जागरण संपादकीय: सतही आरोपों की राजनीति, राहुल गांधी का गलवान राग
राहुल गांधी केवल कांग्रेस के नेता ही नहीं, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। कम से कम राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में तो उन्हें भारतीय सेनाओं के नैरेटिव के साथ खड़े होना चाहिए। दुर्भाग्य से वे ऐसा नहीं करते। वे चीन और पाकिस्तान को लेकर मोदी सरकार को तो घेरते हैं, लेकिन यह स्मरण नहीं रखते कि इन दोनों देशों ने भारतीय भूभाग पर तब अतिक्रमण किया, जब कांग्रेस सत्ता में थी।
HighLights
राहुल गांधी ने गलवान पर अप्रकाशित पुस्तक का हवाला दिया
रक्षा मंत्री ने राहुल पर सदन गुमराह करने का आरोप लगाया
लेख ने राहुल की सतही आरोपों की राजनीति पर सवाल उठाए
गलवान में चीनी सेना के साथ खूनी टकराव के मामले में तत्कालीन सेनाध्यक्ष एमएम नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक के कथित अंश का जैसा उल्लेख राहुल गांधी ने किया, उस पर हंगामा होना ही था। इस दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने राहुल गांधी पर सदन को गुमराह करने का आरोप लगाते हुए कहा कि आखिर जो पुस्तक प्रकाशित ही नहीं हुई, उसका वह उल्लेख कैसे कर सकते हैं? गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए उन पर गलतबयानी का आरोप लगाया, लेकिन वे टस से मस नहीं हुए। इसके बाद सदन में हंगामा हुआ और वह चल नहीं सका।
इस पर कांग्रेस ने आरोप लगाया कि उनके नेता को सदन में बोलने से रोका गया। हंगामे के पहले राहुल गांधी ने जो कुछ कहा, उससे इतना तो स्पष्ट ही है कि वे यही सिद्ध करना चाहते थे कि मोदी सरकार ने चीनी सेना के अतिक्रमणकारी रवैये पर साहस नहीं दिखाया। राहुल गांधी कितनी तैयारी से आए थे, इसका पता इससे चलता है कि वे संदर्भ तो गलवन का देना चाहते थे, लेकिन उन्होंने उल्लेख डोकलाम का किया।
यह पहली बार नहीं है, जब राहुल गांधी ने यह कहने की कोशिश की हो कि प्रधानमंत्री मोदी चीन का डटकर मुकाबला करने से बचते हैं। वे मोदी सरकार को कमजोर दिखाने के लिए यह भी कहते रहे हैं कि चीन ने हमारी जमीन पर कब्जा कर रखा है। वे यहां तक कह चुके हैं कि चीनी सेना ने भारतीय सैनिकों की पिटाई की थी। इसके लिए उन्हें सुप्रीम कोर्ट की फटकार भी सुननी पड़ी थी। इसके बाद भी वे यह समझने के लिए तैयार नहीं कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में सतही आरोपों के आधार पर राजनीति नहीं करनी चाहिए।
सब जानते हैं कि गलवन में चीनी सेना को करारा जवाब मिला था और इसी कारण वह वार्ता की मेज पर आया और लद्दाख में कई इलाकों में यथास्थिति कायम हो पाई। इसे पूर्व सेनाध्यक्ष नरवणे भी एक नहीं कई बार सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं। जहां तक उनकी पुस्तक की बात है, तथ्य यही है कि अभी रक्षा मंत्रालय ने उसके प्रकाशन की अनुमति नहीं दी है। यह भी एक तथ्य है कि जिस पत्रिका ने इस पुस्तक के कथित अंश छापे हैं और उनकी अपने हिसाब से व्याख्या की है, वह आधे-अधूरे तथ्यों के साथ सनसनी फैलाने के लिए जानी जाती है।
राहुल गांधी केवल कांग्रेस के नेता ही नहीं, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। कम से कम राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में तो उन्हें भारतीय सेनाओं के नैरेटिव के साथ खड़े होना चाहिए। दुर्भाग्य से वे ऐसा नहीं करते। वे चीन और पाकिस्तान को लेकर मोदी सरकार को तो घेरते हैं, लेकिन यह स्मरण नहीं रखते कि इन दोनों देशों ने भारतीय भूभाग पर तब अतिक्रमण किया, जब कांग्रेस सत्ता में थी।













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