जी. किशन रेड्डी। आज-कल “जेन-जी” शब्द काफी पॉपुलर हो रहा है। जो आज के युवाओं को प्रतिबिंबित करता है, यानी 1995 से 2010 के बीच पैदा हुए लोग। यह पीढ़ी डिजिटल दुनिया, सोशल मीडिया व टेक्नोलॉजी के साथ बड़ी हुई है और ये अपनी तेज तर्रार सोच व बदलावों के लिए जानी जाती हैं। आज “जेन-जी” शब्द भारत में घर-घर की बातचीत का हिस्सा बन गया है। इस शब्द ने अपनी खुद ही कई तरह की राय बनाई है।

कुछ लोग “जेन-जी” पीढ़ी के जोश, आज़ादी और सोच की स्पष्टता की तारीफ़ करते हैं, तो कुछ को लगता है कि नेपाल, बंगलादेश और मेडागास्कर जैसे देशों में सरकारों को ध्वस्त करने के लिए इस पीढ़ी के अंदर का गुस्सा और बेचैनी ही ज़िम्मेदार है। इन सब बहसों के बावजूद, युवाओं में जो ऊर्जा, उत्साह और ऊंचाइयों को छू लेने की चाहत है, उसे नकारा नहीं जा सकता।

अनेक लोगों ने भारत में “जेन-जी” यानि युवा शक्ति को भटकाने का हर संभव प्रयास किया, मगर भारत की “जेन-जी” ने भारत में विनाश नहीं भारत के विकसित होने के संकल्प को चुना है, उन्होंने भारत के विकास में खुद को झोंक देने की प्रतिबद्धता को साबित किया है। आज भारत की सफलता की कहानियों में भारत के युवाओं की कहानी है। भारत की “जेन-जी” को ‘स्व’ का बोध है और इसलिए वह ‘अमृत काल का अमृत वर्ग’ बनकर उभरा है।

भारत का उत्थान भारत के मूल में ही समाहित है। भारत का भविष्य और उसकी प्रगति उसकी गहरी सांस्कृतिक जड़ों, समृद्ध परंपराओं, प्राचीन ज्ञान, स्वदेशी क्षमताओं और 'आत्मनिर्भरता' के भाव में ही निहित है। 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने 75वें स्वतंत्रता दिवस के भाषण में इस सोच को और अधिक मज़बूत किया, जब उन्होंने पंच प्रण (5 संकल्प) के बारे में बात की, उन्होंने प्रत्येक भारतीय से गुलामी की हर मानसिकता से मुक्ति और अपनी विरासत पर गर्व करने की अपील की।

आज इसी सोच को आत्मसात करते हुए भारत के युवा वर्ग ने अपनी परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक जड़ों के साथ एक सचेत जुड़ाव साबित किया है। आज के भारतीय युवा हाथ में स्मार्टफोन लेकर ग्लोबलाइज़्ड दुनिया में घूम रहे हैं, लेकिन आधुनिकता और विरासत के बीच संतुलन साधते हुए वे भारत की सदियों पुरानी परंपराओं के ज़रिए अर्थ, पहचान और निरंतरता की तलाश भी कर रहे हैं।

आज मंदिर जाना, तीर्थाटन करना, भारतीय दर्शन, योग और शास्त्रीय संगीत जैसी प्राचीन प्रथाओं में दिलचस्पी सिर्फ़ पुरानी पीढ़ियों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय युवाओं के लिए ये जुड़ाव आंतरिक संतुलन की एक अद्भुत अभिव्यक्ति है। हाल ही में यह बदलाव नए साल की शाम के जश्न के दौरान युवाओं में प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दिया, जब हज़ारों युवाओं ने काशी विश्वनाथ मंदिर, राम मंदिर अयोध्या, बांकेबिहारी वृंदावन और श्री तिरुपति बाला जी के मंदिर में नए साल का स्वागत करने का फैसला किया। ऐसे समय में जब आमतौर पर शहरी त्योहारों और नाइटलाइफ़ से जुड़ा होता है, दुनिया के सबसे पुराने आध्यात्मिक केंद्रों में युवा भक्तों की भीड़ का नज़ारा गहरा सांकेतिक मतलब रखता है।

इतना ही नहीं विगत वर्ष प्रयागराज कुम्भ मेले में सबसे अधिक युवाओं की सहभागिता रही। मेरे प्रवास के दौरान मैं कई बार देखता हूँ कि अनेक युवा भारत को देखने, समझने और जानने के लिए पैदल यात्रा, साइकिल यात्रा और ट्रेन यात्रा कर रहे हैं। जो दर्शाता है कि भारत का “जेन-जी” इस आधुनिक युग में “विकास भी और विरासत भी” के मंत्र के साथ अपनी ही परंपराओं को लेकर दृढता से आगे बढ़ रहा है।

इस “जेन-जी” की असली ताकत को पहचानने का काम सबसे पहले स्वामी विवेकानंद ने किया। उन्होंने कहा था कि “मेरा विश्वास युवा पीढ़ी पर है- आधुनिक पीढ़ी पर है। उन्ही में से मेरे कार्यकर्ता निकल कर आगे आयेंगे, जो सिंह के समान विश्व की सारी समस्यओं को सुलझा देंगे।" हम देखते हैं कि आजादी के आंदोलन में इसका प्रभाव बहुत अधिक देखने को मिला, कई प्रमुख क्रांतिकारियों जैसे भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, अरबिंदो घोष, भूपेंद्रनाथ दत्त और हेमचंद्र घोष जैसे नेताओं को स्वामी विवेकानंद के साहित्य और विचारों से प्रेरणा मिली। वर्तमान में विकसित भारत 2047 के लक्ष्य के लिए इसी विश्वास के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमारे युवाओं को नीति, निर्णय और नेतृत्व में शामिल कर रहे हैं, उन्हें प्रेरित कर रहे हैं और उन्हें नए अवसर भी प्रदान कर रहे हैं।

आजादी के बाद युवा शक्ति को कई दशकों तक मुख्यधारा से अलग रखा गया, मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस शक्ति को मंच प्रदान किया। सबसे पहले उन्होंने सरकर के कई बड़े जनभागीदारी अभियानों में युवाओं को शामिल किया और युवाओं ने कर दिखाया, जैसे - स्वच्छता अभियान, हर घर तिरंगा, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, नशा मुक्त भारत और एक पेड़ माँ के नाम आदि अनेक अभियानों को हमारे युवाओं ने ही सफल बनाया है। हमारे युवाओं ने 125 से अधिक यूनिकॉर्न बनाए हैं, जो जॉब क्रिएटर के तौर पर उनकी भूमिका को मज़बूत करते हैं।

सवा सौ साल पहले स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि "मुझे केवल सौ ऊर्जावान युवा दे दो और मैं इस देश का नक्शा बदल दूंगा"। आज देश की आबादी बढ़ी है, मगर इस विचार को आगे बढ़ाते हुए प्रधनमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1 लाख युवाओं को राजनीति में आने और देश बनाने में योगदान देने की अपील की है। खासकर उन युवाओं को जिनके परिवार की पृष्ठभूमि राजनीतिक नहीं है। उन्होंने पब्लिक लाइफ में युवाओं की ज़्यादा भागीदारी पर ज़ोर दिया। विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग एक ऐसा ही प्लैटफ़ॉर्म है, जिसे इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए शुरू किया गया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने युवा नागरिकों से उनकी उम्मीदों, चिंताओं और विचारों को समझने के लिए लगातार बातचीत की है। प्रधानमंत्री मोदी की अपील के जवाब में, भारतीय जनता पार्टी ने हाल ही में युवा नेताओं को अहम संगठनात्मक ज़िम्मेदारियाँ सौंपी हैं - जिसका उदाहरण युवा पीढ़ी से बीजेपी के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष की नियुक्ति भी है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस नज़रिए को और मज़बूत करता है कि गवर्नेंस को अनुभव और इनोवेशन के बीच बैलेंस बनाना चाहिए। राजनीतिक नेतृत्व में यह एक बड़े सामाजिक बदलाव को दर्शाता है, जो तेज़ी से युवा उम्मीदों और युवा-भागीदारी के कारण आकार ले रहा है।

स्वामी विवेकानंद का यह पक्का विश्वास है कि भारत का भविष्य उसके युवाओं की ताकत, अनुशासन और नैतिक मूल्यों में निहित है। इसलिए वो अपने एक भाषण में कहते हैं कि 19वीं सदी यूरोप की थी, 20वीं सदी अमेरिका की है और 21वीं सदी भारत की सदी होगी।

स्वामी जी के अनुसार, भारत का उत्थान तभी संभव है जब हम अपनी मातृभूमि को ही अपना ईश्वर मानकर उसकी सेवा करें, अतीत के गौरव को सामने रखकर वर्तमान को श्रेष्ठ बनाएं और भारतीय संस्कृति व आध्यात्मिकता के मूल सिद्धांतों को अपनाएं। आज जब हम सब मिलकर 2047 तक एक विकसित भारत बनाने की सोच रहे हैं, तो हम देखते हैं कि इन लक्ष्यों को पाने में भारत के ‘जेन-जी’ की भूमिका सराहनीय है।

(लेखक केंद्रीय कोयला और खान मंत्री हैं और सिकंदराबाद लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं)