विचार: डिजिटल दुनिया में भी हो साफ-सफाई
शिक्षा विभाग को स्कूल-कालेज स्तर पर डिजिटल साक्षरता को अनिवार्य विषय बनाना चाहिए। सूचना प्रदूषण को यदि हम समय रहते नियंत्रित नहीं कर पाए, तो सत्य की जगह झूठ, विश्वास की जगह संदेह और सद्भाव की जगह नफरत हावी हो जाएगी। इंटरनेट ने दुनिया को जोड़ा है, लेकिन अब इसे साफ-सुथरा रखना सबकी जिम्मेदारी है।
HighLights
विश्व आर्थिक मंच ने गलत सूचना को शीर्ष वैश्विक जोखिम बताया।
भारत सूचना प्रदूषण का सबसे बड़ा केंद्र, गंभीर परिणाम।
डिजिटल साक्षरता और फैक्ट-चेकिंग समाधान के लिए महत्वपूर्ण।
अवधेश कुमार यादव। डिजिटल युग सूचना की बाढ़ लेकर आया है। हर सेकेंड में लाखों-करोड़ों की संख्या में टेक्स्ट, आडियो, वीडियो और इमेज पोस्ट दुनिया भर में फैल रहे हैं। इंटरनेट ने अभूतपूर्व रूप से सूचना की पहुंच को सुलभ बनाया है। इस अभूतपूर्व तेजी ने ‘सूचना प्रदूषण’ के गंभीर खतरा को भी जन्म दिया है, क्योंकि मौजूदा समय में सत्य के साथ-साथ झूठी, आधा-अधूरी और गैर-जरूरी सूचनाओं की संख्या लगातार बढ़ती जा रही हैं, जिसके चलते सत्य और असत्य को पहचानना लगभग असंभव हो गया है।
इसे मिसइंफार्मेशन (अनजाने में फैलाई गई भ्रामक सूचना), डिसइंफार्मेशन (जानबूझकर फैलाई गई गलत सूचना) और मालइंफार्मेशन (सही, लेकिन दुरुपयोग की जा सकने वाली सूचना) के रूप में समझा जाता है। विश्व आर्थिक मंच की वैश्विक जोखिम रिपोर्ट-2025 के अनुसार मिसइंफार्मेशन और डिसइंफार्मेशन के मामले लगातार दूसरे वर्ष शार्ट-टर्म वैश्विक जोखिमों में सबसे ऊपर हैं। रिपोर्ट बताती है कि यह जोखिम समाज की एकता, शासन व्यवस्था और लोगों के आपसी विश्वास को गहराई से कमजोर कर रहा है। वैश्विक स्तर पर यह समस्या इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई विशेषज्ञ इसे लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं। ऐसे ही खतरे का एक उदाहरण है ग्रोक एआइ से उपजी अश्लील सामग्री।
एक अध्ययन के अनुसार दुनिया भर में 86 प्रतिशत लोग कभी न कभी गलत सूचना के संपर्क में आ चुके हैं। इंटरनेट मीडिया पर साझा होने वाली सामग्री में से 40 प्रतिशत फर्जी मानी जाती है। आनलाइन उपलब्ध कुल सामग्री में से 62 प्रतिशत के अविश्वसनीय या झूठी होने की संभावना होती है। नकली वीडियो और नकली आवाज में 2019 से अब तक 550 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। एक अनुमान के मुताबिक 2025 में लगभग 80 लाख नकली वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किए गए।
भारत इस समस्या का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। विश्व आर्थिक मंच की 2024 और 2025 की रिपोर्ट में भारत को गलत सूचना और जानबूझकर झूठी सूचना के सबसे ज्यादा जोखिम वाले देश के रूप में लगातार शीर्ष पर रखा गया है। 2025 की शुरुआत में भारत में लगभग 80.6 करोड़ इंटरनेट उपयोगकर्ता थे, जो कुल आबादी का 55.3 प्रतिशत था। यह संख्या 2025 में 90 करोड़ को पार कर गई। इतनी बड़ी डिजिटल आबादी के साथ भारत में ‘सूचना प्रदूषण’ का प्रभाव कई स्तरों पर दिखता है। यह चुनावों को प्रभावित करता है, सामाजिक सद्भाव को तोड़ता है और हिंसा को भड़काता है।
भारत में ‘सूचना प्रदूषण’ का सबसे बड़ा स्रोत डिजिटल मीडिया है। 2023 की एक रिपोर्ट के अनुसार वाट्सएप पर 64 प्रतिशत गलत सूचना फैलती है, उसके बाद फेसबुक पर 18 प्रतिशत और एक्स पर 12 प्रतिशत होता है। इंटरनेट मीडिया पर फैलने वाली फर्जी खबरों का 77.4 प्रतिशत हिस्सा डिजिटल मीडिया, 23 प्रतिशत मुख्यधारा के संचार माध्यमों से तथा शेष अन्य माध्यमों से आता है। इन फर्जी पोस्टों में सर्वाधिक 46 प्रतिशत राजनीतिक होते हैं। उसके बाद 33.6 प्रतिशत सामान्य मुद्दों और 16.8 प्रतिशत धार्मिक मुद्दों पर केंद्रीत होते हैं। इन तीनों को मिलाकर देखें तो इंटरनेट मीडिया पर फर्जी खबरों की हिस्सेदारी 96.4 प्रतिशत होती है।
राजनीतिक फेक न्यूज चुनावों में सबसे खतरनाक साबित होती है। 2024 के लोकसभा चुनावों में एआइ से बनी सामग्री का उपयोग अभूतपूर्व स्तर पर हुआ। पांच करोड़ से अधिक कृत्रिम आवाज वाली काल मतदाताओं तक पहुंचाई गईं। 2025 में भी यह सिलसिला जारी रहा। बिहार विधानसभा चुनावों में एआइ से बने नकली वीडियो, नकली आडियो और व्यक्तिगत संदेशों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ। चुनाव आयोग ने एआइ को चिह्नित करने के निर्देश दिए, लेकिन दर्जनों शिकायतों के बावजूद अधिकांश नकली सामग्री पकड़ में नहीं आई।
सूचना प्रदूषण के प्रभाव विनाशकारी हैं। धार्मिक और जातीय आधार पर फर्जी वीडियो दंगों को भड़काते हैं तथा चुनावों के दौरान मतदाताओं को गुमराह करते हैं। वैश्विक स्तर पर जानबूझकर झूठी सूचना से हर साल लगभग 78 अरब डालर का नुकसान होने का अनुमान लगाया जाता है, जिसमें शेयर बाजार में अस्थिरता और ठगी के मामले शामिल हैं। इससे व्यक्तिगत स्तर पर लोगों का सत्य पर विश्वास कम होता है, निर्णय लेना मुश्किल हो जाता है और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है। इस समस्या का समाधान बहुस्तरीय होना चाहिए। सबसे पहले व्यक्तिगत स्तर पर डिजिटल साक्षरता जरूरी है। हर सूचना पर सवाल उठाना चाहिए। जैसे-सूचना स्रोत कौन है?
इसमें कही गई बातों का सुबूत क्या है? यह डिजिटल मीडिया मंचों को एआइ आधारित पहचान और फैक्ट चेक को मजबूत करना चाहिए। इस संदर्भ में चुनाव आयोग के दिशानिर्देश मौजूद हैं, लेकिन इन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाए बगैर सख्ती से लागू करने की जरूरत है। इस समस्या को रोकने में फैक्ट चेक करने वाले संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। शिक्षा विभाग को स्कूल-कालेज स्तर पर डिजिटल साक्षरता को अनिवार्य विषय बनाना चाहिए। सूचना प्रदूषण को यदि हम समय रहते नियंत्रित नहीं कर पाए, तो सत्य की जगह झूठ, विश्वास की जगह संदेह और सद्भाव की जगह नफरत हावी हो जाएगी। इंटरनेट ने दुनिया को जोड़ा है, लेकिन अब इसे साफ-सुथरा रखना सबकी जिम्मेदारी है।
(लेखक राजकीय महाविद्यालय, कुल्लू में सहायक प्रोफेसर हैं)













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