राजीव सचान। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर पांच सौ प्रतिशत टैरिफ लगाने वाले जिस सैंक्शनिंग रशिया बिल को सहमति प्रदान की, उसके पारित होने के आसार हैं। यदि ऐसा होता है तो भारत की समस्या और अधिक बढ़ जाएगी, जो पहले से ही 50 प्रतिशत ट्रंप टैरिफ का सामना कर रहा है। यह भी अब 75 प्रतिशत हो गया है, क्योंकि ट्रंप ने ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया। जैसे रूस से तेल खरीदने वाले देशों में भारत प्रमुख है, वैसे ही ईरान से व्यापार करने वाले देशों में भी।

हालांकि ईरान से भारत का व्यापार अधिक नहीं है, लेकिन ट्रंप के इस कदम से हमारा संकट और बढ़ना ही है। ट्रंप के इस फैसले की तो विपक्षी डेमोक्रेट पार्टी के कई सांसदों ने कड़ी निंदा की है, लेकिन वे रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर पांच सौ प्रतिशत टैरिफ लगाने वाले बिल पर उनके साथ हैं। वैसे तो सत्तारूढ़ रिपब्लिकन और विपक्षी डेमोक्रेट एक-दूजे को फूटी आंख नहीं सुहाते, लेकिन कुछ मुद्दों पर दोनों दलों के सांसद एकजुट भी हो जाते हैं।

ताजा उदाहरण प्रस्तावित सैंक्शनिंग रशिया एक्ट है। इसे रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम और डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंटथल ने संयुक्त रूप से पेश किया है। इसीलिए इसे द्विपक्षीय बिल कहा जा रहा है। यह वही रिचर्ड ब्लूमेंटथल हैं, जिन्होंने चंद दिनों पहले वेनेजुएला में ट्रंप की सैन्य कार्रवाई को अवैध आक्रमण कहते हुए एक लापरवाही भरी हरकत करार दिया था।

डेमोक्रेट रिचर्ड ब्लूमेंटथल पहले भी कुछ मुद्दों पर ट्रंप की तीखी आलोचना कर चुके हैं, लेकिन उन्हें रूस से तेल खरीदने वाले देशों को टैरिफ लगाकर दंडित करने का विचार इतना भाया कि वे उनके साथ खड़े हो गए। भारत में इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। इसका एक कारण तो यह है कि भारत में सांसद अपने-अपने दल की नीति के हिसाब से ही चलते हैं और दूसरा यह कि उन्हें व्हिप का पालन करना पड़ता है। अमेरिका में ऐसा नहीं है।

इसीलिए वहां रिपब्लिकन और डेमोक्रेट सांसद एक साथ भी खड़े दिखते रहते हैं। एक समय अपने देश में भी कुछ मुद्दों पर संसद के भीतर-बाहर पक्ष-विपक्ष व्यापक राष्ट्रीय हित में एकमत होता रहता था, पर आज यह अकल्पनीय है। बहुत दिन नहीं हुए जब सत्तापक्ष आम सहमति की राजनीति करने की बातें करता था और विपक्ष उसे रचनात्मक सहयोग देने का वादा करता था, लेकिन अब दूर-दूर तक ऐसा कुछ भी नहीं हैं। संसद सत्र के पहले होने वाली सर्वदलीय बैठकें हों या अन्य कोई मंच, हर कहीं पक्ष-विपक्ष के बीच घोर असहमति ही दिखती है।

मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से असहमति की अति सी हो गई हो। मोदी के शासनकाल में न्यायिक नियुक्ति आयोग संबंधी विधेयक एकमात्र ऐसा बिल था, जिस पर सभी दलों की सहमति कायम हुई थी। त्रासदी यह रही कि इस विधेयक के कानून बनते ही सुप्रीम कोर्ट ने उसे असंवैधानिक करार दिया। फिर जीएसटी संबंधी विधेयकों पर उल्लेखनीय आम सहमति देखने को मिली, लेकिन बाद में राहुल गांधी जीसएटी को गब्बर सिंह टैक्स बताने लगे।

इसके उपरांत आर्थिक रूप से विपन्न लोगों को 10 प्रतिशत आरक्षण और विधायिका में महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण से जुड़े विधेयकों पर भी पक्ष-विपक्ष का सुर एक ही रहा, लेकिन इसका कारण सहमति की राजनीति नहीं, बल्कि वोट बैंक की राजनीति थी। इसके बाद से किसी भी विषय पर आम सहमति के दर्शन दुर्लभ हो गए हैं। यह असहमति की अति की पराकाष्ठा ही थी कि पहलगाम आतंकी हमले और आपरेशन सिंदूर को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष में जो एकजुटता दिखी, वह इस सैन्य अभियान खत्म होने के पहले ही इतनी बुरी तरह बिखर गई कि कांग्रेस ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर पर पाकिस्तानी आतंकियों को बचाने का आरोप मढ़ने में भी संकोच नहीं किया। उस समय विपक्षी नेताओं के कई बयानों को पाकिस्तान ने अपने पक्ष में भुनाया।

2026 के आगमन के साथ ही विकसित भारत के लक्ष्य को पाने में अब 21 वर्ष ही शेष रह गए हैं। 2047 तक देश को विकसित बनाने का लक्ष्य आसान नहीं। यदि पक्ष-विपक्ष के बीच किसी भी मुद्दे पर आम सहमति की राजनीति का परिचय नहीं दिया जाता तो यह लक्ष्य और अधिक कठिन हो जाएगा। निःसंदेह हर मुद्दे पर सत्तापक्ष और विपक्ष में सहमति की आशा नहीं की जानी चाहिए। लोकतंत्र में तो विपक्ष का दायित्व ही है सत्तापक्ष की कमियों पर निगाह रखना एवं संसद के भीतर-बाहर उसे घेरना। सत्तापक्ष को यह आभास होते ही रहना चाहिए कि उसकी रीति-नीति पर विपक्ष की निगाह है। उसे उसकी आलोचना पर सहिष्णु भी होना चाहिए।

इसी के साथ विपक्ष को भी यह समझना होता है कि शासन चलाने का अधिकार सत्तापक्ष का ही होता है। आज स्थिति यह है कि इधर कोई विधेयक संसद से पारित होता है, उधर उसके खिलाफ विपक्षी नेता सुप्रीम कोर्ट में खड़े दिखते हैं। आखिर इसमें क्या समस्या है कि पक्ष-विपक्ष शिक्षा, स्वास्थ्य, आतंकवाद, पर्यावरण, महिला सुरक्षा आदि मुद्दों पर एकजुटता दिखाएं? यदि पक्ष-विपक्ष के नेता एक सुर में यह कहने लगें कि सार्वजनिक स्थलों पर सफाई सुनिश्चित करना और इसके प्रति सतर्क रहना हर देशवासी की जिम्मेदारी है कि महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों, विदेशी पर्यटकों आदि के साथ किसी तरह का दुर्व्यवहार न होने पाए तो क्या आफत आ जाएगी?

(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)