किरेन रिजिजू। हमारे राजनीतिक समुदाय के कुछ हिस्सों में लोकतांत्रिक चिंता के नाम पर अब एक अजीब तरीका अपनाया जा रहा है-संसद में बाधा डालना, प्रश्नकाल न होने देना, मंत्रियों की बात न सुनना, बहस के प्रस्तावों को ठुकराना और फिर लेख लिखकर अफसोस जताना कि संसद में बहस नहीं हो रही है। यह बहस वाले कमरे में आग लगाने और फिर धुएं पर शोक-गीत लिखने जैसा है। संसद बहस के लिए है, राजनीतिक ब्लैकमेल के लिए नहीं।

आलोचकों ने मानसून सत्र के आंकड़ों का बार-बार जिक्र किया है। लोकसभा अपने निर्धारित समय की तुलना में 15 प्रतिशत और राज्यसभा 33 प्रतिशत ही चल पाई, लेकिन इन आंकड़ों को उनके कारणों से अलग नहीं किया जा सकता। सत्र के दौरान बार-बार बाधाएं आईं और कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी, कई बार लोकसभा की बैठक कुछ ही मिनटों तक चली और फिर उसे स्थगित करना पड़ा। विपक्ष की रणनीति पहले यह पक्का करना था कि संसद न चल पाए और फिर समय की बर्बादी को सरकार के खिलाफ सुबूत के तौर पर इस्तेमाल करना।

संविधान विपक्ष को सरकार से सवाल पूछने, आलोचना करने, विरोध करने, संशोधन लाने और सरकार के खिलाफ वोट करने का पूरा अधिकार देता है, लेकिन यह विपक्ष को कोई ऐसा रिमोट कंट्रोल नहीं देता, जिससे वह संसद को बंद कर दे, यदि उसकी राजनीतिक मांगें स्वीकार नहीं की जाती हैं। सरकार ऐसा बिल्कुल नहीं करेगी कि लोगों से मिले जनादेश को उस विपक्ष के सामने समर्पित कर दे, जो संसद का कामकाज ठप करता है और फिर उसी ठप कामकाज को तानाशाही का सुबूत बताता है। लोकतंत्र विपक्ष को अपनी बात कहने का मौका देता है, लेकिन वीटो का अधिकार नहीं देता। सरकार को लोगों से जनादेश सिर्फ सत्ता संभालने के लिए नहीं, बल्कि शासन चलाने के लिए मिला है। इस जनादेश के साथ संवैधानिक जिम्मेदारी भी जुड़ी है, जैसे कानून पेश करना, नीतियां लागू करना और यह सुनिश्चित करना कि देश का कामकाज चलता रहे।

विपक्ष के मौजूदा अभियान के खोखलेपन को उसकी अपनी प्रतिक्रिया से बेहतर और कोई अन्य चीज उजागर नहीं करती। जंतर-मंतर पर हो रहे विरोध-प्रदर्शन पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में विस्तृत चर्चा का प्रस्ताव रखा। उन्होंने दोपहर बाद तीन बजे से लेकर अगले दिन तीन बजे तक चर्चा का प्रस्ताव रखा और उठाए गए सवालों का जवाब देने का भी वादा किया। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और कहा कि विपक्ष को गृह मंत्री अमित शाह के 'भाषण' (लेक्चर) में कोई दिलचस्पी नहीं है। विपक्ष संसद में पूरी चर्चा से इन्कार करने के बाद यह शिकायत नहीं कर सकता कि संसद की आवाज दबा दी गई।

कोई जवाब की कैसे मांग कर सकता है, जब वह उस मंच को ही नकार दे, जिस पर जवाब दिए जाने हैं। जो नेता 24 घंटे की बहस से इन्कार करता है, उसे यह शिकायत करने का हक नहीं कि उसे बोलने के लिए 24 मिनट नहीं दिए गए। राहुल गांधी के संसदीय रिकार्ड को देखें। 17वीं लोकसभा के दौरान उनकी उपस्थिति सिर्फ 51 प्रतिशत रही, उन्होंने 46.7 के राष्ट्रीय औसत के मुकाबले केवल आठ बहसों में हिस्सा लिया, 210 के औसत के मुकाबले केवल 99 सवाल पूछे और कोई 'निजी विधेयक' पेश नहीं किया। फिर भी वे कहते हैं कि सरकार ने 'लोकतंत्र को खत्म कर दिया है।' वे यूके, जर्मनी और अमेरिका जाते हैं और भारत में लोकतंत्र की कमी की शिकायत करते हैं, लेकिन उनमें संसद आकर जवाबदेही तय करने की हिम्मत नहीं है। सारी बहादुरी सिर्फ कैमरों और विदेशी दर्शकों के सामने ही दिखाई देती है।

जब ‘विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक’ को लेकर चिंताएं जताई गईं, तो सरकार ने इसे संख्याबल पर पारित नहीं कराया। सरकार ने विधेयक पर विस्तार से चर्चा के लिए संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा। हैरानी की बात है कि ज्यादा जांच-पड़ताल की मांग करने के बाद विपक्ष के कुछ हिस्सों ने जेपीसी के पास भेजने का भी विरोध किया और मांग की कि विधेयक को पूरी तरह वापस ले लिया जाना चाहिए। इससे असली समस्या का पता चलता है। बहस को तब तक बेकार माना जाता है, जब तक मंत्री पहले से ही विपक्ष की बातों को स्वीकार न कर लें। यह बातचीत नहीं है। यह एक चेतावनी है।

लोकसभा में 'सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक' पर लगभग 11 घंटे तक बहस हुई, जिसमें 48 सांसदों ने हिस्सा लिया। राज्यसभा में इस पर साढ़े छह घंटे से ज्यादा चर्चा हुई, जिसमें 35 सदस्यों ने भाग लिया। संशोधित कानून में सजा को सख्त किया गया, विशेष फास्ट-ट्रैक कोर्ट और विशेष सरकारी वकील का प्रविधान किया गया, जांच और मुकदमों के लिए समयसीमा तय की गई और सरकार को परीक्षा में संगठित धोखाधड़ी के खिलाफ एक स्पेशल टास्क फोर्स बनाने का अधिकार दिया गया। यह ऐसा कानून नहीं था, जिसे 'जबरदस्ती थोपा' गया हो।

संसद ने ठीक वैसे ही किया, जैसा उसे करना चाहिए: जनता की चिंताओं को सदन में उठाया गया, सांसदों ने उस पर बहस की, सरकार ने जवाब दिया और कानूनी व्यवस्था मजबूत की गई। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के क्रम पर गौर करें: एक विरोध प्रदर्शन हुआ, नागरिक समाज की चिंताओं को सुना गया, केंद्रीय मंत्रियों ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत की, लिखित आश्वासन दिए, प्रधानमंत्री ने जवाब दिया, संसद में व्यापक बहस हुई तथा कानून को और मजबूत किया गया। बातचीत और जवाबदेही की इससे ज्यादा लोकतांत्रिक प्रक्रिया की कल्पना करना मुश्किल है। सरकार ने बातचीत करने से मना नहीं किया।

संसद न तो सरकार की है और न ही विपक्ष की। यह भारत के लोगों की है। लोगों ने जो जनादेश दिया है, वह कोई सजावटी प्रमाणपत्र नहीं है, जिसे तब रद कर दिया जाए, जब विपक्षी पार्टियां बहस के बजाय हंगामा करने का विकल्प चुनती हैं। सदन के बाहर लगाए गए नारे, सदन के भीतर की तर्क-प्रस्तुति की जगह नहीं ले सकते। नुक्कड़ नाटक संसदीय जिम्मेदारी की जगह नहीं ले सकते। जो लोग बहस या वोट के जरिये सरकार को पराजित नहीं कर सकते, उन्हें शोर-शराबे के जरिये संसद को हराने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

(लेखक संसदीय कार्यमंत्री हैं)