जागरण संपादकीय: चलनी चाहिए संसद, चर्चा से ही होगा समाधान
उचित यह होगा कि संसद की कार्यवाही चलाने के लिए कार्य मंत्रणा समिति की बैठक में जो कुछ तय होता है, उसका विवरण भी सार्वजनिक किया जाए। ऐसे किसी उपाय की आवश्यकता इसलिए है, क्योंकि कार्य मंत्रणा समिति में बनी सहमति सदन के पटल पर कहीं नजर नहीं आती। यदि संसद चलाने के नए तौर-तरीके नहीं खोजे गए तो उसका चलना मुश्किल ही होगा।
HighLights
विपक्ष उठाएगा मतदाता सूची पुनरीक्षण का मुद्दा
चुनाव आयोग करा रहा मतदाता सूची का पुनरीक्षण
संसद के शीतकालीन सत्र के पहले आयोजित सर्वदलीय बैठक में विपक्ष की ओर से जो कुछ कहा गया, उससे यही साफ हुआ कि इस सत्र में अन्य अनेक मुद्दों के साथ मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर का मुद्दा जोर-शोर से उठेगा। विपक्ष को संसद में किसी भी मुद्दे को उठाने का अधिकार है, लेकिन आखिर विपक्षी दल एसआइआर को लेकर सरकार से ऐसा क्या जानना चाहते हैं, जो उन्हें नहीं ज्ञात?
यह भी ध्यान रहे कि यह सरकार की ओर से संचालित प्रक्रिया नहीं है। इसे तो चुनाव आयोग अपने संवैधानिक अधिकार के तहत करा रहा है और इसलिए करा रहा है, क्योंकि बीते लगभग दो दशक में इसे नहीं किया गया। इसके कारण मतदाता सूचियों में उन तमाम लोगों के नाम दर्ज हैं, जो या तो मर गए अथवा अन्यत्र चले गए। इसके अलावा कई नामों का दोहराव है।
मतदाता सूचियां तभी ठीक हो सकती हैं, जब एसआइआर कराया जाए, लेकिन विपक्षी दलों को इस पर ही आपत्ति है। यह कोई बात नहीं हुई कि मतदाता सूचियों को दुरुस्त करने की मांग भी की जाए और एसआइआर पर आपत्ति भी उठाई जाए। विपक्ष इससे अनभिज्ञ नहीं हो सकता कि बिहार में एसआइआर को लेकर सुप्रीम कोर्ट में लंबी सुनवाई के दौरान उनके वकीलों की ओर से इस संवैधानिक प्रक्रिया के विरोध में जो भी दलीलें दी गईं, वे ठहर नहीं सकीं। इसी कारण बिहार में एसआइआर की प्रक्रिया संभव हो सकी।
हालांकि विपक्ष 12 राज्यों में जारी एसआइआर का भी विरोध कर रहा है, लेकिन इसके कहीं कोई संकेत नहीं कि वह उसे रुकवा सकेगा। संसद के इस सत्र में विपक्ष एसआइआर पर जैसे चाहे वैसे सवाल उठा सकता है, लेकिन ऐसा करते हुए उसे ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिससे संसदीय कार्यवाही बाधित हो। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि अब कोई मुद्दा उठाने अथवा सवाल पूछने के नाम पर ऐसी परिस्थितियां पैदा कर दी जाती हैं जिससे सदन की कार्यवाही चलाना मुश्किल हो जाता है।
विपक्षी दलों के नेता भले ही अपनी बात की सुनवाई न होने की शिकायत करते हों, लेकिन सच यह है कि वे चाहते ही नहीं कि उनकी ओर से उठाए गए किसी मुद्दे पर सदन में कोई गंभीर चर्चा हो सके। चूंकि अब संसद का प्रत्येक सत्र हंगामे के लिए जाना जाता है, इसलिए संसद को चलाने के कुछ नए तौर-तरीके अपनाने होंगे।
उचित यह होगा कि संसद की कार्यवाही चलाने के लिए कार्य मंत्रणा समिति की बैठक में जो कुछ तय होता है, उसका विवरण भी सार्वजनिक किया जाए। ऐसे किसी उपाय की आवश्यकता इसलिए है, क्योंकि कार्य मंत्रणा समिति में बनी सहमति सदन के पटल पर कहीं नजर नहीं आती। यदि संसद चलाने के नए तौर-तरीके नहीं खोजे गए तो उसका चलना मुश्किल ही होगा।

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