विचार: नीतिगत निर्णयों में बढ़े युवाओं की भागीदारी
आज समय की मांग है कि वे गलतियां न दोहराई जाएं, जो 1947, 1977 या 2011-12 में हुईं। राजनीतिक दलों को गंभीर चिंतन करना होगा कि किस प्रकार राष्ट्र के प्रति समर्पित और विकसित भारत की संकल्पना से ओतप्रोत योग्य युवाओं को राजनीति की ओर आकृष्ट किया जाए।
HighLights
युवाओं को नीतिगत निर्णयों में हिस्सेदारी मिलनी चाहिए।
व्यवस्थागत भ्रष्टाचार युवाओं के आक्रोश का मूल कारण है।
राजनीतिक दलों को युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।
डॉ. एके वर्मा। आज का युवा कल का प्रौढ़ और भविष्य का वृद्ध है। उसे अपने वर्तमान और भविष्य हेतु नीतिगत निर्णयन में हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। युवा समाज का विशाल और शक्तिशाली भाग है। शक्ति सदैव अपना मार्ग स्वयं ढूंढ़ लेती है। यदि शक्ति को समुचित मार्ग न मिला, तो वह विध्वंसकारी हो सकती है, भले ही समाज या देश को उसकी भारी कीमत क्यों न चुकानी पड़े। कुछ समय से देश में छात्रों और युवाओं के प्रदर्शनों की बाढ़ आई हुई है। दिल्ली में जंतर-मंतर पर हुए उच्छृंखल, अश्लील और हिंसक प्रदर्शन भले ही प्रायोजित थे, लेकिन उसमें अनेक मासूम छात्रों और युवाओं ने भाग लिया। उसके विपरीत रांची का अहिंसक छात्र आंदोलन एक प्रतिमान रहेगा। इन दोनों आंदोलनों की गूंज छोटे-छोटे शहरों में भी दिखी, पर युवा समझते हैं कि किसी मंत्री के इस्तीफा देने मात्र से उनकी मूल-समस्या का समाधान होने वाला नहीं। खोट व्यवस्था में है, अतः समाधान सत्ता परिवर्तन में नहीं, व्यवस्था परिवर्तन में है, पर व्यवस्था परिवर्तन होगा कैसे?
कोई भी सरकार आए-जाए, लेकिन मंत्रियों, सांसदों और विधायकों की भ्रष्टाचार में संलिप्तता, सरकारी कार्यालयों और पुलिस में खुलेआम रिश्वतखोरी, भाई-भतीजावाद और जातिवाद बेलगाम रहते हैं। जो पार्टी सत्ता में आती है, वह कोई ऐसा सिस्टम नहीं बनाती जिससे निष्पक्ष, न्यायसंगत और पारदर्शी निर्णय हो सके। सभी पार्टियां जनहित के मुखौटे ओढ़ स्वहित साधती हैं। छात्रों और युवाओं की घुटन और आक्रोश का मूल कारण यही है। देश ने युवाओं-छात्रों के अनेक आंदोलन देखे हैं। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान असहयोग आंदोलन(1920), सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930) या भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में युवाओं-छात्रों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। लक्ष्य बड़ा था, लेकिन नेतृत्व गांधीजी के परिपक्व हाथों में था। लक्ष्य प्राप्त कर युवा बिखर गए, अपने भविष्य को संरक्षित करने, पढ़ने-लिखने में जुट गए। वे सत्ता और निर्णयन से दूर हो गए।
दूसरा बड़ा छात्र/युवा आंदोलन समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण (जेपी) के नेतृत्व में महंगाई, बेरोजगारी और कुशासन के विरुद्ध बिहार से 1974 में शुरू हुआ, जिसे संपूर्ण क्रांति कहा गया। यह कांग्रेस और इंदिरा गांधी के कुशासन, अधिनायकवाद और संविधान विरोधी गतिविधियों के विरुद्ध था, जिसे कुचलने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1975 में आपातकाल लगा कर विपक्षी नेताओं को जेलों में डाल दिया, प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी, तमाम युवाओं की नसबंदी कर समाज में अभूतपूर्व डर का माहौल बना दिया। इस आंदोलन से चंद्रशेखर, कृष्णकांत, मोहन धारिया, रामधन आदि नेता निकले।
इस आंदोलन से 1977 में जनता पार्टी सरकार बनी जरूर, पर वैचारिक मतभेद के कारण एकजुट हुई राजनीतिक शक्तियों में बिखराव हो गया और युवा फिर अपनी पढ़ाई की ओर लौट गए। तीसरा युवा-छात्र जन-आंदोलन सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार के विरुद्ध 2011 में हुआ, जिसमें भ्रष्टाचार रोकने हेतु ‘लोकपाल’ की मांग की गई थी। यह आंदोलन भले ही दिल्ली में हुआ, पर इसने देश के युवाओं में एक अभूतपूर्व चेतना भर दी। दुर्भाग्य से अरविंद केजरीवाल आदि नेताओं ने अन्ना हजारे को किनारे कर आम आदमी पार्टी का गठन किया और दिल्ली में 10 वर्षों से अधिक तक सरकार चलाई, जिसने भ्रष्टाचार के नए-नए प्रतिमान बनाए। युवा फिर ठगे गए। इन तीनों आंदोलनों में नेतृत्व गांधी, जेपी और अन्ना हजारे के हाथों में था, जिनमें सक्रिय राजनीति में आने की कोई महत्वाकांक्षा नहीं थी।
काकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का तथाकथित जेन-जी आंदोलन विदेश से अचानक प्रकट हुए अभिजीत दीपके द्वारा इंटरनेट मीडिया के माध्यम से चलाया गया। जेन-जी के नाम पर हुआ आंदोलन आंबेडकरजी के विचारों के खिलाफ था, जिन्होंने 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में कहा था, 'अब हमें क्रांति के हिंसक तरीकों को तिलांजलि दे देना चाहिए। हमें सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रह जैसे असंवैधानिक तरीकों को भी त्याग देना चाहिए।...जब समस्याओं के समाधान हेतु संवैधानिक मार्ग उपलब्ध न थे, तब ऐसे असंवैधानिक तौर-तरीकों का औचित्य था, लेकिन जब संवैधानिक तरीके उपलब्ध हों, तो ऐसे असंवैधानिक तरीकों का कोई औचित्य नहीं।' आंबेडकर की सलाह के विरुद्ध विपक्ष ने राजनीतिक लाभ हेतु ऐसे ही आंदोलन का समर्थन किया। अनेक भोले-भाले छात्र-छात्राएं सीजेपी और विपक्ष के शिकार हुए। वास्तव में युवाओं का आक्रोश 75 वर्षों से चली आ रही सड़ी-गली व्यवस्था के प्रति था, जिसमें शिक्षा और रोजगार में श्रम, मेधा और योग्यता का स्थान सिकुड़ता जा रहा है तथा राजनीतिक हस्तक्षेप, भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार और अयोग्यता नागफनी की तरह अपना दायरा बढ़ाती जा रही है।
आज राजनीतिक दल युवाओं से संवाद कर रहे हैं। यह स्वागतयोग्य है, पर जो दल पहले कहीं सत्तासीन रहे हैं, वे भी कठघरे में रहेंगे। युवा उनसे भी सवाल पूछेंगे। उनके कुशासन की याद दिलाएंगे। संवाद से आगे बढ़कर दलों को सत्ता संरचना, नीति निर्णयन, विकास, सुशासन और प्रशासन में युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। पूर्व में विश्वविद्यालयों- महाविद्यालयों में छात्र संघों पर अराजक और राजनीतिक तत्वों ने जैसा कब्जा किया, उससे न केवल अकादमिक परिवेश प्रदूषित हुआ, बल्कि योग्य एवं गंभीर युवाओं के राजनीति में आने की संभावनाएं खत्म हो गईं। आज समय की मांग है कि वे गलतियां न दोहराई जाएं, जो 1947, 1977 या 2011-12 में हुईं। राजनीतिक दलों को गंभीर चिंतन करना होगा कि किस प्रकार राष्ट्र के प्रति समर्पित और विकसित भारत की संकल्पना से ओतप्रोत योग्य युवाओं को राजनीति की ओर आकृष्ट किया जाए।
(लेखक सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसायटी एंड पॉलिटिक्स के निदेशक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)












