विचार: नए अध्यक्ष के नेतृत्व में नई परीक्षा
नितिन नवीन एक ऐसे समय में भाजपा की संगठनात्मक कमान संभाल रहे हैं, जब पार्टी अपने राजनीतिक शिखर पर है और यही उसकी सबसे बड़ी परीक्षा भी है। चुनाव जीतना, संगठन को कसना, सरकार और पार्टी के बीच सामंजस्य बनाए रखना, वैचारिक साझेदारी को संतुलित करना और 2029 की नींव मजबूत करने जैसे कार्यों को एक साथ मूर्त रूप देना आसान नहीं है।
डॉ. मनिष दाभाडे। सत्तारूढ़ भाजपा के लिए नया साल नई चुनौतियां लेकर आया है। पार्टी ने नए अध्यक्ष नितिन नवीन की इसी साल पहली बड़ी परीक्षा भी होगी। ये परीक्षा बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के विधानसभा चुनावों में देखने को मिलेगी। ये सभी राज्य पार्टी की संभावनाओं के हिसाब से अलग-अलग रुझान दर्शाते हैं। बीते एक दशक में भाजपा ने बंगाल में जो विस्तार किया है, वह भारतीय राजनीति में एक मिसाल है। एक समय इस प्रदेश में अप्रासंगिक मानी जाने वाली पार्टी आज राज्य की मुख्य विपक्षी शक्ति बन चुकी है। हालांकि राज्य की सत्ता अभी भी उससे दूर है।
यहां ममता बनर्जी केवल एक लोकप्रिय मुख्यमंत्री नहीं हैं, बल्कि एक अनुभवी राजनीतिक योद्धा हैं। उनके पास प्रशासन, संगठन और भावनात्मक राजनीति-तीनों का गहरा अनुभव है। ऐसे में भाजपा की चुनौती बंगाल में वैचारिक प्रवेश की नहीं, बल्कि संगठनात्मक परिपक्वता से जुड़ी है। गुटबाजी, नेतृत्व प्रतिस्पर्धा, पुराने कार्यकर्ताओं और नए चेहरों के बीच संतुलन-ये सभी मुद्दे भाजपा की प्रगति को धीमा कर सकते हैं। ऐसे में, नितिन नवीन के लिए बंगाल में जीत का अर्थ केवल सत्ता प्राप्त करने से भी बढ़कर एक ऐसा संगठन खड़ा करने से जुड़ा होगा, जो चुनावों के बीच भी सक्रिय, अनुशासित और जनता से जुड़ा रहे। यदि भाजपा बंगाल में सत्ता तक पहुंचती है तो यह ऐतिहासिक उपलब्धि होगी, लेकिन यदि वह मजबूत संगठन और स्थिर वोट आधार के साथ मुकाबला करती है तो भी यह भविष्य के लिए निर्णायक निवेश होगा।
तमिलनाडु और केरल में भाजपा की चुनौती अलग प्रकृति की है। यहां राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं, बल्कि पहचान, संस्कृति और सामाजिक संरचना के साथ गहराई से जुड़ी हुई है। तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति की मजबूत विरासत और केरल में वामपंथी तथा कांग्रेस का सामाजिक आधार भाजपा के लिए आसान चुनौती नहीं है। यहां नितिन नवीन को जल्दबाजी से बचते हुए दीर्घकालिक विस्तार की रणनीति अपनानी होगी। गठबंधन, सामाजिक संवाद और स्थानीय नेतृत्व का विकास-ये सभी तत्व यहां निर्णायक होंगे। असम में तस्वीर भिन्न है। वहां भाजपा सत्ता में है और चुनौती उसे बनाए रखने की है। सुशासन, स्थिरता और स्थानीय आकांक्षाओं को पूरा करना नितिन नवीन के संगठनात्मक समर्थन के बिना संभव नहीं होगा। इन राज्यों में भाजपा का प्रदर्शन यह बताएगा कि पार्टी केवल उत्तर और पश्चिम भारत तक सीमित न होकर एक अखिल भारतीय शक्ति बनने में सक्षम है या नहीं।
भाजपा की दूसरी बड़ी चुनौती सरकार और संगठन के बीच तालमेल को मजबूत बनाए रखने की है। मोदी सरकार की योजनाएं और उपलब्धियां तभी राजनीतिक शक्ति में बदल सकती हैं, जब संगठन उन्हें जनता की भाषा में समझा सके। सरकारी योजनाएं फाइलों में प्रभावी हो सकती हैं, लेकिन राजनीति में उनका असर तभी दिखता है जब जनता उन्हें अपने जीवन से जोड़ती है। नितिन नवीन को यह सुनिश्चित करना होगा कि भाजपा का हर कार्यकर्ता सरकार की नीतियों का प्रभावी संवाहक बने, न कि केवल चुनाव के समय सक्रिय होने वाला एजेंट। इसके साथ-साथ यह भी उतना ही जरूरी है कि संगठन जनता की नाराजगी और जमीनी समस्याओं को सरकार तक पहुंचाए। लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली पार्टियों के लिए सबसे बड़ा खतरा यही होता है कि वे जमीनी सच्चाइयों से कट जाती हैं।
तीसरी बड़ी चुनौती संगठनात्मक पुनर्गठन और पीढ़ीगत परिवर्तन से जुड़ी है। नितिन नवीन की नियुक्ति स्वयं इस बदलाव का प्रतीक है, लेकिन इसे पूरे संगठन में लागू करना कहीं अधिक कठिन है। युवा और सक्षम नेताओं को आगे लाना आवश्यक है, लेकिन वरिष्ठ नेताओं के अनुभव और योगदान को दरकिनार किए बिना। संगठनात्मक बदलाव अक्सर असंतोष और असुरक्षा को जन्म देता है। ऐसे में नितिन नवीन को स्पष्ट संदेश देना होगा कि भाजपा में पद नहीं, बल्कि प्रदर्शन सबसे बड़ा मानदंड है। उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि संगठन का विकेंद्रीकृत स्वरूप कमजोर न पड़े। राज्य इकाइयों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता होनी चाहिए, लेकिन राष्ट्रीय दिशा और अनुशासन से समझौता नहीं होना चाहिए।
भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संबंध बहुत विशिष्ट है। हाल के वर्षों में इस रिश्ते में कुछ दूरी की चर्चाएं हुई हैं। नितिन नवीन की भूमिका इसमें संतुलन साधने की है। संगठनात्मक पृष्ठभूमि से आए नितिन नवीन संघ की कार्यसंस्कृति को भलीभांति समझते हैं। उनकी चुनौती यह है कि संघ की वैचारिक अपेक्षाओं और भाजपा की चुनावी व्यावहारिकताओं के बीच संतुलन बनाए रखें। ऐसी चुनौतियों के बीच एक निर्णायक बिंदु 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारी का भी है। भाजपा को अपनी कहानी को अतीत की उपलब्धियों से भविष्य की आकांक्षाओं की ओर मोड़ना होगा। युवाओं, नए मतदाताओं और उन क्षेत्रों में जहां पार्टी अभी भी विस्तार की प्रक्रिया में है, विशेष ध्यान देना होगा। राजग को मजबूत और लचीला बनाए रखना भी आवश्यक होगा। क्षेत्रीय दलों के साथ संतुलन, नए संभावित सहयोगियों के लिए स्थान और पुराने साथियों के साथ विश्वास-ये 2029 की सफलता में निर्णायक होंगे। नितिन नवीन की भूमिका यहां एक सेतु की है।
देखा जाए तो नितिन नवीन एक ऐसे समय में भाजपा की संगठनात्मक कमान संभाल रहे हैं, जब पार्टी अपने राजनीतिक शिखर पर है और यही उसकी सबसे बड़ी परीक्षा भी है। चुनाव जीतना, संगठन को कसना, सरकार और पार्टी के बीच सामंजस्य बनाए रखना, वैचारिक साझेदारी को संतुलित करना और 2029 की नींव मजबूत करने जैसे कार्यों को एक साथ मूर्त रूप देना आसान नहीं है। अगर वे इन चुनौतियों को सफलतापूर्वक साध लेते हैं, तो भाजपा न केवल सत्ता में बनी रहेगी, बल्कि भारतीय राजनीति की सबसे स्थायी, संगठित और प्रभावशाली पार्टी के रूप में अगले दशक में प्रवेश करेगी।
(लेखक जेएनयू में एसोसिएट प्रोफेसर और ‘द इंडियन फ्यूचर्स’ के संस्थापक हैं)













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