जागरण संपादकीय: खेत बचाओ अभियान
इस वर्ष यह खर्च कहीं अधिक बढ़ने के आसार हैं, क्योंकि अधिकतर उर्वरकों का आयात किया जाता है और अमेरिका-ईरान तनाव के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में उनके मूल्य बढ़ते जा रहे हैं।
HighLights
पश्चिम एशिया संकट, उर्वरक मूल्य वृद्धि से अभियान शुरू।
अत्यधिक रासायनिक उर्वरक उपयोग मिट्टी, भूजल को दूषित करता है।
किसानों को जागरूकता चाहिए; सब्सिडी से अति उपयोग, कालाबाजारी।
यह अच्छा है कि पश्चिम एशिया संकट के चलते रासायनिक उर्वरकों की आपूर्ति में कठिनाई और उनके मूल्यों में वृद्धि को देखते हुए केंद्र सरकार ने खेत बचाओ अभियान शुरू किया। इस अभियान को शुरू करने के पहले केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जिस तरह देश भर के कृषि विज्ञान केंद्रों, आइसीएआर संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों एवं राज्य सरकारों के वरिष्ठ कृषि अधिकारियों और किसान संगठनों से गहन संवाद किया, उससे यह पता चलता है कि वे इस अभियान को वास्तव में सफल होते हुए देखना चाहते हैं। ऐसे किसी अभियान की सफलता जन भागीदारी और जागरूकता के माध्यम से ही संभव है। निःसंदेह इस अभियान में केंद्र सरकार को राज्यों का सक्रिय सहयोग चाहिए होगा।
इसी तरह यह आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है कि आम किसान यह समझें कि रासायनिक उवर्रकों का आवश्यकता से अधिक उपयोग केवल खेती की लागत ही नहीं बढ़ाता, बल्कि खेतों की मिट्टी की उर्वर क्षमता को भी कम करता है। इसके अतिरिक्त भूजल भी दूषित होता है। एक ऐसे समय जब जलवायु बदल रही है, तब उर्वरकों का अंसतुलित उपयोग खेती के सामने गंभीर चुनौती बन रहा है।
समस्या यह है कि औसत किसान यह समझ नहीं पा रहे हैं कि उर्वरकों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल अंततः उनके लिए घाटे का सौदा ही सिद्ध होता है, क्योंकि प्रारंभ में तो फसल अच्छी होती है, लेकिन समय के साथ खेतों की मिट्टी दूषित हो जाने के कारण उपज प्रभावित होती है।
वैसे तो प्रधानमंत्री ऐसी अपील करते रहे हैं कि किसान रासायनिक उर्वरकों का सही उपयोग करने के लिए खेतों की मिट्टी का परीक्षण कराएं और जैविक खाद के प्रयोग को बढ़ावा दें, लेकिन इसके बाद भी अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो पाए और रासायनिक खादों का अंधाधुंध उपयोग जारी है। इसका एक कारण उवर्रकों पर दी जाने वाली सब्सिडी भी है। एक आंकड़े के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 में सरकार ने 1.7 लाख करोड़ रुपये उर्वरक सब्सिडी पर खर्च किए।
इस वर्ष यह खर्च कहीं अधिक बढ़ने के आसार हैं, क्योंकि अधिकतर उर्वरकों का आयात किया जाता है और अमेरिका-ईरान तनाव के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में उनके मूल्य बढ़ते जा रहे हैं। उर्वरक मंत्री जेपी नड्डा की मानें तो जहां दो बोरी उर्वरक के उपयोग की आवश्यकता होती है, वहां किसान चार बोरी का उपयोग करते हैं।
वास्तव में जब भी कोई वस्तु सब्सिडी के चलते कम मूल्य पर उपलब्ध कराई जाती है तो उसका अनावश्यक उपयोग बढ़ जाता है। तथ्य यह भी है कि किसानों को सस्ते मूल्य पर उपलब्ध कराए जाने वाले उर्वरक की कालाबाजारी भी होती है, क्योंकि उसका इस्तेमाल औद्योगिक रसायन के रूप में भी होता है।












