जगमोहन सिंह राजपूत। देश में प्रश्नपत्रों का परीक्षा से पहले ‘आउट’ हो जाना लगभग सामान्य प्रक्रिया बन चुकी है। इसका विस्तार बोर्ड एवं प्रतियोगी परीक्षाओं से लेकर सरकारी नौकरियों में नियुक्ति के लिए होने वाली परीक्षाओं तक फैल चुका है। सरकारी तंत्र ने अगले वर्ष के लिए सुधारों का आश्वासन दिया है। यह आवश्यक भी था, लेकिन जो अविश्वास पूरे देश में फैल चुका है, क्या उसका समाधान भी हो पाया है? अपराधियों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती। कुछ लोग तो वर्षों से इस प्रकार के अवैध कार्यों को व्यवसाय की तरह संचालित करते रहे हैं। निश्चित रूप से उन्हें कहीं न कहीं से संरक्षण भी मिलता रहा होगा।

हर बार सरकारी तंत्र प्रश्नपत्र तैयार करने, उसे परीक्षा केंद्रों तक सुरक्षित पहुंचाने और परीक्षा प्रारंभ होने तक उसकी गोपनीयता बनाए रखने की व्यवस्था में सुधार करता है, लेकिन समस्या का एक बड़ा पक्ष ऐसा भी है, जिसे सभी जानते हैं, पर उसकी ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। कुछ वर्ष पहले बिहार की एक बोर्ड परीक्षा के परिणामों को लेकर देशव्यापी चर्चा हुई थी। उस दौरान एक छात्रा का यह कथन व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर करने वाला था कि 'मैं तो सेकेंड डिवीजन में पास होना चाहती थी, चाचा ने टाप करा दिया।' यह एक ऐसा संकेत था, जो समस्या के वास्तविक समाधान की दिशा दिखा सकता था।

हमें इस पर भी विचार करना होगा कि आखिर लीक हुए प्रश्नपत्र कौन खरीदता है? इसके लिए धन तो परिवार ही देता है और साल्वर, वह भी नीट जैसी परीक्षा में, कौन बन सकता है? कोई मेडिकल की पढ़ाई कर रहा छात्र या डाक्टर बन चुका सुशिक्षित व्यक्ति ही यह कार्य कर सकता है। क्या इस देश ने कभी नागरिकों को यह बताया कि किसी साल्वर को या बड़ी धनराशि देकर अपने लाड़लों के लिए प्रश्नपत्र खरीदने वाले परिवार के किसी सदस्य को क्या सजा मिली? इस प्रकार के मामलों और ऐसी अन्य कारगुजारियों में अपराधियों को दंडित करने के मामले में भारत इतना कमजोर क्यों है? या यूं कहें कि व्यवस्था इतनी शिथिल क्यों है? संविधान में मूलभूत कर्तव्य 42वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़े गए थे। यदि सरकार, शिक्षित वर्ग और समाज इनका पालन करते होते तो क्या प्रश्नपत्र लीक होते? आगे क्या केवल कानून बदलकर प्रश्नपत्र लीक को रोका जा सकेगा? व्यवस्था को लगातार सतर्क तो रहना ही होगा, लेकिन जब तक शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति के भीतर मानवीय तत्व को जागृत करने में असमर्थ रहेगी, तब तक ऐसी आशंकाएं साकार होती रहेंगी और परीक्षाओं की साख पुनः स्थापित नहीं हो पाएगी। नीट के प्रश्नपत्र लीक मामले की जांच तेजी से चल रही है। यह स्पष्ट हो गया है कि जो लोग प्रश्नपत्र बनाने योग्य समझे गए थे, जो विशेषज्ञ माने जाते थे, वे अपेक्षित नैतिक स्तर पर खरे नहीं उतरे।

स्वतंत्रता के बाद के पहले कई दशकों तक परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक क्यों नहीं होते थे। वर्ष 1965-70 तक समाज में हर तरफ ऐसे लोग उपस्थित थे, जिन्होंने देश की आजादी के लिए त्याग किया था, तपस्या की थी और अपना सर्वश्रेष्ठ देश तथा उसके नागरिकों के लिए समर्पित कर दिया था। आज स्थिति कहां पहुंच गई है? सत्ता में पहुंचकर या व्यवस्था का अंग बनकर सामान्य जन को भूल जाना लगभग पूरी तरह स्वीकार्य हो चुका है। महात्मा गांधी का एक सूत्र-वाक्य लगभग हर विचार-विमर्श में दोहराया जाता है कि 'प्रकृति के पास सभी की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन किसी एक व्यक्ति के लालच की पूर्ति के लिए नहीं।' क्या नीट परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने जैसी अनेक कष्टदायक घटनाओं के कारण इसी विचार में कहीं छिपे नहीं हैं? अंततः वह धन-लोलुपता ही है, जो एक अनुभवी अध्यापक को अपनी नैतिकता और कर्तव्यनिष्ठा को भुलाकर एक जघन्य सामाजिक अपराध की ओर धकेल देती है। यह उस शिक्षा-व्यवस्था और पाठ्यक्रम की भी असफलता है, जो विद्यार्थियों को परीक्षाएं तो उत्तीर्ण करा देता है, लेकिन शिक्षा के सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य-नैतिकता और मानवीय मूल्यों के साथ व्यक्तित्व-निर्माण में पूरी तरह असफल सिद्ध होता है। नैतिकता का ह्रास भारत के भविष्य पर सीधी चोट कर रहा है।

विज्ञान, तकनीक, अंतरिक्ष, एआइ और संचार प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत के युवा किसी से पीछे नहीं हैं। फिर भी प्रश्न यह है कि हम परीक्षाओं को ईमानदारी और विश्वास के साथ संपन्न कराने में स्वयं को असमर्थ क्यों पाते हैं? एक महत्वपूर्ण पक्ष, जिस पर अपेक्षित चर्चा नहीं होती, वह है मनुष्य की बढ़ती स्वार्थपरकता, संग्रह की प्रवृत्ति और धन के निर्बाध दुरुपयोग का अहंकार। स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक इस विषय पर गंभीर वैचारिक मंथन की आवश्यकता है। ऐसी शिक्षा-पद्धति और विकल्पों की तलाश करनी होगी, जो केवल ज्ञान और कौशल ही नहीं, बल्कि नैतिकता से संपन्न व्यक्तित्व का भी निर्माण करें। साथ ही जनप्रतिनिधियों को भी अपने जीवन के लक्ष्यों, सामाजिक दायित्वों और जनहित की समझ पर निरंतर आत्ममंथन करते रहना होगा। केवल आर्थिक और तकनीकी प्रगति पर्याप्त नहीं है। यदि उसके साथ नैतिक विकास नहीं जुड़ा होगा तो समाज और राष्ट्र दोनों ही गंभीर चुनौतियों का सामना करते रहेंगे।

(लेखक एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक हैं)