डॉ. महुआ माजी। भारतीय लोकतंत्र आज एक गहरे सामाजिक और राजनीतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। यह परिवर्तन केवल संसद या चुनावी परिणामों तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज की मानसिक संरचना, संवाद की प्रकृति और जनमत निर्माण की प्रक्रिया तक फैल चुका है। आज राजनीतिक विमर्श का बड़ा हिस्सा इंटरनेट मीडिया पर आकार ले रहा है। जनमत अब पारंपरिक माध्यमों से आगे बढ़कर इंस्टाग्राम रील, यूट्यूब शार्ट्स, एक्स पोस्ट और वायरल मीम्स के जरिये निर्मित हो रहा है। इसी पृष्ठभूमि में “काकरोच जनता पार्टी” जैसी अचानक उभरी लोकप्रियता को केवल डिजिटल ट्रेंड मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। यह उस बेचैन युवा भारत की अभिव्यक्ति है, जो स्वयं को लगातार उपेक्षित महसूस कर रहा है।

समाजशास्त्र की दृष्टि से देखा जाए तो जब किसी समाज की मुख्य संस्थाएं-राजनीति, प्रशासन, शिक्षा और मीडिया जनभावनाओं से दूरी बनाने लगती हैं, तब नए प्रतीक और नई राजनीतिक भाषाएं जन्म लेती हैं। कई बार ये प्रतीक व्यंग्य के रूप में सामने आते हैं, लेकिन इनके भीतर गहरी सामाजिक पीड़ा और असंतोष छिपा होता है। “काकरोच जनता पार्टी” इसी डिजिटल युग का एक ऐसा ही सांकेतिक प्रतिरोध है। काकरोच एक ऐसा जीव है, जो सबसे कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रह जाता है।

यह प्रतीक आज के उस युवा मानस को आकर्षित करता है, जो बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं की अनिश्चितता, आर्थिक असुरक्षा और सामाजिक दबाव के बीच किसी तरह आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है। भारत आज विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। दूसरी ओर, शिक्षित बेरोज़गारी एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। आंकड़े लगातार यह संकेत देते हैं कि युवाओं में बेरोजगारी की दर औसत से अधिक बनी हुई है। लाखों युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, लेकिन भर्ती प्रक्रियाएं या तो विलंबित होती हैं या विवादों में उलझ जाती हैं। यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि गहरे सामाजिक असंतोष का कारण बन रही है।

आज का युवा केवल रोजगार नहीं चाहता, वह सम्मानजनक भागीदारी चाहता है। वह यह महसूस करना चाहता है कि लोकतंत्र में उसकी आवाज सुनी जा रही है, लेकिन जब उसे मंचों पर केवल औपचारिक आश्वासन और इंटरनेट मीडिया पर केवल प्रचार दिखाई देता है, तब वह अपनी अभिव्यक्ति के नए माध्यम खोजता है। वर्तमान चुनावी परिदृश्य में यह प्रवृत्ति और अधिक स्पष्ट हो गई है। चुनाव अब केवल मतदान केंद्रों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर भी लड़े जा रहे हैं। राजनीतिक दलों के डिजिटल अभियान, आइटी सेल और इंटरनेट मीडिया रणनीतियां जनमत निर्माण में निर्णायक भूमिका निभा रही हैं, लेकिन इस डिजिटल राजनीति के बीच एक महत्वपूर्ण प्रश्न लगातार अनुत्तरित है-क्या हम वास्तव में युवा भारत की मूल चिंताओं को समझ पा रहे हैं? आज का युवा पहले की तरह केवल परंपरागत राजनीतिक निष्ठाओं से बंधा नहीं है। वह प्रश्न पूछता है, तुलना करता है, तथ्य जांचता है और तुरंत प्रतिक्रिया देता है। इंटरनेट मीडिया ने उसे अभूतपूर्व अभिव्यक्ति की शक्ति दी है। यह लोकतंत्र के विस्तार का भी संकेत है और उसकी नई चुनौती भी।

इंटरनेट मीडिया की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने लोकतंत्र को अधिक सहभागी बनाया है। छोटे शहरों और दूरदराज क्षेत्रों के युवा भी अब राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन रहे हैं। जो आवाजें पहले अनसुनी रह जाती थीं, वे अब सीधे लाखों लोगों तक पहुंच रही हैं। भ्रष्टाचार, प्रशासनिक विफलता और सामाजिक अन्याय पर तुरंत प्रतिक्रिया संभव हुई है। यह लोकतंत्र की मजबूती का संकेत है, लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी गंभीर है। इंटरनेट मीडिया ने राजनीति को अत्यधिक तात्कालिक और भावनात्मक बना दिया है।

अब विचारों की गहराई से अधिक उनकी वायरल क्षमता महत्वपूर्ण हो गई है। कई बार नीतिगत बहसें पीछे छूट जाती हैं और प्रतीकात्मक राजनीति आगे बढ़ जाती है। एल्गोरिदम आधारित इस व्यवस्था में वही सामग्री अधिक फैलती है, जो उत्तेजना पैदा करे। इससे सामाजिक ध्रुवीकरण और वैचारिक टकराव बढ़ता है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि युवाओं की वास्तविक समस्याएं कहीं डिजिटल मनोरंजन में न बदल जाएं। बेरोजगारी, शिक्षा की गुणवत्ता, अवसरों की असमानता और भविष्य की अनिश्चितता जैसे गंभीर प्रश्न कई बार मीम संस्कृति में सीमित हो जाते हैं। यह लोकतंत्र के लिए दीर्घकालिक रूप से स्वस्थ संकेत नहीं है।

जब संवाद कमजोर होता है, तब प्रतिरोध असामान्य रूप ले लेता है। इंटरनेट मीडिया युग में यह प्रवृत्ति और तेज हुई है, क्योंकि यहां प्रतिक्रिया तत्काल मिलती है, लेकिन समाधान नहीं। राजनीतिक दलों के लिए यह समय आत्ममंथन का है। यदि युवा व्यंग्यात्मक प्रतीकों और डिजिटल आंदोलनों के माध्यम से अपनी राजनीतिक अभिव्यक्ति खोज रहा है तो यह संकेत है कि मुख्यधारा की राजनीति उसके विश्वास को पूरी तरह जीत नहीं पाई है। केवल प्रचार और नारों से यह दूरी कम नहीं होगी। इसके लिए रोजगार, शिक्षा, पारदर्शिता और वास्तविक सहभागिता को केंद्र में लाना होगा।

(लेखक सदस्य, राज्यसभा हैं)