कांग्रेस की ओर से छेड़े गए मनरेगा बचाओ अभियान के बीच ग्रामीण रोजगार गारंटी से जुड़े इस कानून के क्रियान्वयन में व्याप्त खामियों के जैसे विवरण सामने आ रहे हैं, उससे इस अभियान की निरर्थकता ही सिद्ध होती है। हाल में मात्र 55 जिलों में तीन सौ करोड़ रुपये से अधिक के घोटाले सामने आए थे। ये घोटाले यह बता रहे थे कि मनरेगा के तहत बिना मंजूरी भुगतान करने के साथ अनावश्यक कार्यों पर पैसा खर्च किया जा रहा था।

ग्रामीण विकास मंत्रालय की जांच-पड़ताल ने यह भी बताया कि मनरेगा को संचालित करने के तौर-तरीके ही ऐसे थे, जो भ्रष्टाचार को पनपने का अवसर देते थे। इस कारण करोड़ों रुपये के जो काम कागजों पर दिखते थे, वे धरातल पर नजर नहीं आते थे। चूंकि मनरेगा के जरिये होने वाले कामों के निरीक्षण की कोई ठोस व्यवस्था नहीं थी, इसलिए सरकारी धन की बंदरबाट होती रहती थी।

इसके खिलाफ कोई आवाज इसलिए अनसुनी रहती थी, क्योंकि इस बंदरबाट में सभी शामिल रहते थे। अच्छा होता कि 20 वर्ष पहले लागू किए गए इस कानून में और पहले ही परिवर्तन कर दिए जाते। ऐसा इसलिए नहीं हो सका, क्योंकि इस कानून में किसी तरह का फेरबदल राजनीतिक दृष्टि से जोखिम भरा था।

यह किसी से छिपा नहीं कि मनरेगा में बदलाव की आवाज उठाने वालों को तत्काल प्रभाव से गरीब विरोधी करार दिया जाता था। अभी जब मनरेगा के रूप-स्वरूप में परिवर्तन करते हुए उसे वीबी- जीरामजी नाम दिया गया तो मोदी सरकार को गरीब विरोधी साबित करने में एक क्षण की भी देरी नहीं की गई।

कांग्रेस के मनरेगा बचाओ अभियान का उद्देश्य मोदी सरकार को गरीब विरोधी साबित करना ही है, पर वह इसमें शायद ही सफल हो पाए, क्योंकि उसके पास इसका उत्तर नहीं कि मनरेगा के अमल में इतनी गड़बड़ियां क्यों हो रही थीं? आखिर रोजगार गारंटी के नाम पर हुए भ्रष्टाचार की जवाबदेही कौन लेगा?

इसकी समीक्षा क्यों नहीं की जानी चाहिए थी कि मनरेगा कानून कितना प्रभावी सिद्ध हुआ और उससे ग्रामीण क्षेत्रों में कोई बुनियादी बदलाव आ सका या नहीं? जन कल्याण और विकास की योजनाओं की समय-समय पर समीक्षा तो सरकार का दायित्व है।

कोई योजना इस कारण समीक्षा से परे नहीं हो सकती कि उसे पहले की सरकार ने शुरू किया था। उचित होता कि कांग्रेस मनरेगा में बदलाव की प्रक्रिया में योगदान देती और उसमें सुधार का श्रेय खुद भी लेती, लेकिन संकीर्ण राजनीतिक कारणों से उसने यह अवसर गंवा दिया।

इसमें संदेह है कि उसे मनरेगा बचाओ अभियान से किसी तरह का राजनीतिक लाभ मिलेगा, क्योंकि सभी और यहां तक ग्रामीण जनता भी यह समझ रही है कि इस कानून के पुराने स्वरूप से अपेक्षित नतीजे हासिल नहीं हो रहे थे।