धर्मकीर्ति जोशी। वैश्विक अनिश्चतता के माहौल में केंद्र सरकार ने भारत की विकास गाथा को निरंतरता प्रदान करते हुए अर्थव्यवस्था को स्थायित्व प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित किया है। बजट का मर्म यही है कि सरकार ने बड़ी घोषणाएं न करके कई छोटी-छोटी योजनाओं को आगे बढ़ाने का निर्णय किया है, जो दीर्घकाल में बड़े परिणाम देने में सक्षम हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट के माध्यम से यही संकेत दिया कि सरकार ने पिछले कुछ वर्षों के दौरान जो बड़ी घोषणाएं की हैं, उनके असर को ही पहले और आगे विस्तार दिया जाए।

यानी पहले से जिन क्षमताओं के निर्माण की योजना बनाई गई, उन्हें अपेक्षित रूप से सतत गति के साथ साकार किया जाए। गत वर्ष पहले आयकर में रियायत और फिर जीएसटी दरों में कटौती से जहां राजस्व के मोर्चे पर स्थिति थोड़ी संकुचित हुई थी, उसे देखते हुए राहत के मोर्चे पर इस बार बहुत ज्यादा उम्मीदें बेमानी ही थीं। इसके बावजूद सरकार सराहना की पात्र है कि राजकोषीय अनुशासन की राह से विचलित नहीं हुई। चालू वित्त वर्ष के लिए राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 4.5 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य रखा था, वह संशोधित अनुमानों में 4.4 प्रतिशत रहा। राजकोषीय अनुशासन की प्रतिबद्धता दोहराते हुए वित्त मंत्री ने अगले वित्त वर्ष के लिए 4.3 प्रतिशत का लक्ष्य तय किया है।

राजस्व को लेकर कुछ दबावों के बावजूद राजकोषीय घाटे को नियंत्रित रखने में सरकार की सफलता में व्यय की गुणवत्ता ने अहम भूमिका निभाई। सरकार ने पूंजीगत व्यय के साथ कोई समझौता किए बिना राजस्व व्यय को घटाकर यह संतुलन बनाया है। केंद्र सरकार का यह दृष्टिकोण तब और आवश्यक हो जाता है जब कई राज्य सरकारें कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर खुले हाथों से खर्च कर रही हैं। राजकोषीय अनुशासन सुनिश्चित करना केवल केंद्र के भरोसे संभव नहीं और राज्यों को भी इसके साथ ताल मिलानी होगी। हालांकि राज्यों को इसके लिए तैयार करने में केंद्र के हाथ कुछ बंधे हुए हैं। इस दिशा में जब केंद्र सरकार स्वयं व्यय की गुणवत्ता कायम करेगी तभी राज्य भी इसी राह पर आगे बढ़ने के लिए सोचेंगे। इसके अलावा केंद्र सरकार विनिवेश को लेकर भी व्यावहारिक रुख अपनाती हुई प्रतीत हो रही है कि उसमें व्याप्त संभावनाओं को भुनाकर भी अपेक्षित राजस्व हासिल किया जाए।

रोजगार सृजन के लिए बजट में सेवा क्षेत्र के साथ ही विनिर्माण गतिविधियों को प्रोत्साहन जारी रखा गया है। वित्त मंत्री ने तात्कालिक आवश्यकताओं के दृष्टिकोण से अहम सेमीकंडक्टर, बायोफार्मा, इलेक्ट्रानिक्स जैसे उदीयमान क्षेत्रों पर ध्यान देते हुए वस्त्र-परिधान एवं एमएसएमई जैसे पारंपरिक क्षेत्रों का भी पूरा ख्याल रखा है। कर सुधारों, आयात शुल्कों को तार्किक बनाकर और आयात प्रक्रियाओं को सुगम बनाकर सरकार इन क्षेत्रों से जुड़ी संभावनाओं को साकार करना चाहती है। ऐसे आसार बन रहे हैं कि देश के कुल पूंजीगत व्यय का एक चौथाई हिस्सा इन उभरते हुए नए क्षेत्रों पर केंद्रित हो सकता है, जिसकी 2021 से 2025 के बीच कुल खर्च में 12 प्रतिशत हिस्सेदारी थी।

शिक्षा, उद्यम और रोजगार का परिदृश्य सुधारने के लिए बजट में कई प्रविधान किए गए हैं। इस संदर्भ में एक स्थायी समिति का गठन उल्लेखनीय है। कर सुधारों एवं बजटीय समर्थन के जरिये पर्यटन, हेल्थकेयर, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन और खेल गतिविधियों पर सरकार ने एक बड़े आर्थिक कायाकल्प को लेकर दांव लगाया है। सरकार की मंशा तेजी से उभरते हुए क्षेत्रों में अवसरों को भुनाने के साथ ही उसके लिए अपेक्षाओं के स्तर पर गहरी खाई को पाटने की भी है। इस लिहाज से पर्यटन पर विशेष जोर दिया गया है, जिसमें विदेश में बढ़ते भारतीय सैर-सपाटे की वजह से हो रहे नकारात्मक प्रभाव का संज्ञान लिया गया है। अभी विदेशी पर्यटक भारत आकर जितना नहीं खर्च कर रहे, उससे कहीं अधिक खर्च भारतीय सैलानी विदेश में कर रहे हैं।

हालांकि ऐसा रुझान केवल भारत तक ही सीमित नहीं है। दुनिया भर में उच्च आय वर्ग में खर्च को लेकर यही रवैया दिखता है। एआइ के दौर में यह क्रम और तेजी पकड़ता दिख सकता है। इसका ही परिणाम है कि आलीशान सुविधाओं वाले महंगे पर्यटन केंद्रों के प्रति दुनिया भर में उत्सुकता बढ़ी है, जहां पर्यटक अनोखे अनुभव का आनंद उठाना चाहते हैं। इस लिहाज से भारत के पास संभावनाओं की कमी नहीं है और सुविधाओं-सेवाओं का स्तर बढ़ाकर हम भी दुनिया भर के लोगों को लुभा सकते हैं। वैसे भी मेडिकल और वेलनेस पर्यटन के मामले में भारत को वैश्विक प्रतिष्ठा प्राप्त है। ऐसे में ई-वीजा योजना और आध्यात्मिक पर्यटन केंद्रों के माध्यम से यह स्थिति और मजबूत होनी चाहिए। ये रोजगार सृजन की दृष्टि से भी बहुत उपयोगी हैं, क्योंकि इनमें मेट्रो शहरों से इतर भी पर्याप्त रूप से कामकाज के मौके तैयार करने की भरपूर संभावनाएं हैं। बजट में जलमार्गों पर दिए गए जोर से परिवहन सेवाओं में भी सुधार संभव होगा। इन सुधारों के दम पर अगर राज्यों के साथ सहयोग बढ़ाकर विशेष पर्यटन केंद्र विकसित किए जाएं तो इससे न केवल बड़े पैमाने पर लोगों को आजीविका मिलेगी, बल्कि विदेशी मुद्रा की भी प्राप्ति होगी।

सरकार ने देश में डाटा सेंटर स्थापित करने के लिए लंबी अवधि तक कर रियायतों का भी एलान किया है। इससे विदेशी निवेशक आकर्षित होंगे। बजट ने निवेश सीमाएं बढ़ाकर एनआरआइ और विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय इक्विटीज में दांव लगाने के लिए नई राहें भी खोली हैं। स्पष्ट है कि वित्त मंत्री ने पूंजीगत लाभ के स्तर पर किसी बाजीगरी के बजाय समग्र माहौल को सुगम बनाने पर अधिक जोर दिया है। समय के साथ इन दोनों की जुगलबंदी अपना असर दिखाएगी। कुल मिलाकर, बजट के जरिये सरकार ने अनिश्चित वैश्विक माहौल में क्षमता निर्माण और दृढ़ता बढ़ाने को प्राथमिकता दी है, ताकि किसी प्रतिकूल परिस्थिति में राहत के लिए गुंजाइश कायम रखी जा सके।

(लेखक क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री हैं)