जागरण संपादकीय: नरम पड़ते ट्रंप
HighLights
ट्रंप ने ईरान से शांति वार्ता के संकेत दिए।
चीन के आश्वासन पर होर्मुज समुद्री मार्ग खोलने की बात।
युद्ध टालने के लिए दोनों पक्षों को लचीला होना होगा।
ईरान से दोबारा शांति वार्ता शुरू करने के संकेतों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने जिस तरह चीन और साथ ही अन्य सभी के लिए होर्मुज समुद्री मार्ग खोलने की बात कही, उससे यही पता चलता है कि आखिरकार वे इस नतीजे पर पहुंचने के लिए विवश हो रहे हैं कि युद्ध से किसी समस्या का समाधान नहीं होने वाला। शायद यही कारण है कि उनकी ओर से यह भी कहा गया कि युद्ध जल्द खत्म हो सकता है। चूंकि ईरान भी कह रहा है कि हम भी युद्ध के पक्ष में नहीं, इसलिए यह कहा जा सकता है कि युद्धविराम जारी रहेगा और दोनों पक्ष उसे स्थायी रूप देने के उपाय करेंगे। अच्छा होता कि ट्रंप को ईरान पर हमले की निरर्थकता तभी समझ आ जाती, जब उन्होंने इजरायल के साथ मिलकर उस पर तब हमला करने का निर्णय लिया, जब उससे वार्ता जारी थी।
एक तरह से ट्रंप वहीं खड़े दिखने लगे हैं, जहां 28 फरवरी को यानी ईरान पर हमला करने के पहले थे। उन्होंने जिस तरह चीन के इस आश्वासन पर होर्मुज खोलने की बात की कि वह ईरान को हथियार नहीं देगा, उससे यही प्रकट होता है कि वह किसी तरह अपने कदम पीछे खींचने की राह तलाश रहे थे। चीन के आश्वासन ने उनकी यह तलाश पूरी तो कर दी, लेकिन सब जानते हैं कि वह करीब 40 दिनों तक चले युद्ध में ईरान की हरसंभव तरीके से सहायता कर रहा था। पश्चिमी मीडिया माध्यम ही यह बता रहे हैं कि ईरान ने किस तरह चीन के जासूसी सैटेलाइट के सहारे खाड़ी देशों में अमेरिकी अड्डों को निशाना बनाया।
ईरान और चीन की प्रगाढ़ता किसी से छिपी नहीं। अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद चीन ईरान से तेल खरीद रहा था। इसी कारण जब ट्रंप ने होर्मुज की नाकाबंदी करने की घोषणा की तो उसने अपनी सख्त आपत्ति जताई। ईरान के चीन के साथ-साथ रूस से भी खास रिश्ते हैं और यह किसी से छिपा नहीं कि ये तीनों देश अमेरिकी प्रभुत्व स्वीकार करने को तैयार नहीं और वे उसे चुनौती देते ही रहते हैं। यह एक तथ्य है कि ट्रंप तमाम कोशिशों के बाद भी रूस-यूक्रेन युद्ध समाप्त नहीं करा सके और टैरिफ मामले में उन्हें चीन के समक्ष झुकना पड़ा। ईरान ने भी उनके प्रतिबंधों की परवाह नहीं की।
इस पर हैरानी नहीं कि ट्रंप चीन जाने को तैयार हैं और यह अपेक्षा कर रहे हैं कि वहां के राष्ट्रपति उन्हें गले लगाएंगे। फिलहाल यह कहना कठिन है कि अमेरिका और ईरान के बीच होने वाली दूसरे दौर की वार्ता किसी ठोस नतीजे पर पहुंचेगी या नहीं, लेकिन यदि दोनों ही पक्ष तबाही से बचना चाहते हैं तो फिर उन्हें अपने अड़ियल रवैये का परित्याग करना होगा। जैसे ईरान को समझना होगा कि वह अपनी ही नहीं चला सकता, वैसे ही अमेरिका को भी इस कटु सत्य को हजम करना होगा कि अब वह विश्व को अपने हिसाब से संचालित नहीं कर सकता।












