जागरण संपादकीय: आर्थिकी के अच्छे दिन
7.8 प्रतिशत विकास दर के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था एक बार फिर सबसे तेज बढ़ती आर्थिकी बनी, लेकिन भारत को इससे संतुष्ट नहीं होना चाहिए।
HighLights
वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 7.8% जीडीपी वृद्धि।
घरेलू मांग, विनिर्माण और निर्माण ने विकास को गति दी।
प्रधानमंत्री ने 8% से अधिक विकास दर का लक्ष्य रखा।
वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में जीडीपी की वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रहना इसलिए सुखद आश्चर्य का विषय है, क्योंकि ऐसे आंकड़े वैश्विक उथल-पुथल और विशेष रूप से ऊर्जा उत्पादों की ऊंची कीमतों के बाद भी सामने आए। अनेक अर्थशास्त्री ऐसी आशा नहीं कर रहे थे। इसलिए और भी, क्योंकि पिछले साल इसी तिमाही में अर्थव्यवस्था की विकास दर 6.9 प्रतिशत रही थी और अंतरराष्ट्रीय व्यापार परिदृश्य चुनौती भरा दिखाई दे रहा था।
इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही के जीडीपी के आंकड़े उम्मीद से बेहतर रहने का एक बड़ा कारण घरेलू मांग कायम रहना है। इसके अलावा सरकारी कैपिटल खर्च, मैन्यूफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन और एक्सपोर्ट ने भी जीडीपी वृद्धि में योगदान दिया। यह स्वाभाविक है कि जीडीपी के उम्मीद से अच्छे आंकड़ों पर प्रधानमंत्री ने प्रसन्नता व्यक्त की और इन्हें निराशावादियों के लिए झटका बताया। यह स्पष्ट है कि उनका संकेत उनकी ओर था, जो कुछ समय पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के भारतीय अर्थव्यवस्था को मृत बताए जाने के खीझ भरे दावे का समर्थन कर रहे थे।
जीडीपी के आकर्षक आंकड़े यह भी रेखांकित कर रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था अमेरिका से व्यापार समझौता न हो पाने के बाद भी अपनी क्षमता का प्रदर्शन कर रही है। चूंकि इसमें उन व्यापार समझौतों का योगदान रहा, जो पिछले कुछ समय में कई देशों के साथ हुए, इसलिए ऐसे समझौतों का सिलसिला कायम रहना चाहिए। इससे अर्थव्यवस्था को बल देने के साथ अमेरिका के दबाव का प्रतिकार करने में भी सफलता मिलेगी।
7.8 प्रतिशत विकास दर के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था एक बार फिर सबसे तेज बढ़ती आर्थिकी बनी, लेकिन भारत को इससे संतुष्ट नहीं होना चाहिए। विकास दर बढ़ने के साथ ही भारतीय नागरिकों की औसत आय बढ़ना भी आवश्यक है। इसके लिए भारत का लक्ष्य आठ प्रतिशत से अधिक विकास दर हासिल करना होना चाहिए। ऐसा इसलिए होना चाहिए, क्योंकि एक तो भारतीय अर्थव्यवस्था इस लक्ष्य को पाने की क्षमता रखती है और दूसरे ऐसी विकास दर ही देश को विकसित बनाने के लक्ष्य को आसान बना सकती है। इससे ही निर्धनता को दूर करने के उपायों को बल देने में सफलता मिलेगी।
अब जब यह स्पष्ट है कि मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ ने जीडीपी को सहारा देने का काम किया, तब फिर इस सेक्टर की क्षमता में वृद्धि होनी चाहिए। मैन्यूफैक्चरिंग के अलावा कंस्ट्रक्शन सेक्टर ने भी जीडीपी को बल दिया। सबसे ज्यादा लोगों को काम देने वाला यह सेक्टर और फले-फूले, लेकिन गुणवत्ता के मानकों पर खरा उतरते हुए। यह देखने की जिम्मेदारी नीति-नियंताओं की है। उन्हें इसके प्रति भी सतर्क रहना होगा कि कमजोर मानसून अगली तिमाही की विकास दर को प्रभावित न करने पाए।











