बद्री नारायण। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार के बारह वर्ष पूरे होने वाले हैं। इस पूरे कालखंड को अनेक विकासपरक मिशनों के लिए याद किया जाएगा। इसमें अनेक प्रशासनिक सुधारों के कार्य संपन्न किए गए। प्रधानमंत्री मोदी का प्रशासनिक दर्शन, जो अब तक उनके कार्यों से परिलक्षित हुआ है, वस्तुतः व्यवस्था को सरल, सुलभ और प्रभावी बनाने का रहा है।

जनता के लिए योजनाएं बनाना, उन्हें लागू करना और उनके सामाजिक-आर्थिक एवं राजनीतिक प्रभावों को समझना तथा उन्हें और अधिक प्रभावी बनाने के लिए समय-समय पर उनमें सुधार कर नया रूप देना प्रधानमंत्री मोदी की प्रशासनिक कार्यशैली का मूल तत्व है। आज इसी सुचिंतित नीति-निर्माण प्रक्रिया के कारण भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में अग्रसर है। ‘विकसित भारत’ का मिशन इस लक्ष्य का आधार तत्व है।

आजादी के बाद भारत के विकास-इतिहास के इस विशिष्ट कालखंड में देश ने बड़े सपने देखे हैं और उन्हें साकार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। विकास के इस इतिहास में भारतीय शिक्षा के नवाचारी उन्नयन का भी एक बड़ा योगदान है। इसी कालखंड में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 बनी और लागू हुई। अब उसे लागू हुए पांच वर्ष हो चुके हैं।
आजाद भारत में एक नवाचारी, रचनात्मक और गैर-औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था की शुरुआत भी इसी दौर में हुई।

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक नई शिक्षा नीति के कार्यान्वयन के क्रम में अनेक नवाचारी कदम उठाए। एक ओर स्कूली शिक्षा के लिए एनसीईआरटी के नए पाठ्यक्रम विकसित किए गए, तो दूसरी ओर केंद्रीय विद्यालयों और नवोदय विद्यालयों जैसे सरकारी स्कूलों के नेटवर्क का विकास, विस्तार और संवर्धन किया गया। इस कालखंड में भारत में स्कूली शिक्षा का क्षैतिज विस्तार संभव हो सका। दूर-दराज के सरकारी विद्यालयों में भी आधारभूत संरचना विकसित की गई।

इसके साथ ही शैक्षिक गुणवत्ता बढ़ाने के लिए निगरानी की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाया गया है। स्कूलों में बिजली की उपलब्धता, कंप्यूटर एवं डिजिटल संसाधनों का विस्तार, खेल मैदान और पुस्तकालय जैसी सुविधाओं में 2014 के पूर्व की तुलना में लगभग दोगुनी वृद्धि हुई है। प्रति बच्चे शिक्षा पर किए जाने वाले सरकारी खर्च में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने लगभग 130 प्रतिशत की वृद्धि की है। शिक्षा को वंचित और कमजोर तबकों को सशक्त बनाने के साधन के रूप में विकसित करते हुए इससे जुड़ी नौकरियों और नामांकन में महिलाओं, दिव्यांगों, दलितों और पिछड़े वर्गों की समुचित सहभागिता सुनिश्चित की गई है।

स्कूली शिक्षा में भारतीय भाषाओं को शिक्षण-प्रशिक्षण का माध्यम बनाने की प्रक्रिया निरंतर आगे बढ़ रही है। 23 भाषाओं में कक्षा-1 और 2 की पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध कराई जा चुकी हैं। ‘दीक्षा’ प्लेटफार्म पर अनेक भारतीय और विदेशी भाषाओं में बहुभाषी सामग्री उपलब्ध है। श्रवण-बाधित छात्रों के लिए आइएसएल चैनल भी प्रारंभ किया गया है। इसके अतिरिक्त मातृभाषा में उच्च शिक्षा और विशेष रूप से मोडिकल एवं इंजीनियरिंग में पढ़ाई के प्रयास किए गए हैं।

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के शब्दों में, आज हमारे विद्यालय न केवल ज्ञान, बल्कि कौशल के केंद्र बन चुके हैं। ज्ञान, रचनात्मकता और व्यवहार, तीनों मिलकर स्कूली शिक्षा को नया स्वरूप दे रहे हैं। इस कालखंड में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी व्यापक विस्तार हुआ है। समाज के दूरस्थ क्षेत्रों और पिछड़ी आबादी को ध्यान में रखकर नए केंद्रीय विश्वविद्यालय, आइआइटी, आइआइएम और राज्य विश्वविद्यालय स्थापित किए गए हैं।

उच्च शिक्षा को सामाजिक न्याय और समावेशन के सशक्त माध्यम के रूप में भी विकसित किया गया है। आंध्र प्रदेश में दो जनजातीय विश्वविद्यालयों की स्थापना और ओडिशा के संबलपुर में आइआइएम का खुलना इसके उदाहरण हैं। 2014 के बाद 11 केंद्रीय विश्वविद्यालय, 14 आइआइएम और 7 नए आइआइटी स्थापित किए गए हैं। यह एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। एक महत्वपूर्ण मिशन-भारतीय शिक्षा का अंतरराष्ट्रीयकरण भी इसी कालखंड में प्रारंभ हुआ है। इसके अंतर्गत भारतीय शिक्षा संस्थान, जैसे आइआइटी, आइआइएम और डीम्ड विश्वविद्यालय, विदेश में अपने परिसर खोल रहे हैं।

यह सिलसिला तेजी से बढ़ता दिख रहा है। इसी के साथ विश्व के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय भी भारत में अपने परिसर या अंतरराष्ट्रीय कार्यालय स्थापित कर रहे हैं। आने वाले समय में कई विदेशी विश्वविद्यालयों के भारत स्थित परिसरों में पठन-पाठन देखने को मिल सकता है। भारत में भारतीय शिक्षा संस्थानों को विश्व रैंकिंग में उल्लेखनीय स्थान प्राप्त हो रहे हैं। इसके साथ ही भारतीय शोध के अंतरराष्ट्रीयकरण की दिशा में कार्य करते हुए टाटा इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंसेज जैसे संस्थान फरवरी से ‘टीआइएसएस-ग्लोबल’ मिशन प्रारंभ करने जा रहे हैं।

भारतीय शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण से शिक्षकों, छात्रों और संस्थानों को अंतरराष्ट्रीय मंच मिलेगा और छात्रों को भारत में रहते हुए ही विश्व-स्तरीय शिक्षा पद्धतियों का लाभ प्राप्त होगा। इसके साथ ही इससे गुणवत्ता-आधारित प्रतिस्पर्धा भी उत्पन्न होगी। भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों को विदेशी विश्वविद्यालयों के समकक्ष गुणवत्ता के स्तर पर प्रतिस्पर्धा के लिए स्वयं को तैयार करना होगा। इसके लिए विश्व-स्तरीय शोध, सशक्त वैचारिक विमर्श और उच्च क्षमता वाले शिक्षकों से परिसरों को सुसज्जित करना आवश्यक है। भारतीय शोध-उपलब्धियों को अंतरराष्ट्रीय संवाद और प्रकाशनों के माध्यम से वैश्विक पहचान दिलानी होगी।

वास्तव में भारतीय शिक्षा का अंतरराष्ट्रीयकरण हम सबके लिए एक महत्वपूर्ण सामूहिक मिशन होना चाहिए। इसके अंतर्गत हमारा लक्ष्य शिक्षा की गुणवत्ता के संवर्धन के साथ-साथ भारतीय विकास का एक वैश्विक वृत्तांत रचना भी होना चाहिए। इससे न केवल विकसित भारत का मिशन सुदृढ़ होगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत का प्रभाव भी बढ़ेगा। इस दिशा में भारतीय शिक्षा अधिष्ठान विधेयक-2024 सहायक सिद्ध होगा। इसका उद्देश्य शोध और शिक्षा को भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप संगठित कर विश्व-स्तरीय बनाना है। नए वर्ष में भारतीय शिक्षा विकसित भारत के मिशन के लिए मन, मानस और मस्तिष्क को गढ़ सके-यही हमारा लक्ष्य होना चाहिए।

(लेखक टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, मुंबई के कुलपति हैं)