पशु कल्याण बोर्ड के इस आंकड़े से आवारा कुत्तों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश-निर्देश से असहमत लोगों की आंखें खुल जाएं तो अच्छा कि देश में प्रतिदिन करीब दस हजार लोगों को लावारिस कुत्ते काटते हैं। इस बोर्ड के आंकड़े यह भी बता रहे हैं कि कुत्तों का शिकार होने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। 2022 में कुत्तों के काटने के करीब 22 लाख मामले दर्ज हुए थे।

2023 में यह संख्या लगभग 27.5 लाख रही और 2024 में 37 लाख से अधिक पहुंच गई। ये वे आंकड़े हैं, जो रिपोर्ट होते हैं। कोई भी समझ सकता है कि ग्रामीण इलाकों और छोटे शहरों के न जाने कितने मामले तो रिपोर्ट ही नहीं होते। आवारा कुत्तों के कारण लोगों को जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, उसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जो भी आदेश-निर्देश दिए, उन पर कड़ाई से पालन होना ही चाहिए।

विडंबना यह है कि पशु प्रेमी लोगों को आवारा कुत्तों को नियंत्रित करने और उनकी आक्रामकता से लोगों को बचाने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के आदेश-निर्देश रास नहीं आ रहे हैं। वे आए दिन सुप्रीम कोर्ट में अपना पशु प्रेम प्रदर्शित करने के लिए खड़े हो जाते हैं और वहां कुतर्कों के साथ अव्यावहारिक सुझाव भी पेश करते हैं। वे जैसी संवेदनशीलता लावारिस कुत्तों के प्रति दिखाते हैं, वैसी मनुष्यों के प्रति दिखाने के लिए तैयार नहीं। आखिर यह कैसा पशु प्रेम है कि मनुष्यों से अधिक आवारा कुत्तों की चिंता की जा रही है और वह भी तब जब वे आफत बन रहे हैं?

निःसंदेह भारतीय संस्कृति प्राणिमात्र के कल्याण की बात करती है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि आवारा कुत्तों अथवा अन्य बेसहारा पशुओं को इतनी अधिक प्राथमिकता मिले कि मनुष्यों के समक्ष संकट पैदा हो जाए। पशु प्रेमी लोग आवारा कुत्तों के नियमन-नियंत्रण का विरोध तो करते हैं, लेकिन उन्हें पालने अथवा उनकी देखभाल करने के लिए तैयार नहीं।

उलटे उन्हें सड़कों पर खाना खिलाने और उनका जहां-तहां विचरण होने देने की स्वतंत्रता चाहते हैं। संकट केवल यह नहीं कि आवारा कुत्तों के काटने के मामले बढ़ रहे हैं, बल्कि यह भी है कि ऐसे कई मामले जानलेवा सिद्ध हो रहे हैं। हर दिन देश के किसी न किसी हिस्से से आवारा कुत्तों के शिकार लोगों की मौत के समाचार सामने आते हैं।

गत दिवस ही फिरोजपुर में आवारा कुत्तों के हमले में एक युवक की मौत हो गई। ऐसी मौतों से किसी का भी हृदय द्रवित हो जाए, लेकिन कथित पशु प्रेमी आवारा कुत्तों को लेकर अपनी बेजा दलीलें छोड़ने को तैयार नहीं और वह भी तब, जब इससे भली तरह परिचित हैं कि हमारे नगर निकाय उन पर लगाम लगाने में नाकाम हैं और विकसित देशों में आवारा पशुओं को नियंत्रित करने का काम कठोरता से होता है।