दिव्य कुमार सोती। बांग्लादेश के हालात बिगड़ने के साथ यह भी दिख रहा है कि वहां की अंतरिम सरकार भारत से संबंध सुधारने के बजाय बिगाड़ने पर अमादा है। उसे न तो अपने यहां के हिंदुओं की हत्याओं की कोई परवाह है और न ही भारत विरोधी तत्वों के बेलगाम होते जाने की। वह इन तत्वों पर लगाम लगाने के बजाय उन्हें शह ही अधिक दे रही है। अपने यहां भारत विरोधी माहौल बनाने के लिए बांग्लादेश एक ओर जहां अपनी क्रिकेट टीम को भारत में आयोजित होने वाले टी-20 विश्व कप में भेजने में आनाकानी कर रहा है, वहीं पाकिस्तान से अपने संबंध प्रगाढ़ कर रहा है।

बांग्लादेश में जो हालात हैं, वे हमारी भूलों की भी देन हैं। ऐसी ही भूल हमने कश्मीर को हड़पने की कोशिश करने वाले पाकिस्तान के मामले में भी की थी। कश्मीर को महज एक राजनीतिक समस्या मानकर हम वहां राजनीतिक समाधान तलाशते रहे। इसके परिणाम क्या रहे, उससे सभी परिचित हैं। हमने कोई सबक नहीं सीखा और 1971 में पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लाभाषी मुसलमानों और हिंदू अल्पसंख्यकों का पाकिस्तानी फौज द्वारा किए जा रहे नरसंहार को रोकने और बांग्लादेश को मुक्त कराने के लिए भारत ने पाकिस्तानी सेना से युद्ध लड़ा।

जिस समय भारत बांग्लादेश के मुक्ति युद्ध में कूदा, उस समय तक पाकिस्तान की फौज 25 लाख बांग्लाभाषी मुसलमानों और हिंदुओं का नरसंहार कर चुकी थी और लाखों महिलाओं के साथ दुष्कर्म हो चुका था। पाकिस्तान की फौज बंगाली मुसलमानों की नस्ल बदलने के लिए रेप कैंप संचालित कर रही थी। इन कैंपों में जन्मे हजारों बच्चों के पुनर्वास के लिए बाद में बांग्लादेश की सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दत्तक ग्रहण कार्यक्रम चलाना पड़ा।

लगभग 4000 भारतीय सैनिकों के बलिदान के बाद ये पाशविक अत्याचार बंद हुए और बांग्लादेश का निर्माण हुआ, परंतु हमने न तो इन अत्याचारों के अपराधी एक भी पाकिस्तानी सैनिक या सैन्य अधिकारियों को सजा दी और न ही इन जनसंहारों और अत्याचारों में पाकिस्तानी फौज का साथ देने वाले स्थानीय जमाती रजाकारों को ही मिटा डालने के लिए कुछ किया। भारत ने सोचा कि बांग्लादेश के मुसलमान पाकिस्तानी फौज और जमातियों के इन भयावह अत्याचारों को झेलने के बाद अब कभी भी इस्लामिक कट्टरपंथ के रास्ते नहीं चलेंगे और न ही पाकिस्तान से हाथ मिलाने की कभी सोचेंगे।

इसी गलत आकलन के आधार पर बंगाली मुसलमानों के लिए तो भारत ने पूरा नया देश बनाकर दे दिया, परंतु वहां रह रहे हिंदुओं और बौद्धों को एक बार फिर से वहां के मुस्लिम समाज के भरोसे छोड़ दिया।

भारत में नीति-निर्माता भूल गए कि 1946 में बंगाली मुसलमानों ने मुस्लिम लीग का साथ देते हुए जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन में सबसे अग्रणी भूमिका निभाई थी और नोआखाली में हिंदुओं के नरसंहार को अंजाम दिया था। बांग्लादेश की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले अधिकतर नेता और सैन्य अधिकारी मुस्लिम लीग और पाकिस्तानी फौज में रह चुके थे।

भारत ने पाकिस्तान से अलग होकर बने नए देश बांग्लादेश के नेताओं और सेना पर इतना भरोसा किया कि चटगांव हिल ट्रैक्ट्स जैसे सामरिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों को भी बांग्लादेश के कब्जे में ही छोड़ दिया, जबकि 1947 के बंटवारे में चटगांव हिल ट्रैक्ट्स भारत के हिस्से में आने चाहिए थे, क्योंकि भारत-पाकिस्तान बंटवारे के अंतर्गत बंगाल का बंटवारा हुआ था और चटगांव हिल ट्रैक्ट्स उस समय बंगाल का भाग नहीं था। न ही वह मुस्लिम बहुल था, जो पाकिस्तान को दिया जाता।

यही कारण था कि वहां की जनता को लगा था कि उनका भारत का भाग बनना निश्चित है और 15 अगस्त, 1947 को वहां तिरंगा लहराया भी गया था, परंतु बंगाल बाउंड्री कमीशन ने अप्रत्याशित रूप में 17 अगस्त, 1947 को चटगांव हिल ट्रैक्ट्स को पाकिस्तान को दे दिया और पाकिस्तान की फौज ने वहां से तिरंगा उतारा।

1971 की जीत के बाद भारत चटगांव हिल ट्रैक्ट्स वापस ले सकता था, परंतु ऐसा नहीं किया गया, क्योंकि हम यह दिखाना चाहते थे कि हमने तो सिर्फ मानवता के आधार पर बांग्लादेश की सहायता की है, जबकि चटगांव और त्रिपुरा के बीच में मात्र 28 किमी लंबी पट्टी है, जिस पर भारत का अधिकार होने पर भारत के उत्तर पूर्व को समुद्री तट प्राप्त हो सकता था और वहां का आर्थिक विकास हो सकता था। इसके अलावा चीन और अमेरिका को बंगाल की खाड़ी में पैर जमाने से रोका जा सकता था और लाखों बौद्धों एवं हिंदुओं की रक्षा हो सकती थी।

आज बांग्लादेश में जो हालात हैं, उससे यह स्पष्ट है कि इस्लामिक कट्टरपंथ और भारत के प्रति घृणा वहां के समाज पर अब उसी तरह हावी है, जैसे पाकिस्तान पर हावी है। वह भारत के एहसान और बलिदान, दोनों को ही भूल चुका है। इसलिए भारत में नीति-निर्माताओं को आज के बांग्लादेश संकट को पूर्व में शेख मुजीब और जियाउर रहमान की हत्याओं से उपजे राजनीतिक संकटों की तरह समझना बंद कर देना चाहिए। वे हिंसा के बावजूद अंततोगत्वा राजनीतिक संकट थे, परंतु इस बार ऐसा नहीं है। बांग्लादेश के समाज का बड़े पैमाने पर जिहादीकरण हुआ है और यदि हमने इस तथ्य की अनदेखी कर उसे राजनीतिक समस्या समझकर उससे निपटने की कोशिश की तो हम वैसे ही पछताएंगे, जैसे कश्मीर के मामले में पछताते आए हैं।

हम बांग्लादेश में चाहे जिस पार्टी का समर्थन करें, वहां के गली-मोहल्लों में कट्टरपंथी जमाती हावी रहने वाले हैं और चाहे किसी भी पार्टी की सरकार वहां आए, वह उनके सामने मजबूर रहने वाली है। इसके चलते भविष्य में बांग्लादेश के हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के समक्ष खतरा बढ़ जाए तो हैरानी नहीं। इस खतरे को देखते हुए हमें वहां अपनी सीमा के निकट और अपनी पहुंच के अंदर के हिंदू और बौद्ध परिक्षेत्रों में अपनी स्थिति मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए। हमें इजरायल से सीखना चाहिए, जो हर सैन्य जीत या संकट के बाद अपने भूभाग का विस्तार करता है, ताकि वह यहूदियों के लिए नए परिक्षेत्र बसा सके और अपने सामरिक प्रभाव क्षेत्र का विस्तार कर सके।

(लेखक काउंसिल आफ स्ट्रैटेजिक अफेयर्स से संबद्ध विश्लेषक हैं)