आदित्य सिन्हा। आम बजट में अब एक पखवाड़ा ही शेष बचा है। इससे पहले आर्थिक मोर्चे पर दो विरोधाभासी तस्वीरें दिख रही हैं। एक ओर जहां भारत तेजी से वृद्धि कर रहा है, वहीं सरकार वित्तीय मोर्चे पर अपेक्षाकृत सतर्क दिखाई दे रही है। वह खर्च से लेकर उधारी और कल्याणकारी वादों के प्रति सावधान है। वैसे तो ये दोनों परिदृश्य अपनी-अपनी जगह पर सही हैं, लेकिन अधिकांश लोग इसे समझ नहीं पाते। इसके पीछे एक बड़ा कारण यह पता नहीं होना है कि अर्थव्यवस्था जिस गति से वृद्धि कर रही है, क्या उसी अनुपात में संसाधनों का भी सृजन हो पा रहा है या नहीं?

अच्छे परिदृश्य की पहले चर्चा करें तो भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूती से आगे बढ़ रही है। सरकार के पहले अग्रिम अनुमान के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था के चालू वित्त वर्ष 7.4 प्रतिशत की दर से बढ़ने की उम्मीद है। यह पिछले वर्ष की 6.5 प्रतिशत की वृद्धि से अधिक होगी। कुछ ही दिन पहले दूसरी तिमाही के आंकड़े भी आए थे, जिनमें 8.2 प्रतिशत की गजब की तेजी दिखी थी। यह वृद्धि सामान्य जनजीवन में भी नजर आती है। वाहनों की बिक्री बढ़ रही है। हवाई यात्रा में तेजी आई है। वित्त, परिवहन, आतिथ्य सत्कार और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों का निरंतर विस्तार हो रहा है। बेरोजगारी में कमी आई है और मनरेगा (जो अब बीवी-जी-राम जी है) के तहत काम की तलाश घटी है। स्पष्ट है कि लोग कहीं बेहतर विकल्प खोज रहे हैं, जो सकारात्मक संकेत है।

हालिया आंकड़ों के अपवाद को छोड़ दिया तो महंगाई का रुख भी नरम है। खाद्य कीमतों से लेकर ईंधन की दरों में स्थिरता बनी हुई है। इससे घरेलू बजट पर दबाव घटा है और रिजर्व बैंक के लिए ब्याज दरें घटाने की गुंजाइश बढ़ी है। अगर लोगों के नजरिये से देखा जाए तो ऊंची वृद्धि और नरम महंगाई की स्थिति बहुत अनुकूल कही जाएगी। तब फिर चिंता किस बात को लेकर है? असल समस्या वृद्धि में नहीं, बल्कि आमदनी के स्तर पर है। सीधे शब्दों में कहा जाए तो अर्थव्यवस्था अधिक वस्तुएं और सेवाएं तो उत्पन्न कर रही है, लेकिन उनका कुल मूल्य उतनी तेजी से नहीं बढ़ रहा है।

बढ़ना तो दूर कुछ क्षेत्रों में तो कीमतें गिर रही हैं। यह सुनने में अच्छा लग सकता है, लेकिन इसके अपने निहितार्थ होते हैं, जिनकी कुछ दूसरे मोर्चों पर कीमत चुकानी पड़ती है। चाहे जीएसटी हो, आयकर हो या कारपोरेट कर, उन पर राजस्व की प्राप्ति लेनदेन के आधार पर ही निर्भर करती है। जब लेनदेन में वृद्धि धीमी होती है तो कर संग्रह भी धीमा हो जाता है। देखा जाए तो पिछले वर्ष की तुलना में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर वृद्धि में कुछ कमजोरी का रुझान है। सरकारी आमदनी भले ही घट जाए, लेकिन वेतन, पेंशन, ब्याज भुगतान और कल्याणकारी योजनाओं की देनदारी तो जस की तस बनी रहती है।

जब सरकार ने सड़कों, रेलवे, बंदरगाहों, आवास और ऊर्जा आदि में बड़े निवेश के इरादे जताए हों तो संसाधनों की आवश्यकता स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। इसलिए कोई हैरानी की बात नहीं कि सरकार एक मुश्किल संतुलन साधने की चुनौती का सामना कर रही है। अगर राजस्व प्राप्ति में कुछ संकुचन दिखता है तो जाहिर है कि उसे या तो अधिक उधारी लेनी पड़ेगी या किसी अन्य मोर्चे पर कटौती का विकल्प अपनाना होगा। नई महत्वाकांक्षी घोषणाओं को लेकर भी संयम बरतना पड़ेगा। आगामी बजट के समक्ष इन चुनौतियों से पार पाने की भी एक बड़ी चुनौती होगी। इस कहानी में कई पेच और भी हैं।

एक पेच वृद्धि की असमान प्रकृति से भी जुड़ा है। शहरी उपभोग में तेजी बनी हुई है। एक तबका बड़ी तादाद में नई कारें खरीद रहा है तो आलीशान सैर-सपाटे पर खर्च में भी उसे संकोच नहीं। दूसरी ओर, विनिर्माण जैसा महत्वपूर्ण क्षेत्र सुस्ती का शिकार बना हुआ है। हाल में बिजली की मांग में कमी आई है। इसका एक कारण मौसमी भी हो सकता है, लेकिन कुछ औद्योगिक गतिविधियों में शिथिलता को अनदेखा नहीं किया जा सकता। विनिर्माण की महत्ता को इस कारण भी उपेक्षित नहीं किया जा सकता, क्योंकि न केवल इससे बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन होता है, बल्कि इससे कर राजस्व को लेकर भी कहीं अधिक निरंतरता बनी रहती है।

बाहरी मोर्चे पर स्थितियां नियंत्रण में अवश्य, लेकिन जोखिम से मुक्त नहीं हैं। मजबूत सेवा निर्यात और विदेश में बसे भारतीयों द्वारा भेजी गई राशि के दम पर चालू खाता घाटा कुछ घटा है। विदेशी मुद्रा भंडार भी सहज स्थिति में है, लेकिन वैश्विक अनिश्चितताएं कभी भी संकट खड़ा कर सकती हैं। तमाम उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं पूंजी प्रवाह को लेकर अस्थिरता का सामना कर रही हैं। डालर के मुकाबले रुपये की हैसियत भी आयात लागत से लेकर निवेशकों की धारणा को प्रभावित कर रही है। ऊपर से अमेरिकी टैरिफ ने भारत की चिंताओं को और बढ़ाने का काम किया है।

बजट में वित्त मंत्री को इन चिंताओं का संज्ञान लेना होगा। इसमें कर वृद्धि अनुमान को लेकर बहुत सावधानी बरतनी होगी। उधारी की योजनाओं को लेकर भी सतर्कता आवश्यक होगी, ताकि ब्याज अदायगी को लेकर अतिरिक्त बोझ न बढ़े? राजस्व अनिश्चितता की स्थिति में बड़े वादों को निभाने में मुश्किल आती है। जबकि निवेश संबंधी या कल्याणकारी योजनाओं में कटौती आर्थिक वृद्धि से लेकर सामाजिक कल्याण की प्रक्रिया को पलट सकती है। संभव है कि बजट में बड़ी घोषणाओं के बजाय स्थिरता सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित हो। किसी बड़ी घोषणा या जोखिम भरे प्रयोगों के आसार नहीं लगते।

सरकार बुनियादी ढांचे पर निरंतर जोर और कल्याणकारी योजनाओं को समर्थन देना जारी रखेगी। इसमें एक संभावना यह है कि सरकार विनियमन यानी नियमों को और सरल-सुगम बनाने की राह पर ही आगे बढ़े। ऐसा हुआ तो इससे उद्योगों से लेकर श्रमिकों तक सही संदेश जाएगा कि सरकार आर्थिक गतिविधियों के विस्तार में भरोसा रखती है। यह दांव घरेलू-विदेशी निवेशकों को भी आश्वस्त करेगा कि भारत भलीभांति समझता है कि वृद्धि केवल खर्च पर नहीं, बल्कि खर्च की गुणवत्ता पर भी उतनी ही निर्भर होती है। इससे राज्य सरकारों को भी अपने बजट में विनियमन को लेकर सही मार्गदर्शन मिलेगा।

(लेखक लोक-नीति विश्लेषक हैं)