श्रीराम चौलिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ की बैठक में भाग लेने जा रहे हैं। भौगौलिक आकार और सदस्य देशों की जनसंख्या के अनुसार विश्व का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संस्थान एससीओ अपनी स्थापना की रजत जयंती मना रहा है। इस उपलक्ष्य में आशा है कि भारत अधिक सक्रिय भूमिका निभाते हुए अपने हितों को आगे बढ़ाएगा। भारत वर्ष 2017 से इस संस्था का स्थायी सदस्य है और अपनी अलग पहचान बनाने के लिए प्रयासरत है। चीन और रूस जैसे दिग्गज आरंभ से ही इस संगठन का हिस्सा रहे हैं। जबकि कजाखस्तान, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान जैसे छोटे मध्य एशियाई देश भी संगठन के सह-संस्थापक थे, जो इन दो महारथी देशों के बीच अपने हितों को संतुलित करते आ रहे हैं।

वर्ष 2017 से भारत जब पूर्ण सदस्य बना तो मध्य एशियाई देशों की अपेक्षा थी कि वह रूस और चीन के सापेक्ष तीसरे स्तंभ के तौर पर शक्ति संतुलन लाएगा। भारतीय सोच से यह अपेक्षा मेल भी खाती है, क्योंकि मध्य एशिया को नई दिल्ली में 'विस्तारित पड़ोस' माना जाता है और वहां पैठ बनाना आर्थिक और भूराजनीतिक दृष्टिकोण से लाभदायी है। एससीओ में आकर भारत ने मध्य एशिया को ही संगठन के केंद्रबिंदु के रूप में रखने के सिद्धांत को बल दिया है, ताकि छोटे देशों को किसी के दबदबे में रहने पर विवश न होना पड़े।

देखा जाए तो यूरेशिया की भूराजनीति और प्रतिस्पर्धा के कारण एससीओ में भारत अब तक उतना प्रभावशाली नहीं हो पाया है। भारत के प्रमुख हितैषी रूस ने जब एससीओ में उसकी पूर्ण सदस्य्ता का प्रस्ताव रखा तो चीन ने उस पहल को रोकने के बजाय एक सौदेबाजी के तहत अपने करीबी मित्र पाकिस्तान को भी सदस्यता दिलाई, ताकि भारत 'संतुलन बनाने वाले' के बजाय 'संतुलित' होकर रह जाए। पाकिस्तान 2017 से ही चीन के कनिष्ठ साझेदार के रूप में एससीओ में भारत के लिए बाधाएं खड़ी करता आया है। सुरक्षा के मुद्दों पर भारत ने एससीओ में जब भी आतंकवाद, उग्रवाद और अलगाववाद के विरुद्ध दोहरे मापदंड को त्यागकर सख्त कदम उठाने की मांग की और साझा रणनीति बनाने का प्रस्ताव रखा तो पाकिस्तान ने चीनी मदद से उसमें अवरोध ही खड़े किए।

जैसे 2025 में एससीओ रक्षा मंत्रियों के घोषणापत्र के मसौदे में पाकिस्तान के भीतर बलूचिस्तान में जफर एक्सप्रेस रेल हमले की तो निंदा की गई, लेकिन भारत के पहलगाम में हुए आतंकी हमले का उल्लेख नहीं किया गया। इससे पहले 2023 में जब भारत ने एससीओ की अध्यक्षता के दौरान सीमापार आतंकवाद और आतंकी ठिकानों को खत्म करने के लिए संयुक्त घोषणापत्र में ठोस कार्रवाई वाली भाषा को शामिल करना चाहा तो चीन, पाकिस्तान ने उसे कमजोर कर दिया। एससीओ मूलतः प्रांतीय सुरक्षा को कायम करने के उद्देश्य से बनाया गया था, पर चीन और पाकिस्तान ने इस मोर्चे पर अपेक्षित प्रगति होने ही नहीं दी।

जहां तक भारत की बात है तो उसने आतंकवाद के सभी स्वरूपों से लड़ने की प्रतिबद्धता के अलावा एससीओ में संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान को भी प्राथमिकता दी है। इसका परोक्ष निशाना एक तरह से चीन ही है, जिसने अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव यानी बीआरआइ के तहत गुलाम जम्मू-कश्मीर के इलाकों पर पाकिस्तान के अवैध कब्जे को मान्यता दी है और छोटे विकासशील देशों को कर्ज में डुबोया है। दिल्ली संयुक्त बयान (2023) में भारत ने चीनी परियोजना बीआरआइ का समर्थन करने से इन्कार कर दिया था और इन विषयों पर असहमति के कारण उस वर्ष की शिखर बैठक को केवल तीन घंटों से कम अवधि में आनलाइन सम्मलेन कराकर निपटा दिया था।

एससीओ की भारतीय अध्यक्षता के दौरान निराशा के चलते भले ही इस संगठन की अहमियत पर सवाल उठे, लेकिन भारत मैदान छोड़कर भागने वालों में से नहीं है। खासकर जब वह मध्य एशिया के साथ व्यापार और रक्षा संबंध मजबूत करना चाहता है। इसी क्रम में भारत ने 2022 में मध्य एशिया के सभी पांच देशों के साथ पहली बार संयुक्त शिखर बैठक आयोजित की। इन देशों के साथ भारत के आर्थिक संबंध भी धीरे-धीरे प्रगाढ़ हो रहे हैं। पाकिस्तान द्वारा मध्य एशिया से सीधे जमीनी संपर्क रोके जाने के बावजूद भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह और खासकर एयर फ्रेट कारिडोर का इस्तेमाल करके इन देशों को दवाइयां, मेडिकल उपकरण और मशीनरी का निर्यात बढ़ाया है। चीन और रूस की तुलना में भारत अब भी मध्य एशियाई देशों का बहुत बड़ा व्यापारिक साझेदार नहीं है, लेकिन पाकिस्तान के सापेक्ष अफगानिस्तान का रणनीतिक कायापलट और भारतीय सामान को मध्य एशिया तक पहुंचाने के लिए अफगानिस्तान का उत्साह व्यापार बढ़ाने के नए रास्ते खोल रहा है। अफगानिस्तान को एससीओ का पूर्ण सदस्य बनाने के लिए तो भारत को पैरवी करनी चाहिए।

इसमें संदेह नहीं कि सूचना प्रौद्योगिकी और डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर में भारत चीन से आगे है और इन सेवाओं के लिए भौगोलिक कनेक्टिविटी की भी जरूरत नहीं है। भारत मध्य एशिया में प्रौद्योगिकी के मोर्चे पर नेतृत्वकर्ता बनने की स्थिति में है और वह एससीओ को इस क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करने में प्रयासरत भी है। एससीओ का इतिहास भी देखें तो रूस ने यूरेशिया में चीन के आर्थिक वर्चस्व पर लगाम देने का प्रयास किया है। एससीओ में भारत के उत्थान से रूस आश्वस्त हो सकता है कि संगठन में आर्थिक मुद्दों को प्राथमिकता देने में कोई हर्ज नहीं है, क्योंकि भारत उनमें विविधीकरण ला सकता है। ऐसे में एससीओ के अंदर रूस-भारत तालमेल को नए अंदाज से आगे ले जाना अनिवार्य होगा। किर्गिस्तान में एससीओ सम्मलेन से इतर प्रधानमंत्री मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की द्विपक्षीय बैठक इस संदर्भ में अहम होने वाली है। कुल मिलाकर, एससीओ से भारत को मिले-जुले परिणाम प्राप्त हुए हैं, लेकिन अगर भारत अपनी निजी क्षमताओं और बदलते भूराजनीतिक समीकरणों के आधार पर इस संगठन में टिक कर अपनी स्थिति बेहतर बना लेता है, तो यूरेशिया में तीसरा ध्रुव बनने की आकांक्षा को पूरा कर सकेगा।

(लेखक जिंदल स्कूल आफ इंटरनेशनल अफेयर्स में प्रोफेसर और डीन हैं)