जागरण संपादकीय: शहरों की बिगड़ती सूरत
यदि शहरों की सूरत संवारनी है और उन्हें विकास का वाहक बनाना है तो स्थानीय निकायों के कामकाज के तौर-तरीकों को पूरी तरह बदलना होगा।
HighLights
राजधानी में इमारत ढहने से छह की मौत।
अवैध निर्माण के कारण नगर निगम पर सवाल।
शहरों के अनियोजित विकास पर गंभीर चिंता।
देश की राजधानी में एक पांच मंजिला भवन गिरने से छह लोगों की मौत और कई के घायल होने के बाद भवन स्वामी की गिरफ्तारी करने के साथ ही नगर निगम के दो इंजीनियरों को निलंबित कर दिया गया। इसके अतिरिक्त मजिस्ट्रेट जांच के आदेश भी दे दे गिए। इस घटना के बाद नगर निगम यह जानने की कोशिश कर रहा है कि आखिर शिकायतों के बाद भी उक्त इमारत में अतिरिक्त मंजिल का अवैध निर्माण कैसे हो रहा था? वह अन्य ऐसी ही इमारतों की छानबीन में भी जुट गया है, लेकिन इसके आसार कम ही हैं कि आगे ऐसी घटनाएं नहीं होंगी और अवैध निर्माण का सिलसिला बंद होगा, क्योंकि यदि ऐसा होना होता तो बहुत पहले हो गया होता।
आखिर दिल्ली में ऐसी कोई इमारत पहली बार नहीं गिरी, जो अवैध रूप से बनी थी या निर्मित की जा रही थी। ऐसी न जाने कितनी घटनाएं हो चुकी हैं और फिर भी नतीजा ढाक के तीन पात वाला है। ऐसा इसीलिए है, क्योंकि नगर निकाय के अधिकारी-कर्मचारी कुछ ले-देकर अवैध निर्माण होने देते हैं। वे पैसों के लालच में भवन निर्माण संबंधी नियम-कानूनों की अनदेखी करते हैं। इस मामले में जो स्थिति दिल्ली की है, वही शेष देश की भी है।
हमारे हर छोटे-बड़े शहर में अवैध एवं बेतरतीब निर्माण हो रहा है। यह स्थानीय निकायों के संरक्षण और उनकी जानकारी में होता है। इसी कारण शहरों में अवैध तरीके से रिहायशी और व्यावसायिक इमारतों का निर्माण होता रहता है। स्थिति यह है कि जो पुराने भवन दो-तीन मंजिल के होते हैं, वे जर्जर होने के बाद भी अवैध निर्माण के सहारे चार-पांच मंजिलों में तब्दील कर लिए जाते हैं। इससे क्षेत्र विशेष में आबादी का दबाव बढ़ने के साथ नागरिक सुविधाओं का अभाव भी बढ़ता है।
अपने देश में ऐसा कोई नियम ही नहीं कि किसी इलाके में कितनी आबादी रहनी चाहिए। इससे भी बड़ी त्रासदी यह है कि हर कहीं रिहायशी इलाके व्यावसायिक इलाकों में तब्दील हो रहे हैं। देश भर में घरों में दुकानें बनाने की होड़ सी कायम है। ऐसा पुराने मोहल्लों के साथ नए मोहल्लों में भी हो रहा है। इसी कारण हमारे शहर बेतरतीब विकास का पर्याय बन गए हैं और वे नागरिक सुविधाओं के अभाव के साथ प्रदूषण एवं गंदगी से घिरते जा रहे हैं।
अनियोजित शहर नगरीय जीवन को केवल कष्टकारी ही नहीं बनाते, बल्कि वे विकास में बाधक भी बनते हैं। आज के युग में शहर आर्थिक विकास के इंजन हैं, लेकिन तभी, जब उनका नियोजित ढंग से विकास हो। विडंबना यह है कि जिन नगर निकायों की पहली जिम्मेदारी शहरों के नियोजित विकास को सुनिश्चित करना है, वे उसका ही निर्वाह करने में बुरी तरह नाकाम हैं। यदि शहरों की सूरत संवारनी है और उन्हें विकास का वाहक बनाना है तो स्थानीय निकायों के कामकाज के तौर-तरीकों को पूरी तरह बदलना होगा।












