विचार: भारत की चिंता बढ़ाता ईरान का संकट
जनवरी के मध्य में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची की संभावित भारत यात्रा इसी दृष्टिकोण को दर्शाती है, जिसमें चाबहार, क्षेत्रीय संपर्क, व्यापार और पश्चिम एशिया के व्यापक मुद्दों पर चर्चा की संभावना है। इस साल भारत ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है ‘ग्लोबल साउथ’ की एक प्रमुख आवाज होने के नाते भी इस मामले में उसकी भूमिका अहम हो जाती है। इसमें भारत के लिए चुनौती यह है कि वह अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करे और वह भी ईरान के आंतरिक संघर्षों या महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता में उलझे बिना।
HighLights
ईरान में दिसंबर 2025 से व्यापक विरोध-प्रदर्शन जारी हैं।
आर्थिक कुप्रबंधन और महंगाई प्रमुख कारण बने हैं।
भारत के चाबहार बंदरगाह निवेश पर संकट का असर।
आनंद कुमार। दिसंबर 2025 के अंत में ईरान में शुरू हुए व्यापक विरोध-प्रदर्शनों ने इस इस्लामिक गणराज्य के समक्ष हाल के वर्षों की सबसे गंभीर आंतरिक चुनौती खड़ी कर दी है। महंगाई, मुद्रा अवमूल्यन और आर्थिक कुप्रबंधन के खिलाफ शुरू हुआ यह जनाक्रोश जल्द ही एक राजनीतिक संकट में बदल गया, जिसमें प्रदर्शनकारी खुलकर सत्ता परिवर्तन की मांग करने लगे। ईरान का आर्थिक संकट कोई नया घटनाक्रम नहीं है। वर्षों से ढांचागत कमजोरियों, भ्रष्टाचार, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और नीतिगत गलतियों ने उसकी अर्थव्यवस्था को कमजोर किया है।
ईरानी मुद्रा में तेज गिरावट, खाद्य पदार्थों की दरों में उछाल और व्यापक बेरोजगारी ने दिसंबर में विरोध की चिंगारी सुलगा दी। यह आंदोलन पहले तेहरान के बाजारों से शुरू हुआ और कुछ ही दिनों में देश के सभी 31 प्रांतों में 300 से अधिक स्थानों पर फैल गया। सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और मजहबी सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ नारे संकेत हैं कि शासन की वैधता पर गहरा सवाल खड़ा हो चुका है। ईरान का मौजूदा संकट यही दर्शाता है कि आर्थिक कुप्रबंधन और राजनीतिक कठोरता के दीर्घकालिक रणनीतिक परिणाम होते हैं।
भारत के लिए भी यह संकट केवल एक दूरस्थ आंतरिक उथल-पुथल नहीं, बल्कि पश्चिम और मध्य एशिया में रणनीतिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक हितों से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। ईरानी सरकार की प्रतिक्रिया सख्त और दमनकारी रही है। मानवाधिकार संगठनों के अनुसार सैकड़ों लोगों की मौत हुई है, जिनमें नाबालिग भी शामिल हैं। जहां राष्ट्रपति मसूद पेजेशिकियन ने संयम बरतने और हिंसा से बचने की अपील की है, वहीं न्यायपालिका, सुरक्षा तंत्र और सर्वोच्च नेतृत्व का रुख कहीं अधिक सख्त है। यह संकट से निपटने में शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर असहमति को भी दर्शाता है। इंटरनेट ब्लैकआउट भी इसका संकेतक है कि सत्ता प्रतिष्ठान सड़क और सूचना दोनों पर नियंत्रण खोने से चिंतित है।
ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शन अब केवल आर्थिक या राजनीतिक ही नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक और वैचारिक स्वरूप भी ले चुके हैं। कई स्थानों पर शाह के दौर का ‘शेर और सूरज’ वाला झंडा लहराया गया और निर्वासित पूर्व युवराज रजा पहलवी की तस्वीरें दिखाई गई हैं। इन प्रतीकों का उभरना इस्लामिक रिपब्लिक की वैचारिक नींव को चुनौती देने का स्पष्ट संकेत है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि यदि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को नुकसान पहुंचाया गया तो ईरान को गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। यूरोपीय देशों, आस्ट्रेलिया और कनाडा ने भी बल प्रयोग, मनमानी गिरफ्तारियों और इंटरनेट बंदी की निंदा की है। इसके जवाब में तेहरान ने अमेरिका और इजरायल पर विरोध भड़काने का आरोप लगाया है और समूचे घटनाक्रम को विदेशी साजिश बताया है।
इस पूरे परिदृश्य ने भारत की चिंताएं बढ़ा दी हैं। ऐसी ही एक चिंता ट्रंप प्रशासन द्वारा ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ से जुड़ी है। इससे भी बड़ी चिंता चाबहार बंदरगाह परियोजना को लेकर है, जिसमें भारत ने करीब 50 करोड़ डालर का निवेश किया है। यह बंदरगाह भारत के लिए पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान, मध्य एशिया, रूस और यूरोप तक पहुंच प्रदान करता है। यह ‘कनेक्ट सेंट्रल एशिया’ नीति का अहम स्तंभ और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे यानी आइएनएसटीसी का प्रमुख हिस्सा है, जिससे परिवहन समय और लागत में उल्लेखनीय कमी आने की उम्मीद है।
ईरान में लंबे समय तक चलने वाली अस्थिरता इस परियोजना की समयसीमा, निरंतरता और रणनीतिक मूल्य को प्रभावित कर सकती है। चाबहार को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह में चीन की मौजूदगी के संतुलन के रूप में भी देखा जाता रहा है, जो चाबहार से मात्र 170 किलोमीटर दूर है। यदि ईरान में अस्थिरता लंबे समय तक बनी रहती है, तो बीजिंग को वहां अपने प्रभाव विस्तार का अवसर मिल सकता है। विशेषकर तब जब तेहरान को पश्चिमी दबाव के बीच आर्थिक और राजनीतिक समर्थन की आवश्यकता पड़े।
भारत के ऊर्जा हित भी इस परिदृश्य से जुड़े हैं। प्रतिबंधों के कारण भले ही हाल के वर्षों में ईरान से ऊर्जा आयात सीमित रहा हो, लेकिन क्षेत्रीय ऊर्जा समीकरणों में ईरान की भूमिका अहम बनी हुई है। राजनीतिक अस्थिरता भविष्य के ऊर्जा सहयोग को और जटिल बना सकती है। इन परिस्थितियों में भारत की कूटनीतिक रणनीति संतुलित और व्यावहारिक रही है। नई दिल्ली ने ईरानी नेतृत्व के साथ संवाद बनाए रखा है और रणनीतिक सहयोग को तात्कालिक अस्थिरता से अलग रखने की कोशिश की है।
जनवरी के मध्य में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची की संभावित भारत यात्रा इसी दृष्टिकोण को दर्शाती है, जिसमें चाबहार, क्षेत्रीय संपर्क, व्यापार और पश्चिम एशिया के व्यापक मुद्दों पर चर्चा की संभावना है। इस साल भारत ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है ‘ग्लोबल साउथ’ की एक प्रमुख आवाज होने के नाते भी इस मामले में उसकी भूमिका अहम हो जाती है। इसमें भारत के लिए चुनौती यह है कि वह अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करे और वह भी ईरान के आंतरिक संघर्षों या महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता में उलझे बिना।
(लेखक मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फार डिफेंस स्टडीज में एसोसिएट फेलो हैं)













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