विचार: समानता की अनदेखी करने वाले नियम, यूजीसी नियमों पर 'सुप्रीम' रोक
भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है, जहां कानून सबके लिए बराबर होता है। यही हमारे संविधान का मूलभाव है। अगर कहीं सामान्य वर्ग के छात्र के साथ गलत हो रहा है, तो उसे भी न्याय मिलना चाहिए। ऐसा वातावरण बनाने पर भी काम हो, जहां शिकायत की नौबत कम आए।
HighLights
यूजीसी के इक्विटी नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक।
झूठी शिकायतों की जांच का स्पष्ट प्रावधान नहीं था।
सामान्य वर्ग के छात्रों में अन्याय की आशंकाएं बढ़ीं।
डॉ. ब्रजेश कुमार तिवारी। पिछले दिनों विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने प्रमोशन आफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026 नाम से एक नोटिफिकेशन जारी किया। इन नियमों का मकसद शैक्षणिक संस्थानों से धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान, नस्ल या दिव्यांगता के आधार पर भेदभाव को खत्म करना था, लेकिन इन नियमों ने व्यापक विवाद को जन्म दिया। सामान्य वर्ग के छात्र इस आशंका से घिर गए कि इन नियमों में उन्हें पहले से ही अपराधी मान लिया गया है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी है।
इन नियमों में शिकायत की सत्यता जांचने या झूठी शिकायतों को छांटने का कोई ठोस प्रविधान नहीं दिखता। हर आरोप पर तुरंत समिति बैठाकर तेज कार्यवाही तो तय है, लेकिन साक्ष्य की परख, गवाहों की सुनवाई, गोपनीयता और अपील जैसी प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है। आरोप लगते ही कार्रवाई होने की जल्दी में सही जांच कैसे होगी? यह बड़ा सवाल है। सवाल यह भी है कि यूजीसी की नई गाइडलाइन राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के लक्ष्यों और संवैधानिक निष्पक्षता के बीच कैसे सामंजस्य स्थापित कर पाएगी? वास्तव में न्याय न सिर्फ होना चाहिए, बल्कि होते दिखना भी चाहिए, अन्यथा भरोसा टूट जाता है।
कानूनी दृष्टिकोण से अनुच्छेद-14 के हिसाब से देखें तो यूजीसी के नए नियम समानता के अधिकारों की अनदेखी करते हैं, जबकि अनुच्छेद-15(1) जाति के आधार पर भेदभाव को रोकने का प्रविधान करता है। अदालतों ने कई बार माना है कि गरिमा, निष्पक्षता और उचित प्रक्रियाओं तक पहुंच जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न अंग है। यदि किसी शिक्षक या छात्र को जाति आधारित भेदभाव का सामना करना पड़ता है और वह अनुसूचित जाति या जनजाति या फिर ओबीसी में नहीं आता, तो उसके पास बचाव का कोई कानून न होना प्रक्रियात्मक अन्याय है। बड़ी बात यह है कि यूजीसी गाइडलाइन की धाराएं आपस में ही मेल नहीं खातीं। नियम-2 वंचित समूहों के खिलाफ भेदभाव मिटाने की बात करता है, दूसरी ओर नियम-3(सी) न्याय के अधिकार को केवल कुछ जातियों तक सीमित कर देता है।
पिछले वर्ष फरवरी में यूजीसी ने नियमों का मसौदा संस्करण सार्वजनिक सुझावों के लिए जारी किया था। इसमें अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को जाति-आधारित भेदभाव के दायरे से बाहर रखा गया था। मसौदा नियमों में यह भी प्रस्ताव था कि भेदभाव की झूठी शिकायतों को ‘हतोत्साहित’ किया जाए और इसके लिए जुर्माने का प्रविधान रखा गया था, लेकिन अंतिम अधिसूचित नियमों में झूठी शिकायतों से संबंधित प्रविधान हटा दिया। वास्तव में झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों से निपटने वाले प्रविधानों को हटाना इस गाइडलाइन के लिए ढांचागत कमजोरी के रूप में सामने आया।
अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण 2021-22 के अनुसार उच्च शिक्षा में 60 प्रतिशत विद्यार्थी आरक्षित वर्ग से थे। ऐसे में यह भी बड़ा सवाल है कि इन 60 प्रतिशत विद्यार्थियों में ही कोई किसी का जाति आधारित भेदभाव करता है तो क्या होगा? इस पर ये नियम चुप हैं। जिस प्रकार अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 और दहेज उत्पीड़न विरोधी धारा-498 ए के तहत कई बार ऐसे उदाहरण मिले हैं जहां झूठे या गलत मामले दर्ज कराए गए और निर्दोष फंसे, वैसा ही खतरा यूजीसी के समता नियमों में भी दिख रहा था। स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इनके दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए गिरफ्तारी से पहले प्राथमिक जांच सुझाए थे।
दुनिया भर के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय और शिक्षण प्रणालियां भी विविधता और समानता के सिद्धांत अपनाती हैं। अमेरिका के प्रत्येक विश्वविद्यालय के पास एक स्वतंत्र इकाई होती है, जो भेदभाव या उत्पीड़न की शिकायतों की जांच करती है। इस जांच प्रक्रिया में शिकायतकर्ता और आरोपी, दोनों के अधिकारों का ध्यान रखा जाता है। जांच प्रोटोकाल में साक्ष्यों के मानक, अपील का अवसर, गोपनीयता आदि को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाता है, ताकि न्याय हो भी और होता हुआ दिखे भी।
अक्सर वहां बाहरी या तटस्थ जांचकर्ता नियुक्त किया जाता है, रिपोर्ट लिखित रूप में तैयार होती है और दोनों पक्षों को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका मिलता है। इसी तरह ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया आदि की उच्च शिक्षण संस्थानों में भी एंटी-डिस्क्रिमिनेशन नीतियां सबके लिए समान होती हैं। कोई भी छात्र यदि उत्पीड़न झेलता है, चाहे वह अल्पसंख्यक समूह का हो या बहुसंख्यक का, उसके लिए शिकायत दर्ज करने और न्याय पाने का प्रविधान होता है।
हार्वर्ड, आक्सफोर्ड आदि ने नियमित सेंसिटाइजेशन वर्कशाप, मेंटारिंग प्रोग्राम और डायवर्सिटी कोर्स-वर्क शुरू किए हैं, ताकि छात्र-छात्राओं में पारस्परिक सम्मान एवं संवेदनशीलता विकसित हो। समता का वास्तविक अर्थ है सभी के साथ न्याय। एक कमजोर को ताकत देकर दूसरे को कमजोर करना समाधान नहीं। सभी को साथ लेकर चलना ही टिकाऊ रास्ता है। भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है, जहां कानून सबके लिए बराबर होता है। यही हमारे संविधान का मूलभाव है। अगर कहीं सामान्य वर्ग के छात्र के साथ गलत हो रहा है, तो उसे भी न्याय मिलना चाहिए। ऐसा वातावरण बनाने पर भी काम हो, जहां शिकायत की नौबत कम आए।
(लेखक जेएनयू के अटल स्कूल आफ मैनेजमेंट में प्रोफेसर हैं)













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