विचार: बिहार की राजनीति में भाजपा का प्रयोग
सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना बहुस्तरीय घटना है। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि एक संकेत है-भाजपा की बदलती रणनीति का, बिहार की राजनीति के नए चरण का और उस निरंतर संघर्ष का, जिसमें जाति, विकास, नेतृत्व और विचारधारा सब एक साथ उलझे रहते हैं।
HighLights
सम्राट चौधरी का चयन ओबीसी प्रतिनिधित्व मजबूत करने हेतु।
भाजपा की बिहार में सामाजिक आधार बढ़ाने की रणनीति।
नए मुख्यमंत्री के सामने प्रशासनिक दक्षता की चुनौती।
परिचय दास। बिहार की राजनीति सीधी रेखा में चलने वाली नहीं है। सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना केवल एक व्यक्ति का सत्ता में आना नहीं, बल्कि कई स्तरों पर चल रही राजनीतिक गणनाओं का परिणाम है। इसे समझने के लिए केवल घटना को नहीं, उसके पीछे के समीकरणों को भी देखना होगा। बिहार में समीकरण कभी साधारण नहीं होते। सबसे पहले बात आती है जातीय संरचना की, जो बिहार की राजनीति की रीढ़ है। भाजपा लंबे समय से बिहार में अपने आधार को केवल ऊंची जातियों तक सीमित नहीं रखना चाहती थी।
पिछड़ी जातियों, विशेषकर कुर्मी, कोइरी और अन्य ओबीसी समूहों में अपनी पकड़ मजबूत करना उसकी रणनीति का हिस्सा रहा है। इस संदर्भ में सम्राट चौधरी का चयन एक सोचा-समझा कदम है। वे खुद एक प्रभावशाली पिछड़े वर्ग से आते हैं और उनके माध्यम से भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि वह सामाजिक प्रतिनिधित्व के मामले में पीछे नहीं है। यह निर्णय एक तरह से उस राजनीतिक रिक्तता को भरने की कोशिश भी है, जो लंबे समय से क्षेत्रीय दलों के पास रही है।
बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति का नेतृत्व लालू यादव और बाद में नीतीश कुमार जैसे नेताओं ने किया। भाजपा के सामने हमेशा यह चुनौती रही कि वह इस सामाजिक आधार में अपनी जगह कैसे बनाए। सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना उसी रणनीति का विस्तार है-एक संकेत कि भाजपा अब केवल ‘ऊपर से’ नहीं, ‘नीचे से’ भी राजनीति करना चाहती है। यह उल्लेखनीय है कि सम्राट भाजपा में आने के पहले अन्य दलों में भी रहे हैं। उनकी पृष्ठभूमि आरएसएस की नहीं। भाजपा एक ऐसी पार्टी है, जो नेतृत्व को केवल लोकप्रियता के आधार पर नहीं, बल्कि संगठनात्मक संतुलन के आधार पर तय करती है।
सम्राट चौधरी पार्टी में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं और विभिन्न स्तरों पर काम कर चुके हैं। उनका चयन यह भी दिखाता है कि भाजपा अपने कार्यकर्ताओं को यह संदेश देना चाहती है कि संगठन में काम करने वालों को अवसर मिल सकता है। यह आंतरिक अनुशासन और निष्ठा बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा है, लेकिन मामला इतना सीधा भी नहीं है। बिहार में सत्ता गठबंधन की राजनीति के तहत चलती रही है। ऐसे में मुख्यमंत्री का चयन केवल पार्टी का निर्णय नहीं, बल्कि सहयोगी दलों के साथ संतुलन का भी प्रश्न होता है। सम्राट चौधरी का चेहरा इस संतुलन को कैसे साधेगा? यह भी देखना होगा कि बिहार की राजनीति में गठबंधन जितनी जल्दी बनते हैं, उतनी ही जल्दी टूटते भी हैं।
भाजपा को यह समझ आ गया है कि केवल राष्ट्रीय मुद्दों के आधार पर बिहार में स्थायी बढ़त बनाना मुश्किल है। यहां स्थानीय नेतृत्व और जातीय समीकरण, दोनों निर्णायक भूमिका निभाते हैं। सम्राट चौधरी का उभार आने वाले चुनावों को ध्यान में रखकर भी देखा जा सकता है। यह एक तरह से भविष्य के नेतृत्व का संकेत है, जिससे मतदाताओं को एक स्पष्ट चेहरा दिखाया जा सके। हालांकि इसके साथ जोखिम भी जुड़े हैं। बिहार में नेतृत्व को स्वीकार करना केवल जाति या पार्टी के आधार पर नहीं होता, बल्कि वहां एक प्रकार की राजनीतिक विश्वसनीयता भी जरूरी होती है। सम्राट चौधरी को यह साबित करना होगा कि वे केवल एक समीकरण का हिस्सा नहीं, बल्कि एक सक्षम प्रशासक भी हैं। प्रशासनिक अनुभव, निर्णय लेने की क्षमता और संकट प्रबंधन-ये सब ऐसे क्षेत्र हैं, जहां उनकी परीक्षा होगी।
विपक्ष सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाए जाने को भाजपा का एक राजनीतिक प्रयोग कहकर सवाल उठा सकता है, लेकिन इसी के साथ उन्हें अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने की जरूरत भी महसूस होगी। इससे बिहार की राजनीति में प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है, जो लोकतांत्रिक दृष्टि से सकारात्मक ही होगा। इसके अलावा इसमें राष्ट्रीय राजनीति का एक व्यापक परिप्रेक्ष्य भी है। भाजपा विभिन्न राज्यों में अपने नेतृत्व को इस तरह गढ़ रही है, ताकि वह क्षेत्रीय पहचान और राष्ट्रीय एजेंडे के बीच संतुलन बना सके।
सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना इसी रणनीति का हिस्सा हो सकता है, जहां पार्टी स्थानीय चेहरों के माध्यम से अपनी जड़ों को मजबूत करना चाहती है, बिना अपने केंद्रीय नेतृत्व की छवि को कमजोर किए। आर्थिक और प्रशासनिक दृष्टि से भी यह बदलाव महत्वपूर्ण है। बिहार लंबे समय से विकास, रोजगार और बुनियादी ढांचे की चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे में नए नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन मुद्दों पर ठोस काम करने की रहने वाली है। केवल राजनीतिक समीकरणों से सरकार बन सकती है, लेकिन उसे चलाने के लिए प्रशासनिक दक्षता जरूरी होती है। अगर यह संतुलन नहीं बना तो सबसे मजबूत सामाजिक समीकरण भी ज्यादा दिन टिक नहीं पाते।
सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना बहुस्तरीय घटना है। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि एक संकेत है-भाजपा की बदलती रणनीति का, बिहार की राजनीति के नए चरण का और उस निरंतर संघर्ष का, जिसमें जाति, विकास, नेतृत्व और विचारधारा सब एक साथ उलझे रहते हैं। अब देखना यह है कि यह प्रयोग बिहार की जटिल राजनीति में कितनी दूर तक जाता है, क्योंकि केवल शुरुआत महत्वपूर्ण नहीं होती, अंत तक टिके रहना ही असली परीक्षा होती है।
(लेखक नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय, नालंदा में प्रोफेसर हैं)












