विचार: अमेरिका के साथ एक नई शुरुआत, ट्रंप ने टैरिफ को 50 से घटाकर 18 प्रतिशत किया
यह समझौता मोदी के उस दीर्घकालिक सोच का प्रतीक है, जिसमें भारत को एक आत्मविश्वासी, विकल्पों से भरपूर और वैश्विक स्तर पर प्रभावशाली शक्ति के रूप में स्थापित किया जाना है। भारत अब किसी भी सौदे में शर्तें तय करने के लिहाज से कहीं बेहतर स्थिति में है।
HighLights
अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ 50% से 18% किया।
मोदी की कूटनीति ने भारत की वैश्विक स्थिति मजबूत की।
समझौता भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को सुदृढ़ करता है।
डॉ. मनिष दाभाडे। पहले यूरोपीय संघ के साथ बहुप्रतीक्षित मुक्त व्यापार समझौते पर मुहर और उसके कुछ ही दिनों के भीतर अमेरिका के साथ एक तरह के व्यापार युद्ध में संघर्षविराम की स्थिति नि:संदेह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए बड़ी उपलब्धियां हैं। उनके लिए नए साल की इससे बेहतर शुरुआत शायद ही हो सकती थी। खास तौर से तब जब पिछला साल कूटनीतिक तनाव, आपरेशन सिंदूर के दौरान युद्ध की आशंका और अमेरिका के साथ खटपट के नाम रहा। इस संदर्भ में अमेरिका के साथ बिगड़ी हुई बात का बनना बहुत कुछ कहता है।
अमेरिका द्वारा भारतीय वस्तुओं पर 50 प्रतिशत के टैरिफ को घटाकर 18 प्रतिशत करने का निर्णय मात्र एक आर्थिक राहत नहीं है, बल्कि यह मोदी की विदेश नीति की महत्वाकांक्षा और दृढ़ता की पुष्टि भी है। जब तमाम विश्लेषक यह मान बैठे थे कि ट्रंप 2.0 के दौर में भारत को लगातार दबाव और अपमान झेलना पड़ेगा, उसी दौरान मोदी ने धैर्य, रणनीति और आत्मविश्वास के साथ स्थिति को पलट दिया। यह समझौता दर्शाता है कि भारत अब वैश्विक राजनीति में प्रतिक्रिया देने वाला नहीं, बल्कि दिशा तय करने वाला देश बन चुका है।
देखा जाए तो मोदी ने वह कर दिखाया जो तमाम वैश्विक नेता नहीं कर सके। मोदी ने ट्रंप की कुख्यात ‘द आर्ट आफ द डील’ रणनीति को समझा और उसे भारत के हित में साध लिया। ट्रंप की सौदेबाजी बेहद आक्रामक, दबाव बनाने वाली और अतिरंजित दावों पर आधारित रही है। कनाडा, यूरोप, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे अमेरिकी सहयोगी भी उनकी इस शैली के सामने अक्सर रक्षात्मक स्थिति में दिखे।
स्वयं भारत ट्रंप के पहले कार्यकाल में एक सीमित व्यापार समझौते की कोशिश में विफल रहा था, लेकिन इस बार मोदी ने न तो जल्दबाजी दिखाई और न ही आत्मसमर्पण किया। उन्होंने ट्रंप को वह राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक संतुष्टि की गुंजाइश दी, जिसके लिए अमेरिकी राष्ट्रपति व्यग्र थे। जबकि वास्तविक लाभ भारत के खाते में गया। यह मोदी की कूटनीतिक परिपक्वता और आत्मविश्वास का प्रमाण है।
टैरिफ कटौती के बीच ट्रंप ने एकतरफा दावे भी किए। जैसे भारत रूसी तेल की खरीद पूरी तरह बंद कर देगा। भारत अमेरिकी उत्पादों की 500 अरब डालर तक की खरीद करेगा और अमेरिकी वस्तुओं पर सभी टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाएं शून्य कर देगा। ये दावे जितने नाटकीय हैं, उतने ही अव्यावहारिक भी प्रतीत होते हैं। भारत का अमेरिका से कुल वार्षिक आयात करीब 50 अरब डालर से भी कम है। 500 अरब डालर का आंकड़ा नीति से अधिक राजनीतिक नारेबाजी जैसा अधिक है। कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में भारत का पूर्ण उदारीकरण घरेलू राजनीति और सामाजिक स्थिरता के लिहाज से वैसे भी असंभव है।
मोदी का इन बिंदुओं पर मौन रहना दर्शाता है कि भारत इस समझौते को एक दिशात्मक संकेत के रूप में देख रहा है, न कि अंतिम और बाध्यकारी समझौते के रूप में। अपने स्वरूप में यह घटनाक्रम किसी ठोस समझौते से अधिक एक राजनीतिक ब्रेकथ्रू है। यह ट्रंप प्रशासन की उसी प्रवृत्ति के अनुरूप है, जिसमें पहले बड़े एलान किए जाते हैं और बाद में विवरण तय होते हैं। अतीत में यूरोपीय संघ, दक्षिण कोरिया और अन्य देशों के साथ भी ऐसे ‘फ्रेमवर्क समझौतों की घोषणा हुई, जिनका क्रियान्वयन जटिल और लंबा साबित हुआ। भारत-अमेरिका समझौता भी इसी श्रेणी में आता है।
इसमें तनाव घटाने, व्यापार बहाली और रणनीतिक खाई को पाटने जैसे लक्ष्य तो स्पष्ट हैं, लेकिन विवरण अभी शेष हैं। कभी-कभी कूटनीति में दिशा तय करना ही सबसे कठिन कार्य होता है। अमेरिका के दबाव में झुकने के बजाय भारत ने पिछले एक वर्ष में अपने विकल्प भी बढ़ाए। रूस के साथ ऊर्जा सहयोग, चीन के साथ सीमित राजनीतिक संवाद और सबसे महत्वपूर्ण यूरोपीय संघ के साथ ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौता। इस क्रम में यदि वाशिंगटन भारत के साथ व्यापारिक टकराव जारी रखता तो अमेरिकी कंपनियां दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते बड़े बाजार से बाहर हो जातीं।
यही वह बिंदु है, जिसने अमेरिका को अड़ियल रुख से पीटे हटने को विवश किया। इसमें यूरोपीय संघ के साथ समझौते ने निर्णायक भूमिका निभाई। अमेरिकी रुख में परिवर्तन भारत के लिए भी बड़ी राहत है, क्योंकि उसके 50 प्रतिशत टैरिफ ने भारत को एक बड़े बाजार में सीमित कर दिया था। अमेरिकी टैरिफ का 18 प्रतिशत पर आना न केवल भारतीय निर्यातकों के लिए राहत है, बल्कि यह भारत को फिर से एशियाई प्रतिस्पर्धियों की पंक्ति में खड़ा करता है। इसके चलते वस्त्र, परिधान, रत्न और समुद्री उत्पाद जैसे क्षेत्रों को संजीवनी मिलेगी।
चीन से बाहर निकल रही वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के लिए भारत फिर से एक व्यावहारिक विकल्प बन सकता है। उच्च टैरिफ के चलते जो अवसर भारत के हाथ से फिसल रहे थे, वे फिर से मुट्ठी में आ सकते हैं। अमेरिका के साथ बढ़ती निकटता चीन को भी यह संदेश देगी कि भारत के पास रणनीतिक विकल्प हैं। हालांकि मोदी की विदेश नीति का मूल तत्व अब भी रणनीतिक स्वायत्तता है। यह समझौता उस स्वायत्तता को त्यागने का नहीं, बल्कि उसे मजबूत करने का साधन है।
अमेरिका के साथ व्यापार समझौता एक नई शुरुआत है, कोई अंतिम पड़ाव नहीं। इसके सामने अवसर भी हैं और चुनौतियां भी। अवसर इसलिए कि यदि यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो भारत-अमेरिका संबंध वास्तव में वैश्विक राजनीति के केंद्र में आ सकते हैं। चुनौतियां इसलिए कि विवरणों में मतभेद, घरेलू दबाव और ट्रंप की अप्रत्याशित राजनीति इस प्रक्रिया को पटरी से उतार सकती है।
इसके बावजूद मोदी को श्रेय देना आवश्यक है। उन्होंने दिखाया कि भारत अब दबाव में झुकने वाला देश नहीं है। यह समझौता मोदी के उस दीर्घकालिक सोच का प्रतीक है, जिसमें भारत को एक आत्मविश्वासी, विकल्पों से भरपूर और वैश्विक स्तर पर प्रभावशाली शक्ति के रूप में स्थापित किया जाना है। भारत अब किसी भी सौदे में शर्तें तय करने के लिहाज से कहीं बेहतर स्थिति में है।
(लेखक जेएनयू में एसोसिएट प्रोफेसर एवं ‘द इंडियन फ्यूचर्स’ के संस्थापक हैं)













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