विचार: हर मिनट का हिसाब दे संसद
भारत को सरकार, विपक्ष और पीठासीन अधिकारियों की सहमति से एक ‘संसदीय कार्य-निष्पादन संकल्प’ चाहिए। इसका पहला नियम सरल होना चाहिए: बिना भरपाई के कोई घंटा बर्बाद नहीं होगा।
HighLights
मानसून सत्र में संसद का अधिकांश समय बर्बाद हुआ।
कुल 173.1 घंटे का काम नहीं हो सका।
संसदीय कार्य-निष्पादन संकल्प से जवाबदेही सुनिश्चित हो।
प्रो. गौरव वल्लभ। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के संसदीय उत्पादकता डैशबोर्ड के अनुसार संसद के मानसून सत्र में लोकसभा ने 17.5 घंटे यानी निर्धारित समय का 15 प्रतिशत काम किया, जबकि राज्यसभा ने 37.37 घंटे यानी 33 प्रतिशत काम किया। पूरे सत्र में प्रत्येक सदन के लिए लगभग 114 घंटे निर्धारित थे। इस हिसाब से लोकसभा में करीब 96.5 घंटे और राज्यसभा में 76.6 घंटे का काम नहीं हो सका। दोनों सदनों को जोड़ें तो कुल 173.1 सदन-घंटे का काम नहीं हुआ। आम तौर पर बताए जाने वाले प्रति सदन प्रति मिनट 1.25 लाख रुपये को 173.1 घंटे की कमी पर लागू करें तो पूरे सत्र की संकेतात्मक अवसर लागत करीब 130 करोड़ रुपये बैठती है। यह ऐसी धनराशि नहीं है, जिसे वापस पाया जा सकता था। कर्मचारियों, सुरक्षा, प्रसारण और बुनियादी ढांचे पर खर्च चलता ही रहता है।
यह करदाताओं के पैसे से उपलब्ध उस क्षमता का पैमाना है, जो संसदीय काम में नहीं रूपांतरित हो सकी। वित्तीय लागत तो समस्या का केवल दिखाई देने वाला सिरा है। जब प्रश्नकाल नहीं चलता तो मंत्री उन सवालों से बच जाते हैं, जिन्हें पूछने के लिए करदाता संसद का खर्च उठाते हैं। जब शून्यकाल शोर में डूब जाता है तो निर्वाचन क्षेत्रों की चिंताओं का राष्ट्रीय मंच छिन जाता है। जब विधायी समय सिकुड़ता है तो विधेयक या तो अटकते हैं या पर्याप्त पड़ताल के बिना पारित हो जाते हैं। यह अब अपवाद नहीं, आदत बनती जा रही है। संसद तब काम करती है, जब राजनीतिक पक्ष तमाशे की जगह विचार-विमर्श को चुनते हैं। जेन-जी और मिलेनियल्स गतिविधि और उपलब्धि का फर्क अच्छी तरह समझते हैं। उनकी पेशेवर और नागरिक जिंदगी रियल-टाइम डैशबोर्ड, सेवा रेटिंग, डिलीवरी की समयसीमा और सामने दिखते परिणामों से जुड़ी है। वे पूछते हैं, ‘आपकी मौजूदगी से बदला क्या?’ सर्वोच्च विचार-विमर्श संस्था के लिए वे इस पुराने मानक को स्वीकार नहीं करेंगे।
संसद कोई कंपनी नहीं है और सांसद कार्यपालिका के कर्मचारी नहीं हैं। असहमति भी एक पक्ष है। एक तीखा सवाल काम है। किसी विधेयक के विरुद्ध तर्कपूर्ण भाषण काम है। विरोध भी संसद का वैध साधन है, लेकिन बार-बार नारेबाजी करके सदन स्थगित कराना अलग बात है। इससे एक समूह का विरोध हर दूसरे सदस्य और मतदाता के अधिकार पर वीटो बन जाता है। संसद को सुचारु रूप से चलाने की जिम्मेदारी साझा है। कामकाज की सूची पारदर्शी ढंग से रखना, पर्याप्त समय पहले सूचना देना, विपक्ष के जायज मुद्दों के लिए स्थान देना और मंत्रियों से जवाब सुनिश्चित करना सरकार का पहला दायित्व है, लेकिन संस्थागत कामकाज में विपक्ष कोई दर्शक नहीं है। जिस मंच से वह कार्यपालिका की जांच करता है, उसे बचाए रखने की उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी उसकी भी है। सदन चलाने की जिम्मेदारी एक दल को सौंपकर दूसरा दल व्यवधान को अपनी मुख्य उपलब्धि नहीं बना सकता। संसद में जिस मंत्री से जवाब मांगा जा रहा हो, वह हर आरोप सुनकर सदन में उत्तर देने को तैयार हो, तो संसदीय मंच से इन्कार क्यों? जवाब मांगना और फिर उसे सुनने से इन्कार करना जांच नहीं, विरोधाभास है। अमित शाह के मामले में ऐसा ही हुआ।
जो विपक्ष जवाबदेही की मांग करता है, उसका मूल्यांकन उसके सवालों, विकल्पों और हस्तक्षेपों की गुणवत्ता से होना चाहिए, न कि उसके कारण हुए स्थगनों की संख्या से। उपस्थिति और भत्ते की व्यवस्था इस प्रतीकात्मक समस्या को सामने लाती है। वर्तमान दैनिक भत्ता 2,500 रुपये है और संसद की बैठक वाले दिन सदस्य इस भत्ते की पात्रता प्रक्रिया के तहत उपस्थिति रजिस्टर पर हस्ताक्षर करता है। यात्रा भत्ता एक अलग वैधानिक अधिकार है और उसे इन हस्ताक्षरों से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। 2026-27 में लोकसभा और राज्यसभा के लिए 1,491.99 करोड़ रुपये के संयुक्त आवंटन के सामने यह राशि मामूली है, पर संदेश महत्वपूर्ण है। हस्ताक्षर मौजूदगी साबित करता है, कार्य-निष्पादन नहीं।
भारत को सरकार, विपक्ष और पीठासीन अधिकारियों की सहमति से एक ‘संसदीय कार्य-निष्पादन संकल्प’ चाहिए। इसका पहला नियम सरल होना चाहिए: बिना भरपाई के कोई घंटा बर्बाद नहीं होगा। यदि व्यवधान के कारण निर्धारित काम नहीं हो पाता, तो सदन देर तक बैठे, एक अतिरिक्त दिन काम करे या उसी सत्र में उस समय की भरपाई करे। राजनीतिक असहमति कार्यसूची का क्रम बदल सकती है, लेकिन वह कुल संसदीय काम को कम नहीं कर सकती। दूसरा, विरोध के अधिकार के साथ बहस की सुनिश्चित राह भी होनी चाहिए। राजनीतिक दलों को यह संकल्प लेना चाहिए कि एक बार समय आवंटित होने पर बहस अवश्य होगी। सरकार जवाब दे, विपक्ष सुने, प्रतिवाद करे और मतदान करे। जवाबदेही संसद की दोतरफा प्रक्रिया है, टेलीविजन का एकतरफा प्रदर्शन नहीं। तीसरा, संसद को एक समान रियल-टाइम डैशबोर्ड प्रकाशित करना चाहिए। इसमें सत्यापित उपस्थिति, सदन में मौजूद रहने की अवधि, पूछे गए प्रश्न, बहस में भागीदारी, समिति का काम, गैर-सरकारी सदस्यों का कार्य, जांच के लिए भेजे गए विधेयक, गंवाया गया समय और उसकी भरपाई का ब्योरा हो। संसद, विचार-विमर्श और समाधान के लिए है, ठहराव को तात्कालिक राजनीतिक लाभ में बदलने के लिए नहीं।
(लेखक प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य हैं)











