जागरण संपादकीय: विरोध के खोखले तर्क
तथ्य यह भी है कि कम जनसंख्या वाले दक्षिण के राज्यों में एक सांसद कहीं कम आबादी का प्रतिनिधित्व करेगा और इस तरह वह अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकेगा।
HighLights
महिला आरक्षण पर विपक्ष के बदलते रुख।
नई जनगणना से आरक्षण में देरी की मांग।
महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी पर कमजोर तर्क।
लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने वाले नारी शक्ति वंदन संशोधन विधेयक के लोकसभा में पेश होते ही विपक्षी दलों की ओर से असहमति के स्वर उभर आए, लेकिन ये स्वर विरोध के लिए विरोध वाली राजनीति को ही अधिक रेखांकित कर रहे हैं। 2023 में जब यह विधेयक पारित हुआ था, तब विपक्षी दलों की मांग थी कि आखिर महिला आरक्षण को तत्काल प्रभाव से क्यों नहीं लागू किया जाता, लेकिन अब जब मोदी सरकार इस अगले आम चुनाव में लागू करने की पहल कर रही है तो भी उन्हें आपत्ति है।
अब वे यह कह रहे हैं कि महिला आरक्षण से संबंधित परिसीमन को 2011 के बजाय नई जनगणना के आधार पर किया जाए। इसका मतलब है कि वे 2029 के बजाय 2034 में महिला आरक्षण लागू करने के पक्ष में हैं, क्योंकि जो जनगणना शुरू हुई है, उसके नतीजे आते-आते तो अगले आम चुनाव करीब आ जाएंगे। कुछ विपक्षी दल इस आधार पर महिला आरक्षण का विरोध कर रहे हैं कि इसमें आरक्षण के अंदर आरक्षण होना चाहिए। आखिर ऐसी किसी मांग पर 2023 में क्यों नहीं जोर दिया गया था? ध्यान रहे तब महिला आरक्षण विधेयक सर्वसम्मति से पारित हुआ था।
विपक्षी दल यह प्रचारित करने की भी कोशिश में हैं कि महिला आरक्षण के तहत सभी राज्यों में लोकसभा की 50 प्रतिशत सीटें बढ़ाने के फार्मूले से कुछ राज्यों और विशेष रूप से दक्षिण के राज्यों को राजनीतिक रूप से नुकसान होगा, लेकिन आखिर कैसे? यदि इस फार्मूले से बिहार में 20 सीटें बढ़ेंगी तो इतनी ही सीटें तमिलनाडु में भी बढ़ेंगी। इसी तरह गुजरात, आंध्र प्रदेश और राजस्थान में 13-13 सीटें बढ़ेंगी।
तथ्य यह भी है कि कम जनसंख्या वाले दक्षिण के राज्यों में एक सांसद कहीं कम आबादी का प्रतिनिधित्व करेगा और इस तरह वह अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकेगा। आखिर ऐसे में यह कहने का क्या मतलब महिला आरक्षण से दक्षिण घाटे में और उत्तर भारत लाभ में रहेगा? विपक्ष का एक खोखला तर्क यह भी है कि महिला आरक्षण के मौजूदा स्वरूप से भाजपा फायदे में रहेगी, पर इसका भी कोई ठोस आधार नहीं दिखता।
आखिर ऐसा तो है नहीं कि सभी बढ़ी हुई सीटों पर भाजपा की जीत आसान हो जाएगी या फिर उसे बहुमत के लिए अभी की तरह 272 सीटें ही चाहिए होंगी। यदि विपक्षी दल महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने को लेकर वास्तव में प्रतिबद्ध हैं और वे उन्हें नीतियों के निर्माण में हिस्सेदार बनाकर राजनीतिक और साथ ही सामाजिक परिदृश्य बदलना चाहते हैं तो वे महिला आरक्षण के पक्ष में उसी तरह खड़े हों, जैसे 2023 में खड़े हुए थे या फिर यह बताएं कि इस आरक्षण को और बेहतर तरीके से कैसे लागू किया जा सकता है? उनके कमजोर तर्कों से उन्हें कुछ भी हासिल नहीं होने वाला।












