महिलाओं की सक्रिय भूमिका के आधार पर हुई थी। ऐसे में यदि जमात सत्ता में आती है, तो पंथनिरपेक्षता के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लग सकते हैं। हाल में शफीकुर रहमान के एक साक्षात्कार में महिलाओं को पार्टी में प्रतिनिधित्व न देने की बात भी चिंता बढ़ाती है। जुलाई आंदोलन के कारण युवाओं की भूमिका इस चुनाव में अहम मानी जा रही है। छात्र नेता नाहिद इस्लाम ने फरवरी 2025 में एनसीपी की स्थापना कर चुनावी राजनीति में प्रवेश किया।
हालांकि छात्र आंदोलन का नेतृत्व चुनावी सफलता की गारंटी नहीं होता। एनसीपी ने ढाका और जहांगीरनगर विश्वविद्यालय के छात्र चुनावों में भाग नहीं लिया, जिससे उसकी संगठनात्मक मजबूती पर सवाल उठे। इसके विपरीत, जमात के छात्र संगठन इस्लामी छात्र शिबिर की जीत ने उसकी जमीनी पकड़ को दर्शाया। एनसीपी का जमात के साथ गठबंधन उसकी राजनीतिक अनिश्चितता और अवसरवाद को भी दर्शाता है। अब यह देखना होगा कि युवा, विशेषकर महिलाएं इस गठबंधन को कितना स्वीकार करती हैं।
आंतरिक मुद्दों के बीच बीएनपी, जमात और एनसीपी, तीनों ने भारत के साथ संबंधों पर अलग-अलग रुख अपनाया है। बीएनपी और जमात ने विदेश नीति पर अपेक्षाकृत संयम बरता है, जबकि एनसीपी ने अंतरराष्ट्रीय नदियों के जल बंटवारे, शेख हसीना की वापसी और असमान द्विपक्षीय समझौतों जैसे मुद्दों पर कड़ा रुख अपनाने की बात कही है। पारंपरिक दलों की चुप्पी को विवाद से बचने की रणनीति माना जा सकता है।
बांग्लादेश कई बार राजनीतिक उथल-पुथल से गुजरा है, लेकिन उसका राजनीतिक ढांचा कायम रहा है। यदि इस चुनाव में जमात सत्ता में आती है, तो न केवल आंतरिक राजनीति, बल्कि विदेश नीति में भी मजहबी प्रभाव बढ़ सकता है, जो भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय बन सकता है।
(लेखक एशिया सोसायटी पालिसी इंस्टीट्यूट, दिल्ली के सहायक निदेशक हैं)
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