विचार: केवल बड़ा बाजार बनना पर्याप्त नहीं
HighLights
वैश्विक संकट में भारत की बाजार निर्भरता जोखिमपूर्ण।
ऊर्जा, डिजिटल, स्वास्थ्य में आत्मनिर्भरता आवश्यक।
संतुलित विदेश नीति, राष्ट्रीय हित सर्वोपरि।
राजीव शुक्ला। दुनिया इस समय एक अजीब दौर से गुजर रही है। कहीं युद्ध चल रहे हैं, कहीं युद्ध की तैयारी है और कहीं बिना युद्ध के भी सब कुछ प्रभावित हो रहा है। पहले ऐसा माना जाता था कि अगर बाजार खुला रहेगा तो अर्थव्यवस्था चलती रहेगी। हालांकि अब यह भरोसा कमजोर पड़ रहा है, क्योंकि आज का संकट केवल व्यापार का नहीं है, बल्कि सप्लाई, सुरक्षा और भरोसे का भी है। ऐसे समय में भारत को यह समझना होगा कि वह सिर्फ एक बड़ा बाजार बनकर आगे नहीं बढ़ सकता। तब तो और नहीं जब बाजार एक ताकत के कब्जे में रहे। इससे अर्थव्यवस्था कभी भी डगमगा सकती है। भारत केवल एक बड़ा उपभोक्ता देश बनता जा रहा है। हमारे पास युवा आबादी है, तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था है और दुनिया की बड़ी कंपनियों के लिए एक बड़ा बाजार है, लेकिन क्या केवल उपभोक्ता बनकर कोई देश मजबूत बन सकता है? अगर उत्पादन, तकनीक, ऊर्जा और अन्य जरूरी संसाधनों के मामले में हमारी बाहरी निर्भरता बनी रहेगी तो थोड़ी सी वैश्विक हलचल भी हमें हिला सकती है और इसका उदाहरण आज हमारे सामने है।
युद्धों का सबसे पहले असर ऊर्जा पर पड़ता है। तेल और गैस की कीमतें बढ़ती हैं। सप्लाई में रुकावट आती है। इसका प्रभाव आम आदमी की जेब पर पड़ता है, लेकिन संकट यहीं खत्म नहीं होता। एक और बड़ा खतरा है डिजिटल ढांचे का। आज हमारी जिंदगी का बड़ा हिस्सा इंटरनेट, डाटा और क्लाउड पर टिका है। बैंकिंग से लेकर सरकारी सेवाएं, पढ़ाई से लेकर व्यापार सब कुछ डिजिटल हो चुका है। ऐसे में अगर युद्ध के कारण डाटा सेंटर प्रभावित होते हैं, इंटरनेट के रास्ते बाधित होते हैं या साइबर हमले बढ़ते हैं, तो पूरी व्यवस्था ठप हो सकती है। स्वास्थ्य सेवाएं भी इससे अछूती नहीं हैं। हम अक्सर सोचते हैं कि अस्पताल केवल डाक्टर और दवाओं से चलते हैं, लेकिन सच यह है कि वे वैश्विक सप्लाई चेन पर निर्भर होते हैं।
उदाहरण के लिए एमआरआइ मशीन में इस्तेमाल होने वाली हीलियम गैस एक ऐसी विशेष गैस है, जो मशीन को सही तापमान पर काम करने में मदद करती है। भारत अपनी हीलियम जरूरत का बड़ा हिस्सा कतर से आयात करता है। यह देश दुनिया के बड़े हीलियम उत्पादकों में से एक है। अगर युद्ध के कारण वहां से उसकी सप्लाई बाधित होती है तो इसका असर सीधे हमारे अस्पतालों पर पड़ेगा। जांच में देरी के साथ इलाज महंगा हो सकता है और कई जगहों पर सेवाएं बाधित हो सकती हैं। इसका मतलब यह है कि युद्ध का असर आम नागरिक के इलाज तक पर पड़ता है। यही वह स्थिति है जो हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि विकास का मतलब केवल बाजार नहीं हो सकता।
बाजार जरूरी है, पर वह सब कुछ नहीं कर सकता। बाजार वहां जाता है, जहां फायदा होता है, लेकिन देश को उन जगहों पर भी काम करना पड़ता है, जहां फायदा तुरंत नहीं दिखता, मगर उन क्षेत्रों की महत्ता कम नहीं। जैसे बुनियादी ढांचा, स्वास्थ्य, शिक्षा, ऊर्जा और रिसर्च। अगर इन क्षेत्रों को पूरी तरह बाजार के भरोसे छोड़ दिया जाए, तो असमानता बढ़ेगी और देश कमजोर पड़ेगा। इसी कारण जवाहरलाल नेहरू ने समझा था कि एक नए देश को खुद को मजबूत बनाने के लिए सरकार की भूमिका जरूरी है। उन्होंने उद्योग, बिजली, वैज्ञानिक संस्थान और सार्वजनिक क्षेत्र पर जोर दिया ताकि देश अपने पैरों पर खड़ा हो सके। उनका उद्देश्य केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना था, जो संकट के समय भी टिक सके।
बाहरी दुनिया के साथ तालमेल की कड़ी मानी जाने वाली विदेश नीति में भी आज असंतुलन दिखता है। एक ओर हम स्वतंत्र निर्णय की बात करते हैं, लेकिन कई बार व्यवहार में झुकाव अधिक स्पष्ट दिखता है। पश्चिमी देशों के साथ बढ़ती नजदीकी जरूरी हो सकती है, पर अगर संतुलन बिगड़ता है, तो हमारे पारंपरिक संबंध कमजोर हो सकते हैं। विदेश नीति की ताकत इसी में होती है कि वह सभी पक्षों से संबंध बनाए रखे। असंतुलन यह भी है कि विदेश नीति और आर्थिक नीति के बीच हमेशा स्पष्ट तालमेल नहीं दिखता। हम वैश्विक मंचों पर स्वतंत्र रुख की बात करते हैं, लेकिन व्यापार और तकनीक के मामलों में कुछ खास देशों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। यह स्थिति भविष्य में जोखिम पैदा कर सकती है, खासकर तब जब दुनिया पहले से ही अनिश्चितता से भरी हो। एक मजबूत विदेश नीति वही होती है, जो हर परिस्थिति में देश के हितों की रक्षा करे और किसी एक दिशा पर अत्यधिक निर्भरता से बचे।
आज दुनिया कई खेमों में बंटी हुई है। बड़े देश अपने हिसाब से फैसले ले रहे हैं। ऐसे में भारत को सावधानी से चलना होगा। हमें सभी से संबंध रखने हैं, लेकिन किसी एक पर पूरी तरह निर्भर नहीं होना है। यह संतुलन हमारी ताकत हो सकता है। आज आत्मनिर्भरता का मतलब केवल कारखाने लगाना नहीं है। इसका अर्थ है कि हम जरूरी चीजों के लिए पूरी तरह विदेश पर निर्भर न रहें। हमें ऊर्जा के अलग-अलग स्रोत चाहिए, डिजिटल ढांचा अपने नियंत्रण में चाहिए, जरूरी दवाएं और मेडिकल उपकरण देश में बनें। हमें तकनीक में भी क्षमताएं बढ़ानी होगी। यह सब बाजार अपने आप नहीं करेगा। इसके लिए नीति, निवेश और योजना की जरूरत होती है। इस राह में एक चुनौती यह भी है कि विकास की चाह में अपनी सुरक्षा और स्वतंत्रता को कमजोर न होने दें। अगर हम केवल बाजार पर भरोसा करेंगे, तो शायद कुछ समय के लिए तेजी दिखेगी, लेकिन लंबे समय में जोखिम बढ़ जाएगा।
अब विकास का मतलब केवल ज्यादा खरीदना और बेचना नहीं है। इसका मतलब है अपने देश को हर तरह के संकट के लिए तैयार करना। ऊर्जा हो, डाटा हो या स्वास्थ्य सेवाएं, हर क्षेत्र में हमें मजबूत बनना होगा। भारत के लिए सही रास्ता वही है, जिसमें बाजार की ताकत भी हो और राज्य की समझ भी। जहां निजी क्षेत्र आगे बढ़े, लेकिन राष्ट्रीय हित भी पीछे न छूटें। जहां दुनिया से जुड़ाव हो, लेकिन आत्मनिर्भरता भी बनी रहे। अगर हम यह संतुलन बना पाए, तो भारत केवल एक बड़ा बाजार नहीं रहेगा, बल्कि एक मजबूत और आत्मविश्वासी राष्ट्र बनकर भी उभरेगा।
(लेखक राज्यसभा सदस्य एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं)












