आदित्य सिन्हा। कल्याणकारी राज्य की भूमिका में जनगणना की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण मानी गई है। सदियों पहले अपनी रचना अर्थशास्त्र में कौटिल्य ने भी यह उल्लेख किया था कि यदि राज्य बेहतर शासन प्रदान करना चाहता है तो उसे अपनी जनता की भलीभांति जानकारी होनी चाहिए। कौटिल्य का मानना था कि जो राज्य अपने लोगों की गणना नहीं करता, वह अंधकार में शासन करता है। कोविड और कतिपय अन्य कारणों से भारत में भी निरंतर चली आ रही जनगणना की राह में जो अंधकार उत्पन्न हुआ था, वह अंतत: छंट गया और इस महीने की शुरुआत से देश में जनगणना की विधिवत शुरुआत भी हो गई है। चूंकि भारत विश्व का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है, इसलिए गणना की यह प्रक्रिया भी उसी अनुपात में बहुत विस्तारित रहने वाली है।

इसमें 30 लाख से अधिक गणना करने वाले, पर्यवेक्षक और अधिकारी महीनों तक 140 करोड़ भारतीयों से 33 प्रश्न पूछेंगे। देश के सात हजार से अधिक शहरों और छह लाख से अधिक गांवों में चलने वाली यह विश्व की सबसे बड़ी प्रशासनिक कवायद होने जा रही है। इस जनगणना की एक विशेषता यह भी है कि यह पूरी तरह डिजिटल रूप में की जाएगी। सभी भारतीय नागरिक 16 भाषाओं में उपलब्ध एक पोर्टल के माध्यम से स्वयं गणना कर सकते हैं। इसके शुभंकर का नाम प्रगति और विकास रखा गया है। इसके प्रतीकात्मक अर्थ से लेकर इससे जुड़ी आकांक्षाएं भी एकदम स्पष्ट हैं।

भारत में जनगणना से जुड़ी परंपरा की जड़ें स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले से जुड़ी हुई हैं। इसका पहला आधुनिक प्रयास ब्रिटिश शासन के दौरान 1865 और 1872 के बीच किया गया। हालांकि तब ऐसी कवायद एक साथ नहीं की गई थी और सभी प्रांतों के बीच इसे लेकर समन्वय का भी अभाव था। वर्ष 1881 में जाकर ही पहली बार अविभाजित भारत में एक साथ जनगणना हो पाई थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पहली बार 1951 में जनगणना हुई और उसके बाद से इक्का-दुक्का अपवादों के साथ यह क्रम अनवरत रूप से जारी रहा।

समय के साथ जनगणना के प्रश्नों का स्वरूप भी बदलता गया। 1872 की अनुसूची में मात्र 17 प्रश्न थे, जिनमें ‘कौन कहां रहता है’ से अधिक कुछ दर्ज नहीं किया गया था। वहीं 1901 की जनगणना में अंग्रेजी में दक्षता के बारे में पूछा गया, जो औपनिवेशिक दौर की एक विशेष प्राथमिकता थी। हालांकि 2011 तक के अपने पड़ाव में जनगणना ने प्रवासन का इतिहास, प्रजनन रुझान, कामकाज से जुड़ी आदतें और दिव्यांगता से जुड़े विस्तृत आंकड़ों को समाहित करना आरंभ किया। ऐसे में यह कहना उचित ही होगा कि जनगणना राज्य के समक्ष उभरते पहलुओं का प्रतिबिंब ही होती है।

देश में 2021 की जनगणना नहीं हो पाई। इसके पीछे एक प्रमुख कारण कोविड महामारी रही, जिसके चलते प्राथमिकताएं एकाएक बदल गई थीं और इतनी बड़ी प्रशासनिक प्रक्रिया संभव होती नहीं दिख रही थी। फिर भी कुछ सवाल तो उठते ही हैं कि कोविड से निपटने में 2022 तक स्थितियां काफी हद तक सामान्य हो गई थीं और 2023 से लेकर 2024 तक जनगणना की प्रक्रिया को सिरे चढ़ाने के लिए गुंजाइश भी थी, लेकिन उस मोर्चे पर अपेक्षित प्रयास नहीं किए गए गए। जो जनगणना अभी आरंभ हुई है उसकी औपचारिक अधिसूचना जून 2025 में आई और उसके 15 महीने बाद यह प्रक्रिया आरंभ हुई है। इसमें कहा जा सकता है कि कभी नहीं से तो देर ही भली, लेकिन देरी को जायज ठहराना थोड़ा कठिन है।

भारत में पिछले डेढ़ दशक के दौरान शासन का ढर्रा 2011 में हुई जनगणना के आधार पर ही चलता रहा, जबकि इस दौरान परिदृश्य बहुत व्यापक रूप से बदलने वाला रहा। वैसे भी 15 साल का समय कोई कम नहीं होता। इस अवधि में करोड़ों भारतीयों ने अपने मूल स्थानों से पलायन किया। व्यवसाय बदले। वे गांव छोड़कर शहरी बन गए हैं। जबकि नीति नियोजन में न केवल ग्रामीण-शहरी क्षेत्रों के वर्गीकरण को लेकर स्पष्टता का अभाव बना हुआ है, बल्कि उनका आधार भी 2011 के जनगणना के आंकड़े बने हुए हैं। कल्याणकारी योजनाओं और सार्वजनिक व्यय के लिए यह पुराना परिदृश्य उचित नहीं।

इसके व्यावहारिक परिणाम भी केवल कोरी कल्पना या सैद्धांतिक मात्र नहीं हैं। शोधकर्ताओं से लेकर और नीति-निर्माता उपभोग व्यय से लेकर श्रम बल भागीदारी या सामाजिक परिस्थितियों का आकलन करने के लिए जनगणना को ही अपना आधार बनाते हैं। जब ऐसी सूची ही 15 साल पुरानी हो तो उस आधार पर आकार लेने वाली तस्वीर वास्तविक नहीं बन पाएगी। इस तरह छोटी-छोटी विसंगतियां जमा होकर बड़ी विकराल स्थिति निर्मित कर देती हैं।

जनगणना 2027 में जनसांख्यिकी से अधिक भी बहुत कुछ दांव पर लगा है। ऐसा ही एक पहलू है संसदीय एवं विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन, जिसमें नई जनगणना के आंकड़े बहुत निर्णायक साबित होंगे। भारत का राजनीतिक मानचित्र अभी भी पुराने परिदृश्य पर ही आधारित है, जो बदलते हुए देश की आकांक्षाओं को आदर्श रूप में अभिव्यक्त नहीं करता। नई जनगणना इसमें सुधार का अवसर उपलब्ध कराएगी। इसमें 1931 के बाद पहली बार जातियों की गणना भी की जा रही है। यह मुद्दा काफी विवादास्पद है। इसके पक्ष में दलील देने वाले कहते हैं कि जातियों की गणना के बिना कल्याणकारी योजनाओं का खाका सही ढंग से नहीं बनाया जा सकता।

जबकि इसके विरोधी कहते हैं कि इससे विभाजन की वे रेखाएं और गहरा सकती हैं, जिन्हें संविधान ने धुंधला करते हुए समाप्त करने का प्रयास किया। दोनों ही दलीलों में कुछ न कुछ दम है। जनगणना में देरी की एक वजह जातिगत जनगणना को लेकर दुविधा भी गिनाई जा सकती है कि इस राह पर आगे बढ़ा जाए या नहीं। इस संदर्भ में याद रखना होगा कि जो समाज अपनी समस्याओं को मापता नहीं, वह उनका समाधान भी नहीं कर सकता। यह सही है कि जनगणना में देरी ने नीति निर्माण के लिए आधार के स्तर पर जो निर्वात की स्थिति बना रखी थी, वह एकाएक दूर होने से रही, लेकिन यह देश को वह आईना दिखाने में अवश्य सफल होगी, जो आगे की राह पर बढ़ने के लिए आवश्यक है।

(लेखक लोक-नीति विश्लेषक हैं)