लावण्या शिवशंकर। बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली में भगवान बुद्ध से संबंधित पिपरहवा पवित्र अवशेषों की प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेष केवल कलाकृतियां नहीं हैं। ये हमारी विरासत एवं सभ्यता का अभिन्न हिस्सा हैं और भारत इसका संरक्षक है। पिपरहवा अवशेषों को एक सदी से अधिक समय बाद देश वापस लाया गया है। भारत लाए जाने के बाद इन अवशेषों को रूस के काल्मिकिया क्षेत्र में ले जाया गया, जहां 1.5 लाख से अधिक भक्तों ने उनका अवलोकन किया। इसके अलावा उन्हें भूटान, वियतनाम, कंबोडिया, थाईलैंड भी ले जाया गया।

भारत से निकले असंख्य ज्ञानी भिक्षुओं के कारण बौद्ध धर्म दुनिया के अनेक देशों में प्रचलित और स्वीकार्य है। चूंकि दक्षिण पूर्वी एशिया में शासक आपसी संवाद में बौद्ध धर्म को बहुत महत्व देते थे, इसलिए विश्व सुलह और शांति के लिए बौद्ध धर्म का उपयोग स्वाभाविक है। वर्तमान एशिया में लगभग 45 करोड़ बौद्ध रहते हैं, जिसकी वजह से बौद्ध धर्म एक साफ्ट पावर है। भारत से ही बौद्ध धर्मावलंबी तिब्बत, चीन, जापान, कोरिया, श्रीलंका, थाईलैंड, लाओस और वियतनाम आदि गए। बौद्ध धर्म पर आधारित कूटनीति चलाना भारत के लिए नई बात नहीं है। मनमोहन सरकार ने नालंदा विश्वविद्यालय की नींव रखी थी। इस विश्वविद्यालय का एक उद्देश्य शास्त्रीय भाषा पाली का प्रचार-प्रसार करना और एशिया से छात्रों और शोधकर्ताओं को भारत आकर्षित करना भी है। बौद्ध धर्म का कूटनीतिक उपयोग मोदी सरकार का एक अंग बन गया है। इस संदर्भ में यह ठीक ही कहा गया है कि कि मोदी सरकार की नीति है-हिंदू संस्कृति, बौद्ध विरासत।

पिपरहवा अवशेषों की कहानी भी दिलचस्प है। 1898 में अमूल्य रत्न उत्तर प्रदेश के पिपरहवा में अंग्रेज जमींदार विलियम पेप को मौर्यकालीन स्तूप की खोदाई में मिले। उनके साथ कुछ अस्थि-अवशेष एक कलश में पाए गए, जिस पर प्राचीन ब्राह्मी में उत्कीर्ण था कि स्वयं भगवान बुद्ध के शाक्य कुल के सदस्यों ने इसे यहां रखा है। अंग्रेजों ने कुछ रत्न श्याम (प्राचीन थाईलैंड) के बौद्ध नरेश को उपहार में दिए, कुछ श्रीलंका और म्यांमार के बौद्ध मंदिरों में भेजे और एक हिस्सा कोलकाता के संग्रहालय में रखा और करीब 334 रत्नाभूषण जमींदार पेप ने अपने पास रखे। इन्हें बीते साल उनके वंशजों ने एक नीलामी घर सूथबीज को बोली लगाने के लिए सौंप दिया। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने सूथबीज को नोटिस भेज नीलामी रुकवाई और गोदरेज समूह ने इस अमूल्य धरोहर को भारत लाने में आर्थिक योगदान दिया, पर हर देश ऐसा नहीं कर पाता।

कोरियाई युद्ध के बाद हजारों-हजार बौद्ध पुरावशेष चोर बाजार में हाथों-हाथ बिके। कोरिया में बौद्ध धर्म का सबसे तेजी से ह्रास हुआ है, पर अपने आसपास के बौद्ध देशों से मैत्रीपूर्ण संबंध रखने के लिए बड़े पैमाने पर वहां बौद्ध गोष्ठियां होती हैं। कभी चोल साम्राज्य और तदनंतर भारतीय सांस्कृतिक प्रभाव में रहे दक्षिण-पूर्वी एशिया देशों की हमने उपेक्षा की। इसका फायदा पहले पश्चिमी देशों और फिर चीन ने उठाया। 2000 में मीकांग-गंगा कोआपरेशन के तहत भारत ने पांच आसियान देशों कंबोडिया, लाओस, म्यांमार, थाईलैंड और वियतनाम के पर्यटन, संस्कृति, शिक्षा के साथ-साथ परिवहन और संचार क्षेत्र में सहयोग की पहल की।

आज ब्रिटेन, जर्मनी और अमेरिका में कई संसाधनसंपन्न विश्वविद्यालय बौद्ध धर्म और पाली के पठन-पाठन के माध्यम से अपने राजनीतिक हित पूरे कर रहे हैं। इससे बौद्ध धर्म के अध्ययन में अप्रासंगिक त्रुटियां घर कर जाने का खतरा है, जो चिंताजनक है। हमें यह समझना चाहिए कि दक्षिण-पूर्वी एशिया में बौद्ध धर्म पालन और संरक्षण में हमारी स्वाभाविक और निर्णायक भूमिका है। हम इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान की गांधार सभ्यता और उसकी शैव और बौद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत भारत की है।

अपने बौद्ध स्थलों का हवाला देते हुए कुछ समय पहले पाकिस्तानी राजदूत नबील मुनीर ने कहा था कि बौद्ध धर्म पाकिस्तान से कोरिया गया और वहां प्रचलित महायान बौद्ध धर्म का उद्भव भी पाकिस्तान में ही हुआ। भारत अगर पाकिस्तान की ऐसी कुटिलता का प्रत्युत्तर नहीं देगा और बौद्ध धर्म को हिंदू धर्म नामक वृक्ष की ही एक डाली नहीं कहेगा, तो पाकिस्तान हमारी अनमोल विरासत को हथिया सकता है। बौद्ध धर्म का सर्वेसर्वा बनने के लिए चीन भी हाथ-पांव मार रहा है। दरअसल जब भारत अपना भविष्य यूरोप और अमेरिका में देख रहा था, तब बौद्ध धर्म के सहारे चीन एशिया में अपने पांव जमा रहा था।

भारत को आज ज्यादा से ज्यादा मित्र राष्ट्रों की आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति में बौद्ध धर्म पर आधारित कूटनीति बहुत कारगर हो सकती है। इसका भरपूर उपयोग किया जाना चाहिए, ताकि हम वैश्विक स्तर पर बौद्ध धर्म से प्रभावित जनता की सद्भावना आकर्षित कर सकें। भारत का अपनी बौद्ध विरासत पर नियंत्रण रखना और स्वयं को उसका पोषक दिखाना आवश्यक हो चुका है। आज विश्व दो धुरियों में विभाजित है। एक अमेरिका और दूसरा चीन के नेतृत्व में। सर्वस्वीकार्य तीसरा ध्रुव बनने के लिए हमें हिंदुत्व और बौद्ध धर्म का समान प्रतिनिधित्व करना होगा। हमें अपने विमर्श और आख्यान का नियंत्रण अपने हाथ में लेना होगा।

(लेखिका रिसर्च स्कॉलर हैं)