विचार: अपनी सुविधा से शब्दों के चयन की होड़
भारतीय परिप्रेक्ष्य में ‘माओवाद’ हिंसा का पर्याय है, पर ‘माओवाद’ को केवल हथियारों की भाषा में समझना उसके व्यापक स्वरूप को सीमित करता है
HighLights
प्रधानमंत्री ने 'दिमागी नक्सल' की वैचारिक चुनौती पर प्रकाश डाला।
चुनिंदा आख्यान कैसे समाज की धारणाओं को प्रभावित करते हैं, बताया।
सत्य को तर्क और प्रमाण के साथ स्थापित करना आवश्यक है।
डॉ. ऋतु सारस्वत। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर देश को संबोधित करते हुए माओवाद की चर्चा में हथियारबंद माओवादियों के खात्मे में मिली सफलता का उल्लेख करते हुए कहा, 'हथियारबंद नक्सल तो गए, लेकिन दिमागी नक्सल मौके की तलाश में है। वे हिंसा-अराजकता के रास्ते खोज रहे हैं। समाज को गलत राह पर घसीटने के लिए भांति-भांति के दांव चल रहे हैं।'
भारतीय परिप्रेक्ष्य में ‘माओवाद’ हिंसा का पर्याय है, पर ‘माओवाद’ को केवल हथियारों की भाषा में समझना उसके व्यापक स्वरूप को सीमित करता है। उसकी चुनौती केवल बंदूक तक सीमित नहीं, बल्कि उस सोच तक भी जाती है, जो विचारों के स्तर पर समाज को आघात करने का प्रयास करती है।
प्रधानमंत्री ने ‘दिमागी नक्सल’ उसी मानसिकता की ओर संकेत करते हुए कहा, जो हथियारों के बजाय विचारों के जरिये समाज को प्रभावित करने और उसे गलत दिशा में ले जाने का प्रयास करती है।
प्रधानमंत्री ने जिस मानसिकता की पहचान करने की बात कही, उसे उसके संदर्भ से अलग करके देखने और उसका अर्थ अपनी पूर्व धारणा के अनुरूप तय करने की कोशिश शुरू हो गई। किसी बात को समग्रता में समझने के बजाय उसके चुने हुए अंश से अपने अनुकूल निष्कर्ष निकाल लेना इस प्रवृत्ति का हिस्सा है।
एक विशिष्ट प्रसंग की बात के किसी एक शब्द को चुनकर उसे व्यापक अर्थ दे देना न केवल उस कथन के मूल आशय के साथ न्याय नहीं करता, बल्कि यह भी दिखाता है कि अपनी सुविधा के अनुसार शब्दों का चुनाव और उनकी व्याख्या किस तरह एक अलग धारणा निर्मित कर सकती है। इसमें संदेह नहीं कि इस प्रसंग में शब्दों का चयन और संदर्भ की अनदेखी अपने प्रयोजन के अनुरूप की गई।
जो बात अपने लाभ और उद्देश्य के अनुकूल थी, उसे सामने रखा गया और जो उस उद्देश्य में बाधक हो सकती थी, उसे पीछे छोड़ दिया गया। अफसोस यह है कि शब्दों का ऐसा मकड़जाल रचा गया, जिसमें लोग उलझते चले गए और उसी को पूरा सत्य मानते रहे।
यह कोई पहली घटना नहीं है। अपने तात्कालिक लाभ के लिए, चर्चा या प्रसिद्धि प्राप्त करने की आकांक्षा अथवा किसी व्यक्ति या संस्था, यहां तक कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और उसके नेतृत्व की प्रतिष्ठा को क्षति पहुंचाने के उद्देश्य से ऐसी प्रवृत्तियों का सहारा लिया जाता रहा है, लेकिन चिंता केवल इतनी नहीं है कि किसी घटना का एक पक्ष चुनकर प्रस्तुत किया गया। वास्तविक चिंता यह है कि जब यही प्रक्रिया लगातार दोहराई जाती है तो धीरे-धीरे व्यक्ति की अपनी विवेक-बुद्धि भी उन्हीं चुने हुए अंशों और उनसे निर्मित धारणाओं के बीच काम करने लगती है।
वह स्वयं तथ्य और व्याख्या, संदर्भ और निष्कर्ष तथा वास्तविकता और निर्मित धारणा के बीच अंतर करना छोड़ देता है। यहीं से भीड़तंत्र केवल सड़कों या समाज में नहीं, व्यक्ति के अपने भीतर भी आकार लेने लगता है-जहां वह स्वयं सोचने के बजाय पहले से निर्मित धारणाओं के साथ चलने लगता है और शायद सिलेक्टिव नैरेटिव (चयनात्मक प्रस्तुति) की सबसे गंभीर सफलता यही है कि वह व्यक्ति को यह अहसास भी नहीं होने देता कि उसका सोच कब उसका अपना नहीं रह गया।
शब्दों को अपने अनुकूल अर्थ देना, वाक्यों को संदर्भ से काटना और आधे सत्य को पूरा सत्य बनाकर प्रस्तुत करना कोई नई कला नहीं है, लेकिन तब किसी बात को समाज की सामूहिक चेतना तक पहुंचने में समय लगता था। आज सूचना की रफ्तार इतनी तेज है कि किसी चुने हुए शब्द, वाक्य या दृश्य को उसके सत्य और संदर्भ की जांच से पहले ही हजारों-लाखों बार दोहराया जा सकता है। जो बात बार-बार सामने आती है, वह धीरे-धीरे केवल सुनी हुई बात नहीं रहती, बल्कि वह हमारी समझ का हिस्सा बनने लगती है।
यहां सवाल उठता है कि हम किसी ऐसी बात को इतनी आसानी से स्वीकार क्यों कर लेते हैं, जिसे हमने स्वयं कभी जांचा ही नहीं? दरअसल हम जो बार-बार सुनते हैं, उसे ही कई बार पर्याप्त ज्ञान मान लेते हैं। हमारी यही कमजोरी उन लोगों के लिए सबसे बड़ा अवसर बन जाती है, जो किसी उद्देश्य से आख्यान गढ़ते हैं। उन्हें मालूम है कि मूल स्रोत तक जाकर सत्य को जानने वालों की संख्या निरंतर कम होती जा रही है। ऐसे में, किसी बात को एक खास रूप में बार-बार परोस देना ही पर्याप्त है। धीरे-धीरे वही परोसी हुई बात सत्य की जगह लेने लगती है।
निकोलस कैर अपनी पुस्तक 'द शैलोज' में बताते हैं कि सूचना तक हमारी पहुंच जितनी आसान और तेज हुई है, उतना ही यह खतरा भी बढ़ा है कि हम किसी बात पर ठहरकर विचार करने के बजाय एक सूचना से दूसरी सूचना की ओर बढ़ते रहें। हमें ऐसे वैचारिक और सामाजिक परिवेश की आवश्यकता है, जहां झूठे आख्यान गढ़ने वालों को आईना दिखाया जा सके, लेकिन केवल असत्य को पहचान लेना पर्याप्त नहीं होगा।
उसके प्रभाव को तोड़ने के लिए हमें ऐसा सशक्त बौद्धिक और सामाजिक परिवेश विकसित करना होगा, जहां तथ्य, तर्क और प्रमाण के आधार पर सत्य को मजबूती से सामने रखा जा सके। नकारात्मकता का उत्तर केवल नकारात्मकता से नहीं, बल्कि एक ऐसे सुदृढ़ वैचारिक तंत्र से दिया जा सकता है, जो सत्य को उसके पूरे संदर्भ और प्रमाण के साथ समाज तक पहुंचाए।
(लेखिका समाजशास्त्र की प्रोफेसर हैं)











