डॉ. एके वर्मा। आज देश जटिल वैश्विक परिस्थिति में खड़ा है। तमाम आकांक्षाओं के बीच आसपड़ोस का घटनाक्रम भी कोई शुभ संकेत नहीं है। यह केवल सरकार और सत्तारूढ़ दल की नहीं, सभी राजनीतिक दलों की साझा चुनौती है। जिस प्रकार अंगुलियां छोटी-बड़ी होती हैं, परंतु शक्तिशाली मुट्ठी बनाने में सबका योगदान है, उसी प्रकार पार्टियां छोटी-बड़ी होती हैं, मगर शक्तिशाली और विकसित भारत बनाने में सभी का योगदान होगा।

देश के समक्ष तमाम चुनौतियों से निपटने में सत्तारूढ़ दल की जिम्मेदारी है कि वह विपक्षी दलों को विश्वास में ले और उनसे नियमित संवाद करे। प्रधानमंत्री मोदी ने आपरेशन सिंदूर को लेकर जिस प्रकार सभी दलों को विश्वास में लिया, वह प्रशंसनीय था। इससे प्रधानमंत्री और भारतीय लोकतंत्र दोनों का कद बढ़ा। विपक्षी दलों को भी लगा कि राष्ट्रीय संकट निवारण में उनकी भूमिका है। प्रधानमंत्री का संकल्प ‘सबका-साथ, सबका-विकास, सबका-प्रयास और सबका-विश्वास’ केवल चुनावों में ही नहीं, वरन नीति-निर्माण, गंभीर-निर्णयन और राष्ट्रीय-संकट से निपटने में भी दिखाई देना चाहिए।

कांग्रेस देश में सबसे महत्वपूर्ण विपक्षी पार्टी है। वह लंबे समय तक सत्ता में रही। उसे पता होगा कि सरकार की क्या-क्या कठिनाइयां होती हैं और विपक्ष से उसकी क्या अपेक्षाएं होती हैं? कभी देश की राजनीतिक व्यवस्था को ‘कांग्रेस सिस्टम’ कहा जाता था, लेकिन आज देश ‘भाजपा सिस्टम’ की ओर बढ़ चला है। यदि कांग्रेस को भारतीय राजनीति में प्रासंगिक बने रहना है तो उसे अपने नेतृत्व, विचारधारा, संगठन और कार्यसंस्कृति का ‘गियर’ बदलना पड़ेगा। सबसे पहले कांग्रेस को ‘गांधी-नेहरू सिंड्रोम’ से बाहर निकलना पड़ेगा।

कांग्रेस को क्यों लगता है कि बिना ‘गांधी’ के उसकी नैया डूब जाएगी? मनमोहन सरकार के ऊपर क्यों ‘एक गांधी’ की जरूरत थी? मल्लिकार्जुन खरगे के कांग्रेस अध्यक्ष होने के बावजूद उन्हें ‘गांधी आलाकमान’ की क्यों जरूरत है? कांग्रेस में अनेक नेता नेतृत्व के योग्य हैं, परंतु आजादी के सात दशक बीत जाने पर भी पार्टी क्यों गांधी पर निर्भर रहना चाहती है? ‘गांधी’ एक उपनाम है जो महात्मा गांधी ने इंदिरा गांधी के पति फिरोज को दिया था। ‘गांधी’ उपनाम न तो मजहब बदल सकता है, न कोई जाति दे सकता है।

आज विचारधारा के स्तर पर भी कांग्रेस दिशाहीन हो गई है। जिस पार्टी ने स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया हो, क्यों आज उसके नेता विदेश जाकर भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं? अधिकांश विपक्षी नेता सार्थक, तर्कपूर्ण एवं रचनात्मक आलोचना की जगह आरोप, आक्षेप, कटाक्ष और अमर्यादित आचरण से अपनी और अपनी पार्टियों की छवि ही धूमिल करते हैं।

संगठन के स्तर पर भी कांग्रेस बहुत लचर स्थिति में है। जिन राज्यों में कांग्रेस की राजनीतिक जमीन बची भी है, वहां संगठन की वजह से नहीं, वरन गैर-कांग्रेस दल से जनता की नाराजगी के कारण बची है। कांग्रेस में सामान्य कार्यकर्ता की मेहनत का कोई अर्थ नहीं, क्योंकि प्रत्येक निर्णय आलाकमान या प्रथम परिवार से निर्धारित होता है। तब कार्यकर्ता मेहनत करे क्यों? इसका ही परिणाम है कि कांग्रेस संगठन केवल कागजों में ही है।

इसी आलाकमान संस्कृति ने पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र नष्ट और कार्यसंस्कृति को दूषित कर दिया, जिससे लोहिया, जयप्रकाश नारायण, आचार्य कृपलानी द्वारा एक समय कांग्रेस छोड़ने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह मोरारजी देसाई, चौधरी चरणसिंह, चंद्रशेखर, जगजीवन राम, शरद पवार, ममता बनर्जी से होते हुए गुलाम नबी आजाद, ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, जगन मोहन रेड्डी जैसे नेताओं तक चला और चल रहा है। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि गांधी परिवार में ऐसी कौन सी अदृश्य शक्ति है कि कांग्रेस उसके नियंत्रण से बाहर नहीं निकल पाती?

कमोबेश कांग्रेस सरीखी स्थिति ही उत्तर प्रदेश में मायावती की बसपा, अखिलेश की सपा, बिहार में लालू के राजद, आंध्र में जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर-कांग्रेस, तमिलनाडु में एमके स्टालिन की द्रमुक, बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस आदि की है। बसपा कभी राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी पार्टी थी, आज मायावती की कार्यसंस्कृति से वह अप्रासंगिक हो रही है। अखिलेश द्वारा जातिवादी अस्मिता की राजनीति करने तथा समाजवादी विचारधारा और समावेशी राजनीति न समझने से सपा कभी कांग्रेस, कभी बसपा तो कभी छोटे एवं सीमांत दलों से गठबंधन करती रही है।

बिहार में राजद सरकार की आपराधिक कार्यसंस्कृति पार्टी नेता तेजस्वी यादव के गले की हड्डी बन गई है। जगन ने आंध्र में अपनी पार्टी-संगठन को दरकिनार कर वैयक्तिक-संगठनात्मक व्यवस्था बनाई और स्वयं को एक फरिश्ते के रूप में प्रोजेक्ट किया, जिसका दुष्परिणाम सामने है। तमिलनाडु में जब मुख्यमंत्री स्टालिन तमिल अस्मिता और हिंदी विरोध की राजनीति कर रहे हैं, तब प्रधानमंत्री मोदी वाराणसी में काशी-तमिल संगमम द्वारा उत्तर-दक्षिण को एकता के सूत्र में पिरो रहे हैं। ममता बनर्जी जिस तरह बंगाली अस्मिता की आड़ में बांग्लादेशी और रोहिंग्याओं को संरक्षण दे रही हैं, वह उन्हें सत्ता सुख तो दे सकता है, पर यह बंगाल और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती है।

राजनीतिक दलों को समझना होगा कि लोकतांत्रिक राजनीति और संघीय व्यवस्था का आनंद वे तभी तक उठा सकते हैं, जब तक देश की संप्रभुता, सुरक्षा और संपन्नता अक्षुण्ण है। देश में केंद्र, राज्यों और तमाम स्थानीय सरकारें इन्हीं दलों को चलानी हैं। अतः उन्हें अकुलाने की जरूरत नहीं। भारत की जनता राजनीतिक दलों और सरकारों की नीतियों-निर्णयों से सहमत-असहमत हो सकती है, मगर देश के प्रति दुर्भावना, लोकतंत्र के प्रति दुष्प्रचार और भारतीय संस्कृति के प्रतिकूल आचार-विचार और व्यवहार वालों को क्षमा नहीं करती। इसकी उपेक्षा कर यदि राजनीतिक दल अपनी दिशा नहीं बदलते तो कोई उन्हें दुर्दशा से नहीं बचा सकता।

(लेखक सेंटर फार द स्टडी आफ सोसायटी एंड पालिटिक्स के निदेशक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)