यह एक विडंबना ही है कि सुप्रीम कोर्ट को उच्च शिक्षा संस्थानों में शिक्षकों के रिक्त पदों को चार माह के अंदर भर्ती करने के आदेश देने पड़े। इसके प्रति तो सरकारों को सजग रहना चाहिए था। चूंकि वे इसे लेकर तत्पर नहीं कि शिक्षकों के रिक्त पद प्राथमिकता के आधार पर भरे जाएं, इसलिए सरकारी और साथ ही निजी क्षेत्र के उच्च शिक्षा संस्थानों में बड़ी संख्या में शिक्षकों के पद रिक्त हैं।

यह ठीक नहीं कि जो काम सरकार को करना चाहिए, वह सुप्रीम कोर्ट को करना पड़ा। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि कई बार शिक्षकों के पद वर्षों तक खाली पड़े रहते हैं। स्थिति कितनी खराब है, इसका पता इससे चलता है कि शिक्षकों के रिक्त पदों की समस्या से केंद्रीय विश्वविद्यालय भी जूझ रहे हैं।

इसका मतलब है कि शिक्षा मंत्रालय भी इसके प्रति सजग नहीं कि शिक्षकों के पद लंबे समय तक रिक्त न रहें। सजगता के इस अभाव के चलते कई विश्वविद्यालयों में तो कुलपति के पद भी रिक्त बने रहते हैं। समझना कठिन है कि ऐसा क्यों है? निःसंदेह यह नहीं कहा जा सकता कि शिक्षकों के रिक्त पदों को भरने के लिए योग्य अभ्यर्थियों का अभाव है।

शिक्षकों के पद रिक्त रहने से शिक्षा संस्थानों में कई तरह की समस्याएं घर कर जाती हैं। इसके चलते पठन-पाठन तो प्रभावित होता ही है, छात्रों की परेशानियां भी बढ़ जाती हैं। इन्हीं परेशानियों पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में शिक्षकों और गैर शिक्षकों के पद बड़ी संख्या में खाली पड़े हुए हैं।

इसे इससे समझा जा सकता है कि बिहार के विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के चार हजार पद रिक्त हैं। हरियाणा में किसी विश्वविद्यालय में छह साल से तो किसी में आठ साल से प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर की भर्ती नहीं हुई है। नतीजा यह है कि करीब 60 प्रतिशत पद रिक्त हैं। इसी तरह मध्य प्रदेश के 19 सरकारी विश्वविद्यालयों में से 15 में शिक्षकों के 70 प्रतिशत से ज्यादा पद खाली पड़े हैं। यही स्थिति अन्य राज्यों में भी है।

इसका अर्थ है कि उच्च शिक्षा भगवान भरोसे चल रही है। यह दयनीय दशा तब है, जब नई शिक्षा नीति लागू हुए पांच वर्ष बीत गए हैं और उसमें छात्र-शिक्षक अनुपात पर विशेष बल दिया गया है। समस्या केवल यह नहीं कि शिक्षकों के ही पद बड़ी संख्या में रिक्त हैं। शिक्षकों के साथ-साथ गैर शिक्षकों के भी पद रिक्त हैं। यह और कुछ नहीं उच्च शिक्षा के ढांचे को कमजोर करने वाली स्थिति ही है। यह समझने में देर नहीं करनी चाहिए कि उच्च शिक्षा के स्तर में बहुत सुधार की आवश्यकता है और इसकी पूर्ति शिक्षकों के पद रिक्त रहते हुए संभव नहीं।