यह शुभ संकेत नहीं कि दिल्ली से सटे गौतमबुद्ध नगर के नोएडा में श्रमिकों के धरने-प्रदर्शन के साथ पथराव का सिलसिला खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। बीते दिनों नोएडा में श्रमिकों ने जिस बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ एवं आगजनी की, वह यही बताती है कि इसके पीछे कोई गहरी साजिश थी, क्योंकि यह सहज-सामान्य नहीं कि यकायक बड़ी संख्या में श्रमिक सड़कों पर उतर आएं और अराजकता का सहारा लेकर लोगों को भयाक्रांत करें।

पुलिस की ओर से श्रमिकों के उपद्रव के मामले में साजिश को रेखांकित तो किया जा रहा है, लेकिन आखिर उसे समय रहते इसकी भनक क्यों नहीं लगी? नोएडा में श्रमिकों के बीच असंतोष व्याप्त हो रहा है, इसका भान शासन को भी होना चाहिए था और प्रशासन को भी, क्योंकि वेतन वृद्धि का मामला कई दिनों पहले और खासकर तब उभर आया था, जब हरियाणा के गुरुग्राम में कामगारों के वेतन में वृद्धि कर दी गई।

इसका असर पड़ोसी क्षेत्र नोएडा के श्रमिकों पर भी पड़ा। हालांकि जिलाधिकारी ने उनके असंतोष को दूर करने के लिए बोनस, ओवरटाइम, वेतन भुगतान के समय आदि को लेकर कई निर्णय किए और उनकी शेष समस्याओं पर विचार करने की भी बात कही, लेकिन किन्हीं कारणों से श्रमिक संतुष्ट नहीं हुए। क्या इसलिए कि कोई उन्हें हिंसा के लिए भड़का रहा था?

इसकी आशंका इसलिए बलवती होती है कि एक तो उन प्रतिष्ठानों को भी निशाने पर लिया गया, जहां के कामगारों के लिए वेतन में कमी कोई मुद्दा नहीं था और दूसरे गत दिवस घरेलू सहायिकाओं के तौर पर काम करने वाली महिलाएं भी सड़कों पर उतर आईं। आखिर उनका वेतन तो उनकी मांग पर ही तय होता है। आम तौर पर उनके सामने कम पैसे पर काम करने की कोई विवशता नहीं होती।

यह ठीक है कि नोएडा में श्रमिकों की हिंसा के बाद राज्य सरकार की ओर से उनके वेतन में वृद्धि के निर्णय के साथ एक ऐसी समिति गठित कर दी गई है, जो उनकी मांगों पर विचार करेगी, लेकिन इस मामले में केंद्र सरकार को भी चेतना होगा, क्योंकि नोएडा की श्रमिक अशांति का असर अन्य राज्यों पर भी पड़ सकता है। देश में श्रमिक अशांति कोई नई बात नहीं है, लेकिन इतना तो है ही कि लंबे समय बाद देश में कहीं पर इतने बड़े पैमाने पर कामगारों ने हिंसा की। ध्यान रहे नोएडा केवल औद्योगिक क्षेत्र ही नहीं।

यह आवासीय क्षेत्र भी है और श्रमिकों की हिंसा से आम लोग भी तंग हुए। श्रमिकों को अपनी मांगें रखने का अधिकार है, लेकिन इसके नाम पर यदि वे उपद्रव करेंगे तो अपना ही नुकसान करेंगे। यदि उनके उपद्रव के भय के चलते नोएडा की फैक्ट्रियां लंबे समय तक बंद रहती हैं तो सबसे अधिक नुकसान उन्हें ही उठाना पड़ेगा। चूंकि नुकसान उद्यमियों को भी होगा, इसलिए उनका पक्ष भी सुना जाना चाहिए।