जागरण संपादकीय: हिमालय की निगरानी
हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में हजारों ग्लेशियर और झीलें हैं। इन सभी की निगरानी की आवश्यकता कहीं अधिक बढ़ गई है। एक समय हिमालय की चोटियों पर होने वाले बदलाव की निगरानी करना कठिन था, लेकिन आज ऐसी तकनीक उपलब्ध है, जिससे यह काम कहीं अधिक आसानी से किया जा सकता है। अब इसे किया ही जाना चाहिए।
HighLights
नेपाल में आई विनाशकारी आपदा केवल इस देश के लिए ही आघातकारी नहीं है। यह भारत के लिए भी दुख और चिंता का कारण बनी है। एक तो इसलिए, क्योंकि इस आपदा में बड़ी संख्या में भारतीयों ने भी अपनी जान गंवाई है और दूसरे इसलिए कि नेपाल की नदियां जब भी उफनाती हैं तो वे बिहार और उत्तर प्रदेश के एक हिस्से में भी बाढ़ का कारण बनती हैं।
इन स्थितियों में यह आवश्यक हो जाता है कि भारत और नेपाल आपस में मिलकर ऐसे किसी तंत्र की स्थापना करें, जिससे हिमालय में होने वाले हिमस्खलन और भूस्खलन की सतत निगरानी की जा सके। इस निगरानी की आवश्यकता केवल इसलिए नहीं है कि हिमालय एक नाजुक पर्वतीय संरचना है, बल्कि इस कारण भी है कि यह वह क्षेत्र है जो ग्लोबल वार्मिंग के चलते ग्लेशियरों को लगातार पिघलता हुआ देख रहा है।
वैसे तो ये ग्लेशियर कई नदियों के उद्गम स्थल हैं, लेकिन ग्लोबल वार्मिंग के चलते जब वे अचानक तेजी से पिघलते हैं तो पर्वतीय नदियों में विनाशकारी बाढ़ का कारण बनते हैं। ऐसी बाढ़ हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड से लेकर पूर्वोत्तर में भी देखने को मिल चुकी है। ग्लेशियरों में टूट-फूट का सिलसिला तेज होने के कारण वैसी आपदाओं की आशंका बढ़ गई है, जैसी पिछले दिनों तिब्बत और नेपाल में देखने को मिली। ग्लेशियरों के टूटने-पिघलने से पर्वतीय नदियों में अचानक आने वाली बाढ़ इसलिए कहीं अधिक विनाशकारी हो जाती है, क्योंकि उनके तटों पर आबादी की बसाहट बढ़ती जा रही है।
आबादी की यह बसाहट नदियों के किनारों पर अतिक्रमण का कारण भी बनती है। स्पष्ट है कि पर्वतीय क्षेत्रों में नदियों किनारे होने वाली बसाहट पर सख्ती से रोक लगाई जानी चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो आने वाले समय में हिमालय क्षेत्र की पर्वतीय नदियों में अचानक आने वाली बाढ़ कहीं अधिक जन-धन हानि का कारण बनेगी।
वैसे तो आवश्यकता इस बात की है कि हिमालयी क्षेत्र के सभी देश ग्लेशियरों की निगरानी के लिए कोई साझा तंत्र विकसित करें, लेकिन इसमें संदेह है कि सभी देश और विशेष रूप से चीन इसमें स्वेच्छा से शामिल होने के लिए आगे आए। ऐसे में कम से कम भारत, नेपाल और भूटान को तो एकजुट होना ही चाहिए। हिमालय क्षेत्र में होने वाली दुर्घटनाएं लगातार यह संकेत कर रही हैं कि हिमालयी आपदाओं को किसी राष्ट्र विशेष की सीमा में नहीं सीमित किया जा सकता।
हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में हजारों ग्लेशियर और झीलें हैं। इन सभी की निगरानी की आवश्यकता कहीं अधिक बढ़ गई है। एक समय हिमालय की चोटियों पर होने वाले बदलाव की निगरानी करना कठिन था, लेकिन आज ऐसी तकनीक उपलब्ध है, जिससे यह काम कहीं अधिक आसानी से किया जा सकता है। अब इसे किया ही जाना चाहिए।











