नितिन नवीन। भारतीय संसद तीन दिवसीय विशेष सत्र में एक ऐसे युगांतकारी विधेयक पर चर्चा कर रही है, जो विकसित राष्ट्र के सपने को साकार करने में मील का पत्थर साबित होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हमारी सरकार की यह पहल सभी दलों के समर्थन की उम्मीद रखती है, क्योंकि यह विधेयक केवल एक संवैधानिक प्रक्रिया मात्र नहीं, बल्कि समाज के बुनियादी सोच को नया आयाम देने वाली एक ऐतिहासिक पहल है। सितंबर 2023 में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के रूप में जिस यात्रा का श्रीगणेश हुआ था, वह अब निर्णायक मोड़ पर है। यह अधिनियम सुनिश्चित करेगा कि भावी लोकसभा एवं विधानसभाओं में नारी शक्ति की पूर्ण सहभागिता हो और नीति-निर्धारण में उनका स्वर एक-तिहाई भागीदारी के साथ मजबूती से सम्मिलित हो।

प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को अपनी नीतियों के केंद्र में रखा है। उन्होंने महिलाओं की गरिमा और उनके सशक्तीकरण को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बनाया। मोदी सरकार ने महिलाओं के जीवन के हर चरण में उनके सशक्तीकरण के लिए योजनाओं का एक व्यापक तंत्र तैयार किया है, जैसे बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना ने बेटियों के प्रति सोच बदला। उनका आत्मविश्वास और अवसर, दोनों बढ़े। मुद्रा योजना ने महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाया। पीएम आवास योजना से घर की लक्ष्मी को घर का मालिकाना अधिकार मिला।

सुकन्या समृद्धि योजना से बेटियों का भविष्य आर्थिक रूप से सुरक्षित हुआ। पीएम उज्ज्वला योजना से महिलाओं को धुएं से मुक्ति मिली और जीवन स्तर सुधरा। मिशन इंद्रधनुष के तहत टीकाकरण से माताओं और बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार हुआ और सुरक्षित जीवन की नींव मजबूत हुई। पीएम मातृ वंदना योजना से गर्भवती माताओं को पोषण और आर्थिक सहारा मिला। तीन तलाक रोधी कानून से मुस्लिम महिलाओं को अन्याय से मुक्ति मिली। उनका आत्मसम्मान बढ़ा और उनके अधिकार मजबूत हुए। नल से घर तक जल पहुंचने से महिलाओं का जीवन सुगम हुआ तो लखपति दीदी योजना से महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त होकर आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ीं। ये सब महिला सशक्तीकरण के प्रति हमारी सरकार की अटूट प्रतिबद्धता का ही प्रमाण है।

नीति-निर्धारण में महिलाओं की सक्रिय भूमिका के लिए प्रधानमंत्री जो नारी शक्ति वंदन अधिनियम लेकर आए हैं, वह केवल आश्वासन नहीं है। उनकी स्पष्ट दृष्टि है कि 2029 से संसदीय प्रणाली में महिलाओं की 33 प्रतिशत मौजूदगी रहे, वे सशक्त हों, नीति निर्धारण में उनकी सशक्त भूमिका हो और वे देश की मुखर आवाज बनें। यह संसद में महिलाओं की संख्या बढ़ाने मात्र का प्रयास नहीं है, बल्कि हमारी सामाजिक, सांस्कृतिक, दार्शनिक, ऐतिहासिक परंपरा और एक शब्द में कहें तो उस आधुनिक सनातनी विचार प्रणाली में एक शोधन है, जिसकी बुनियाद में गार्गी, मैत्रेयी, अरुंधती, अपाला, घोषा, विश्ववारा, सुलभा, सीकता, शाश्वती आदि अनेक ऋषि-नारियों ने वेद संहिताएं रचने से लेकर जीवन के अनेक क्षेत्रों में अपनी सूक्ष्म दृष्टि, उदात्त चिंतन और विलक्षण मेधा का परिचय दिया। आधुनिक भारत के निर्माण की पृष्ठभूमि में जहां अहिल्याबाई जैसी उदार राजमहिषी ने प्रशासनिक कौशल और जनकल्याण के मानक स्थापित किए, वहीं झांसी की रानी ने मातृभूमि के लिए अपने प्राणोत्सर्ग से विश्व इतिहास में भारतीय नारियों के बलिदान-भाव की मिसाल कायम की।

वर्तमान भारत के निर्माण में भी महिलाओं का योगदान अद्वितीय है। सावित्रीबाई फुले के समाज सुधार, डा. आनंदी गोपाल जोशी के चिकित्सा संघर्ष से लेकर ‘मिसाइल वुमन’ टेसी थामस के वैज्ञानिक पराक्रम तक हर क्षेत्र में महिलाओं ने अपनी योग्यता का लोहा मनवाया है। खेलों में पीवी सिंधु, मैरी काम, मिताली राज और साइना नेहवाल ने तिरंगे की शान बढ़ाई है, तो कला और संगीत में लता मंगेशकर और आशा भोसले जैसी सुर साम्राज्ञियों ने अपनी स्वर साधना से विश्व में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। यह सूची अनंत है, जो प्रमाणित करती है कि स्त्री शक्ति जीवन के हर क्षेत्र में निर्णायक भूमिका में है।

विधायिका में महिला आरक्षण का निर्णय ‘वैदिक गरिमा’ और ‘आधुनिक प्रगति’ का सुंदर संगम है। इसमें ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका प्रयास और सबका विश्वास’ की पवित्र भावना शामिल है। यह विधेयक उन करोड़ों माताओं-बहनों के प्रति राष्ट्र की कृतज्ञता का प्रतीक है, जिन्होंने परिवार और समाज के निर्माण में स्वयं को खपा दिया। इसका क्रांतिकारी प्रभाव हमारे ग्रामीण भारत पर पड़ेगा, जहां महिलाएं अब नेतृत्वकारी भूमिका में उभरेंगी। उनकी सक्रिय भागीदारी सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ेगी और आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐसा वातावरण बनाएगी, जहां बेटियां केवल सपने नहीं देखेंगी, बल्कि उन्हें साकार करने का सामर्थ्य और वैधानिक अधिकार भी रखेंगी।

महिला आरक्षण विधेयक को लेकर सरकार की मंशा पवित्र है, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि यह अधिनियम किसी एक पार्टी के एजेंडे की नहीं, बल्कि सभी के प्रयासों की जीत है। क्रेडिट सभी दलों को है, जो पिछले तीन-चार दशकों से लगातार इस दिशा में काम कर रहे हैं। संसद उत्तरदायी जनप्रतिनिधियों का मंदिर है। राष्ट्र की जनता उनकी हर गतिविधि और सरोकार को सूक्ष्मता से परखती है। सभी सांसदों से अपेक्षा है कि वे राष्ट्र के सामूहिक मन को समझें। आज समय की मांग है कि हम दलगत सीमाओं से ऊपर उठें। इस संस्था के सदस्य के नाते मेरी अपील है कि नारी शक्ति के सामर्थ्य और स्वावलंबन के ‘अभिषेक अनुष्ठान’ में सभी अपने समर्थन की आहुति दें। यह सामूहिक प्रयास ही यह सुनिश्चित करेगा कि भविष्य का भारत न केवल आर्थिक रूप से, बल्कि सामाजिक न्याय और नारी गौरव के मामले में भी विश्व का नेतृत्व करने में सक्षम है। हमारा सामूहिक प्रयास ही समर्थ और सशक्त भारत के निर्माण में मातृशक्ति की निर्णायक भूमिका तय करेगा।

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं)