विचार: राष्ट्रीय मिशन बने महाशक्ति बनना
भारत के पास चीन और ब्राजील के बाद दुर्लभ खनिजों का विश्व का तीसरा सबसे बड़ा भंडार है, जबकि अमेरिका इस मामले में विश्व में सातवें नंबर पर है। ट्रंप साम-दाम-दंड-भेद का प्रयोग कर ग्रीनलैंड पर कब्जे के प्रयास में इसलिए जुटे, क्योंकि ग्रीनलैंड के पास विश्व का आठवां सबसे बड़ा दुर्लभ खनिजों का भंडार है।
HighLights
भारतीय कंपनियां तकनीक के लिए विदेशी निर्भरता दिखाती हैं।
दुर्लभ खनिजों में आत्मनिर्भरता हेतु राष्ट्रीय मिशन आवश्यक।
स्वदेशी लड़ाकू विमान, इंजन विकास में गति लानी होगी।
दिव्य कुमार सोती। कुछ समय पहले भारी मुनाफा कमाने वाली एक भारतीय कंपनी ने एक छोटी सी चीनी कंपनी से सौर ऊर्जा से जुड़ी तकनीक खरीदनी चाही, परंतु उसने देने से मना कर दिया। यह तब हुआ, जब भारत अंतरराष्ट्रीय सोलर एलायंस का संस्थापक है। भारत ने फ्रांस के साथ इस अंतरराष्ट्रीय संगठन की स्थापना 2015 में की थी। यह अपनी तरह का पहला बड़ा संगठन है, जिसका मुख्यालय भारत में स्थित है। इसका उद्देश्य 125 सदस्य देशों के साथ मिलकर 2030 तक सौर ऊर्जा उत्पादन में एक ट्रिलियन डॉलर का निवेश और 1000 गीगावाट सौर ऊर्जा का उत्पादन है। चीन को कई बार इसमें शामिल होने का न्योता दिया गया, पर उसने स्वीकार नहीं किया।
विडंबना यह है कि ऐसे अंतरराष्ट्रीय संगठन के अगुआ भारत की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक को चीन की छोटी सी कंपनी के पास ही सौर ऊर्जा से जुड़ी तकनीक मांगने जाना पड़ा। इसका कारण यह है कि हजारों करोड़ रुपये प्रति तिमाही का मुनाफा कमा रही भारतीय कंपनियां भी नई तकनीक के अनुसंधान में भारत में निवेश नहीं करना चाहती हैं। वे खुदरा माल-सेवाओं के आपूर्तिकर्ता मात्र के रूप में अपने व्यापार का विस्तार कर रही हैं और टेक्नोलाजी के लिए दूसरे देशों पर निर्भर हैं। इसी कमजोरी के चलते हम विश्व स्तर पर नेतृत्व देने में अक्षम हैं। विश्व शक्तियां हमें अक्षम ही बने रहने देना चाहती हैं। इसका ताजा उदाहरण अमेरिका के नेतृत्व वाला पैक्स सिलिका गठजोड़ है।
पैक्स सिलिका महत्वपूर्ण तकनीकी क्षेत्रों में काम आने वाले दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति और प्रसंस्करण से जुड़ी आपूर्ति शृंखलाओं को पिरोकर चीन जैसे देशों के इस क्षेत्र पर नियंत्रण से निकलने के उद्देश्य से बनाया गया है। पहले भारत ने इससे जुड़ने की इच्छा जताई थी, परंतु ट्रंप प्रशासन ने उसे नकार दिया था। इस पर भारत के कुछ उद्योगपतियों ने कहा था कि यदि सरकार उनके साथ सहयोग करे तो वे दुर्लभ खनिजों का खनन और प्रसंस्करण भारत में कर सकते हैं।
भारत के पास चीन और ब्राजील के बाद दुर्लभ खनिजों का विश्व का तीसरा सबसे बड़ा भंडार है, जबकि अमेरिका इस मामले में विश्व में सातवें नंबर पर है। ट्रंप साम-दाम-दंड-भेद का प्रयोग कर ग्रीनलैंड पर कब्जे के प्रयास में इसलिए जुटे, क्योंकि ग्रीनलैंड के पास विश्व का आठवां सबसे बड़ा दुर्लभ खनिजों का भंडार है। अगर अमेरिका ग्रीनलैंड को हासिल भी कर ले तब भी 3.4 मीट्रिक टन के साथ उसका स्थान सातवां ही रहेगा।
विचारणीय यह है कि दुर्लभ खनिजों के क्षेत्र में भारत को अमेरिका का पिछलग्गू बनना चाहिए या आत्मनिर्भर? जैसे ही भारतीय उद्योगपतियों ने स्वयं इन खनिजों के खनन और प्रसंस्करण करने की बात कही, अमेरिका ने तुरंत अपनी चाल बदलकर भारत को पैक्स सिलिका में जुड़ने के लिए आमंत्रित कर लिया। इसकी वकालत करने वाली एक लाबी के अनुसार इन दुर्लभ खनिजों का खनन और प्रसंस्करण बहुत जटिल प्रक्रिया है, इसलिए भारत का अमेरिका की अगुआई में काम करना आसान रहेगा, पर जब हमें यह सब आसानी से उपलब्ध होने लगेगा तो हम शिथिल पड़ जाएंगे और खनन और प्रसंस्करण तकनीकी में निवेश ही नहीं करेंगे। प्रश्न यह है कि इस जटिल काम को चीन ने कैसे कर लिया?
चीन 1986 में ही अमेरिका को पीछे छोड़ दुर्लभ खनिजों का सबसे बड़ा उत्पादक बन गया था। 1985-95 के बीच चीन में इन खनिजों का उत्पादन 464 प्रतिशत बढ़ा। 2004 आते-आते चीन विश्व भर के 90 प्रतिशत दुर्लभ खनिजों का निर्यातक बन चुका था। आज चीन विश्व दुर्लभ खनिजों का 70 प्रतिशत खनन, 90 प्रतिशत शोधन और रेयर अर्थ मैग्नेट के 90 प्रतिशत उत्पादन को नियंत्रित करता है। जो काम चीन 1980-90 के दशक में कर पाया वह हम आज क्यों नहीं कर सकते? आत्मनिर्भरता क्या आत्मसंदेह से आएगी। जब विश्व ने परमाणु तकनीक भारत को देने से मना कर दिया था तो क्या हमने परमाणु बम नहीं बना लिया था? इसके उलट उदाहरण भी देख लीजिए।
हम हमेशा फाइटर जेट विदेश से आयात करते रहे हैं। इसके चलते हम आज तक इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर नहीं हो सके हैं, जबकि विश्व की हर महाशक्ति अमेरिका, रूस, फ्रांस, यूरोपीय संघ, चीन अपने फाइटर जेट और उसके इंजन स्वयं बनाते हैं। खबरें हैं कि भारत को एक बार फिर लाखों करोड़ रुपये खर्च करके फ्रांस, रूस या अमेरिका में से किसी एक से फाइटर जेट आयात करने पड़ेंगे, क्योंकि भारतीय वायुसेना के पास लड़ाकू विमानों के बस अब मात्र 29 स्क्वाड्रन ही बाकी रह गए हैं, जबकि होने कम से कम 42 स्क्वाड्रन चाहिए। यह स्थिति इसलिए है, क्योंकि तेजस का उत्पादन समय से नहीं हो पाया और स्वदेशी जेट इंजन बनाने का कार्यक्रम भी अधूरा ही रहा।
1989 में प्रारंभ किए गए कावेरी जेट इंजन कार्यक्रम में भारत ने 2008 तक मात्र 2000 करोड़ रुपये का निवेश किया और फिर उसे असफल पाकर तेजस प्रोजेक्ट से अलग कर दिया। पिछले 40 साल में भारत ने कावेरी इंजन कार्यक्रम पर अधिकतम ₹5000 करोड़ रुपये खर्च किए हैं, जबकि चीन तीन लाख पचास हजार करोड़ रुपये खर्च कर चुका है। आज चीन के पास छठी पीढ़ी के स्वनिर्मित लड़ाकू विमान जे-20 के लिए अपना जेट इंजन तैयार है, जबकि हम चौथी पीढ़ी के लड़ाकू विमान विदेश से खरीदने के लिए तीन-चार लाख करोड़ रुपये खर्च करने वाले हैं। क्या कोई यह वादा कर सकता है कि हम अंतिम बार विदेशी लड़ाकू विमान खरीदने जा रहे हैं?
चीन छठी पीढ़ी के 100-120 लड़ाकू विमान बना रहा है और हम चौथी पीढ़ी के 6-12 जहाज बना पा रहे हैं। कारण यह है कि इसके इंजन के लिए हम अमेरिका पर निर्भर हैं। तीन-चार लाख करोड़ रुपये विदेशी लड़ाकू विमानों पर खर्च करने के बाद हमारी सरकार स्वदेशी जेट इंजन के विकास पर कितना खर्च कर पाएगी, यह भी विचारणीय है। जब तक इन सेक्टरों में आत्मनिर्भरता को राष्ट्रीय मिशन नहीं बनाया जाएगा, तब तक भारत के एक आत्मनिर्भर विश्वशक्ति बनने पर प्रश्नचिह्न लगा रहेगा। भारत के महाशक्ति बनने का मार्ग आसान नहीं है और न ही आसान रास्ते से महाशक्ति बना जा सकता है।
(लेखक काउंसिल ऑफ स्ट्रैटेजिक अफेयर्स से संबद्ध सामरिक विश्लेषक हैं)


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