विचार: भारत-चीन रिश्तों की नई दिशा
स्पष्ट है कि भारत कूटनीतिक उम्मीदों के फेर में पड़कर अपनी रणनीतिक चौकसी और तैयारियों में कोई ढिलाई नहीं बरतेगा।
HighLights
डोभाल-वांग यी वार्ता में सीमा विवादों पर हुई चर्चा।
सीमा प्रबंधन हेतु नए संपर्क तंत्र स्थापित करने पर सहमति।
कैलाश मानसरोवर यात्रा, सीमा व्यापार फिर से शुरू होगा।
हर्ष वी. पंत। बीते दिनों बीजिंग में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच विशेष प्रतिनिधि स्तर की 25वें दौर की वार्ता संपन्न हुई। सीमा संबंधी मुद्दों पर केंद्रित इस बैठक को दोनों देशों के नाजुक द्विपक्षीय रिश्तों को साधने की दिशा में एक अहम और नपा-तुला कदम कहा जा सकता है। दरअसल यह वार्ता अक्टूबर 2024 में एलएसी पर टकराव वाले बिंदुओं से सुरक्षा बलों की वापसी के समझौते और उसके उपरांत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं राष्ट्रपति शी चिनफिंग के बीच बनी सहमति की बुनियाद पर आगे बढ़ी है।
हालिया वार्ता का वास्तविक महत्व सीमा संबंधी मुद्दे पर किसी बड़ी या अप्रत्याशित उपलब्धि में नहीं, अपितु ऐसे स्थायी तंत्र की स्थापना से जुड़े प्रयासों में निहित है, जिससे किसी भावी टकराव को टाला जा सके और द्विपक्षीय राजनीतिक एवं आर्थिक जुड़ाव को चरणबद्ध रूप से बहाल किया जा सके। इस संदर्भ में आठ-सूत्रीय संयुक्त सहमति ऐसे संकेत भी करती है कि दोनों देश महज तात्कालिक सैन्य तनाव के समाधान से आगे बढ़कर द्विपक्षीय संबंधों को कहीं व्यापक स्थिरता प्रदान करने वाले एक औपचारिक एवं दीर्घकालिक तंत्र के निर्माण की दिशा में अग्रसर होते दिख रहे हैं।
इस बैठक का सर्वाधिक महत्वपूर्ण निष्कर्ष संयुक्त विशेषज्ञ समूह और समन्वय एवं परामर्श के लिए कार्यकारी ढांचा यानी डब्ल्यूएमसीसी के तहत सीमा प्रबंधन कार्य समूह को सीमांकन एवं प्रबंधन के मोर्चे पर त्वरित एवं ठोस प्रगति का लक्ष्य सौंपना है। यह शब्दावली खासी अर्थपूर्ण है। यह इस वास्तविकता को रेखांकित करती है कि सीमा विवाद का पूर्ण समाधान अभी कठिन भले ही हो, लेकिन यह वार्ता उन क्रमिक समझौतों की जमीन जरूर तैयार करती है, जिनसे सीमावर्ती इलाकों में अनिश्चितता और तनाव को घटाया जा सके। इस क्रम में दोनों सेनाओं के बीच सीधा संपर्क तंत्र भी उतना ही अहम है। वरिष्ठ सैन्य कमांडरों के बीच बातचीत के लिए दो नए बैठक स्थल बनाने और पूर्वी एवं मध्य सेक्टरों में दो नई हाटलाइंस स्थापित करने पर सहमति बनी है। असीमांकित एलएसी के किसी भी ऐसे मोर्चे पर जहां किसी स्थानीय झड़प के बड़ा रूप लेने की आशंका हो, वहां ऐसा तंत्र उसे नरम करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
वर्ष 2005 के राजनीतिक मानदंडों और मार्गदर्शक सिद्धांतों वाले समझौते की पुष्टि भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। इस दिशा में न्यायसंगत, तर्कसंगत और परस्पर स्वीकार्य समाधान के प्रति अपनी निष्ठा दोहराते हुए दोनों देशों ने सीमा संबंधी मुद्दे के अंतिम समाधान के राजनीतिक तंत्र को कायम रखा है। हालांकि इस मोर्चे पर किसी ठोस प्रगति के लिए अभी लंबा सफर तय करना बाकी है। बहरहाल वार्ता से यह भी स्पष्ट है कि भारत और चीन दोनों ही सीमा विवादों के साए को समग्र रिश्तों पर हावी रहने देने के नुकसान को संभवत: समझने लगे हैं। इस सिलसिले में कैलास मानसरोवर यात्रा की बहाली और चिह्नित दर्रों से सीमा व्यापार फिर से शुरू करने पर सहमति दरअसल लोगों के बीच संपर्क और व्यापारिक संबंधों को धीरे-धीरे पटरी पर लाने की तैयारी है। इसके साथ ही साझा नदियों पर विशेषज्ञ समूह की बैठक का निर्णय यह रेखांकित करता है कि दोनों पक्ष रणनीतिक असहमतियों के बीच भी उन मुद्दों पर संवाद बहाली के इच्छुक हैं, जहां परस्पर हित जुड़े हुए हैं।
अब भारत 26वें दौर की वार्ता की मेजबानी करेगा, जिसमें इस सक्रियता के लिए संस्थागत आधार और मजबूत होने की उम्मीद है। चीन में हुई वार्ता के रुझान दर्शाते हैं कि किसी तात्कालिक संकट को टालने के बजाय स्थिरता और स्थायित्व पर कहीं अधिक जोर है। दोनों देशों का 'प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि साझीदार' होने पर बल देना तल्ख रणनीतिक शब्दावली को नरम करने और कूटनीतिक जुड़ाव का माहौल बनाने की ही जुगत अधिक लगती है। हालांकि अतीत को देखते ऐसे प्रयासों को द्विपक्षीय संबंधों के मूलभूत स्वरूप में किसी आमूलचूल परिवर्तन के तौर पर नहीं देखा जा सकता। फिर भी, कुछ बिंदुओं का उल्लेख महत्वपूर्ण है। जैसे दोनों सेनाओं के बीच नई संवाद व्यवस्था से स्थानीय झड़पों के बड़ा रूप लेने का जोखिम घटेगा।
इसके लिए परस्पर विश्वास और नियमित संवाद आवश्यक होगा। त्वरित प्रगति का दृष्टिकोण जमीनी हकीकत को दर्शाता है कि सीमा विवाद का पूर्ण समाधान तुरंत संभव नहीं है, लिहाजा क्रमबद्ध समझौतों के माध्यम से ही टकराव घटाने और विश्वास कायम करने की उम्मीद की जा सकती है। वहीं, कैलास मानसरोवर यात्रा और सीमावर्ती व्यापार का धीरे-धीरे खुलना भी यह रेखांकित करता है कि दोनों देश रिश्तों को अलग-अलग खांचों में बांटकर आगे बढ़ने की रणनीति अपना रहे हैं, ताकि बड़े रणनीतिक विवादों के बावजूद चुनिंदा क्षेत्रों में सहयोग जारी रखा जा सके। भारत और चीन के बीच बनी इस सहमति का समय भी महत्वपूर्ण है, जो द्विपक्षीय स्तर कुछ कूटनीतिक स्थिरता प्रदान करता है। खासतौर से तब, जब दोनों देश शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ और ब्रिक्स जैसे मंचों पर सक्रियता बढ़ा रहे हैं।
इस सबके बावजूद हालिया वार्ता को एक बड़ा रणनीतिक बदलाव मानने के बजाय तनाव को घटाने की कवायद भर समझा जाना चाहिए। ऐसा इसलिए, क्योंकि दोनों देशों के बीच अविश्वास की जड़ें काफी गहरी हैं। एलएसी पर इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण, हिमालयी सीमा पर सैन्य शक्ति का संतुलन, गहराता व्यापार घाटा और क्षेत्रीय दबदबे की होड़ जैसे पहलू भविष्य में भी भारतीय नीति की दिशा को निर्धारित करेंगे। स्पष्ट है कि भारत कूटनीतिक उम्मीदों के फेर में पड़कर अपनी रणनीतिक चौकसी और तैयारियों में कोई ढिलाई नहीं बरतेगा। कुल मिलाकर, 25वें दौर की इस वार्ता का मर्म यही है कि भारत और चीन के रिश्ते 2020 से पहले वाली स्थिति में वापस नहीं जा रहे, बल्कि अब नियंत्रित होड़ के नए दौर में दाखिल हो चुके हैं। इसका उद्देश्य दोनों देशों की बुनियादी सामरिक प्रतिस्पर्धा की रेखा को एकाएक मिटाना नहीं, बल्कि एक तरह से उसे धुंधला कर किसी नए सैन्य टकराव में तब्दील होने से रोकना है।
(लेखक आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में उपाध्यक्ष हैं)











