विवेक काटजू। वेनेजुएला में अमेरिका की एकतरफा सैन्य कार्रवाई ने दुनिया को चौंकाने का काम किया। शायद ऐसा पहली बार देखने को मिला कि किसी देश के राष्ट्रपति को उनकी पत्नी सहित उनके आवास से उठाकर अगवा कर लिया गया। निकोलस मादुरो के साथ अमेरिका की लंबी खटपट थी, लेकिन तमाम देशों सहित संयुक्त राष्ट्र उन्हें वेनेजुएला के राष्ट्रपति के रूप में मान्यता देते रहे।

भारत भी ऐसे देशों में शामिल रहा। अमेरिका और खासतौर से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी इस दादागीरी के पक्ष में सुविधाजनक दलीलें गढ़ी हैं। मादुरो पर अमेरिका में मादक पदार्थों की तस्करी को बढ़ावा देने का आरोप है। ऐसा कुछ भी हो, लेकिन इससे किसी शक्तिशाली देश को यह गुंजाइश नहीं मिल जाती कि वह ऐसे आरोपित को पकड़ने के लिए दूसरे देश में सैन्य छापेमारी वाली कार्रवाई करे।

पाकिस्तान के एबटाबाद में दुर्दांत आतंकी ओसामा बिन लादेन को ठिकाने लगाने की कार्रवाई ऐसे मामलों में अपवाद की श्रेणी में आती है, लेकिन यही पैमाना मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस पर नहीं लागू किया जा सकता।

बदली हुई परिस्थितियों में वेनेजुएला की उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज ने अंतरिम राष्ट्रपति के रूप में कार्यभार संभाला है। अमेरिका ने उन पर दबाव डाला है कि उसकी मनमानी को मानती रहें और खासतौर से तेल एवं गैस के मामले में अमेरिकी निर्देशों का पालन हो। वेनेजुएला के पास पूरी दुनिया में तेल का सबसे बड़ा भंडार है। ट्रंप इसी भंडार पर नियंत्रण चाहते हैं। वे चाहते हैं कि केवल अमेरिकी और चुनिंदा यूरोपीय कंपनियां ही इस दक्षिण अमेरिकी देश के तेल बाजार के बड़े खेल की अहम खिलाड़ी बनी रहें।

उन्होंने यही संकेत दिए हैं कि वे रूस और चीन को वेनेजुएला में किसी भी भूमिका से बाहर रखना चाहते हैं। वेनेजुएला में अमेरिका का हस्तक्षेप कुछ वर्षों पहले अफगानिस्तान और इराक में ऐसे ही दखल से काफी अलग है। स्पष्ट है कि अमेरिका ने अफगानिस्तान में विफलता और इराक में सामने आई दुश्वारियों से सबक सीखा है कि ऐसी गलतियों से बचा जाए। अमेरिका ने तालिबान और अलकायदा के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की। वैश्विक स्तर पर यह मान्यता थी कि अमेरिका के पास ऐसा करने का ठोस आधार है, क्योंकि तब उस पर एक भयावह आतंकी हमला हुआ था।

सैन्य कार्रवाई से अफगानिस्तान में तालिबान का तो पतन हो गया, पर उसके और अलकायदा के बड़े आतंकी पाकिस्तान भागने में सफल रहे। तालिबान ने पाकिस्तान के समर्थन से अफगानिस्तान में आकार ले रही नई व्यवस्था के खिलाफ काम करना शुरू कर दिया। यह व्यवस्था अमेरिका और नाटो की सहायता से ही स्थापित हुई थी। अफगानिस्तान में स्थिरता के लिए संयुक्त राष्ट्र ने भी तब एक अंतरराष्ट्रीय बल के गठन की अनुमति दी थी। हालांकि अफगानिस्तान की नई व्यवस्था और अमेरिका मिलकर भी विरोधियों से पार नहीं पा सके।

इस दौरान करीब 2,500 अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई और लगभग एक ट्रिलियन (लाख करोड़) डालर का बोझ अमेरिकी खजाने पर पड़ा। अंतत: ट्रंप ने कड़वा घूंट गटकते हुए तालिबान के साथ एक समझौते पर सहमति बनाई। यह समझौता अफगानिस्तान में नई व्यवस्था पर आघात साबित हुआ। अमेरिका ने अफगानिस्तान से सेना वापस बुलाई तो अगस्त 2021 में तालिबान फिर काबुल की सत्ता पर काबिज हो गया। यानी बीस सालों के अंतराल में वक्त का पहिया वहीं लौट आया, जहां से चला था।

इराक की बात करें तो उस पर विध्वंसक हथियारों की आड़ में हमला किया गया। जबकि अघोषित उद्देश्य सद्दाम हुसैन और उनके बाथिस्ट शासन को समाप्त कर एक ‘लोकतांत्रिक सरकार’ की स्थापना करना था। अमेरिकी सैनिकों ने सद्दाम हुसैन को पकड़ लिया। उन पर मुकदमा चला और उन्हें फांसी दे दी गई। इसके बाद इराक में अस्थिरता बढ़ती गई।

अमेरिका को यहां भी अपने दखल की भारी कीमत चुकानी पड़ी। जब उसने इराक से अपने कदम पीछे खींचे तब तक वह अपने 4,500 सैनिक गंवाने के साथ ही दो से तीन ट्रिलियन डॉलर खर्च कर चुका था। जल्द ही यह देश आईएस जैसे आतंकी समूह की गिरफ्त में आ गया और अमेरिकी हस्तक्षेप के कोई सार्थक परिणाम नहीं निकले।

अफगानिस्तान और इराक के उलट वेनेजुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप एकतरफा है। वहां जमीनी स्तर पर सैनिक भेजने का भी ट्रंप का कोई इरादा नहीं। अमेरिका ने वेनेजुएला की सामुद्रिक घेराबंदी कर दी है, जिससे वहां के तेल प्रवाह पर प्रभावी रूप से अपना नियंत्रण किया जा सके। इस पूरी कवायद में एक हवाई अभियान ही पर्याप्त हुआ और ट्रंप ने स्वयं कहा कि दूसरे किसी अभियान की आवश्यकता ही नहीं। जैसे ही ट्रंप ने यह एलान किया कि वहां सैनिक नहीं भेजे जाएंगे, वैसे ही तय हो गया कि वहां का शासन मादुरो के सहयोगियों द्वारा ही चलाया जाएगा जो कुछ और नहीं, बल्कि अमेरिकी कठपुतली की तरह ही काम करेंगे। इस तरह किसी औपचारिक घोषणा के बिना ही वेनेजुएला प्रभावी रूप से अमेरिका का एक उपनिवेश बन जाएगा।

जहां इराक और अफगानिस्तान में अमेरिका ने अपने सैनिक गंवाए, वहीं वेनेजुएला अभियान में कोई सैनिक हताहत नहीं हुआ। अफगानिस्तान और इराक पर लाखों करोड़ डॉलर खर्च करने के उलट वेनेजुएला से अमेरिका को केवल कमाई की ही आस है। अमेरिका ने वेनेजुएला की जो सामुद्रिक नाकेबंदी की है, वह उसकी अर्थव्यवस्था को बेदम करने के लिए पर्याप्त है। अमेरिकी नियंत्रण का प्रभाव ऐसा हो जाएगा कि वहां कोई भी समूह उसके खिलाफ जाने की जुर्रत नहीं करेगा।

हां, अमेरिका के सहयोगियों से लेकर प्रतिद्वंद्वी तक इसे लेकर जो चाहे शिकायतें करते रहें, लेकिन उसके हितों के विरुद्ध कोई कुछ नहीं करेगा। अब तो असल मुद्दा यही है कि भले ही चीन जैसे देश के पास अमेरिका जैसी असाधारण सैन्य क्षमताएं न हों, लेकिन क्या वह अमेरिकी नक्शेकदम पर ही चलने की सोचेगा। अगर ऐसा होता है तो दुनिया में अराजकता बढ़ेगी। शक्तिशाली देश अपनी सुविधा से कमजोर देशों पर हावी होते रहेंगे।

(लेखक पूर्व राजनयिक हैं)