विचार: प्रकृति की अनदेखी के दुष्परिणाम
सीमावर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण देना और उन्हें पूर्व-चेतावनी नेटवर्क से जोड़ना अत्यंत आवश्यक है।
HighLights
अनियोजित विकास, वनों की कटाई नेपाल बाढ़-भूस्खलन के प्रमुख कारण।
जलवायु परिवर्तन, अतिवृष्टि, ग्लेशियर पिघलना बढ़ा रहे हिमालयी आपदाएं।
पूर्व-चेतावनी प्रणाली, हरित विकास आपदा जोखिम कम करने हेतु महत्वपूर्ण।
डॉ. दीपक कोहली। नेपाल में आई विनाशकारी आकस्मिक बाढ़ और भूस्खलन ने एक बार फिर पूरे दक्षिण एशिया को झकझोर कर रख दिया है। हिमालय की गोद में बसी यह शांत और सुंदर भूमि जिस तरह प्राकृतिक तबाही का केंद्र बनी है, वह केवल एक भौगोलिक दुर्घटना नहीं, बल्कि प्रकृति के बढ़ते रोष और इंसानी बेपरवाही का एक भयावह प्रतीक है। उफनती नदियां, जलमग्न शहर, ताश के पत्तों की तरह बहते पक्के पुल और मलबे के नीचे दबे गांव के गांव केवल नेपाल की आपदा के दृश्य नहीं हैं, बल्कि यह पूरे क्षेत्र के लिए एक ऐसी चेतावनी है, जिसे अब और नजरअंदाज करना आत्मघाती साबित होगा। इस त्रासदी के लिए केवल प्रकृति के मिजाज को जिम्मेदार ठहराना समस्या की गहराई से मुंह मोड़ना होगा। इसके पीछे अनियोजित विकास, पहाड़ों का अविवेकपूर्ण दोहन और जलवायु परिवर्तन जैसे इंसानी कारण बहुत ही गहराई से जुड़े हुए हैं।
पिछले कुछ दशकों में नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों और काठमांडू घाटी में जिस तरह अनियंत्रित और बेतरतीब निर्माण कार्य हुआ है, उसने प्राकृतिक जल निकासी की व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों और बाढ़ के मैदानों में बहुमंजिला इमारतों, सड़कों और व्यावसायिक परिसरों का निर्माण कर लिया गया। जब नदियों के पास बहने के लिए स्वाभाविक जगह ही नहीं बची तो पानी ने आबादी वाले इलाकों का रुख किया। इसके साथ ही सड़कों के संजाल को फैलाने और रन-आफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाओं को खड़ा करने के नाम पर पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई की गई।
भारी डायनामाइट विस्फोटों ने संवेदनशील ढलानों की आंतरिक दरारों को और चौड़ा कर दिया है, जिससे वे मामूली बारिश में भी खिसकने लगी हैं। ढलानों से जंगलों की कटाई ने मृदा अपरदन की दर को कई गुना बढ़ा दिया है। पेड़ों की जड़ें जो मिट्टी को बांधकर रखती थीं, उनके गायब होने से बारिश का पानी सीधे सतह पर प्रचंड वेग से बहने लगता है। इसके ऊपर वैश्विक स्तर पर हो रहे जलवायु परिवर्तन का असर अब अत्यंत प्रत्यक्ष और घातक रूप में सामने आ रहा है।
हिंदूकुश हिमालयी क्षेत्र वैश्विक औसत की तुलना में अधिक तेजी से गर्म हो रहा है। तापमान में लगातार वृद्धि के कारण मानसून का चक्र पूरी तरह से अनिश्चित हो चुका है। अब बारिश का फैलाव पूरे मौसम में समान रूप से होने के बजाय कुछ ही दिनों या घंटों की अतिवृष्टि में सिमट गया है। जब अत्यधिक मात्रा में पानी एक साथ गिरता है तो जमीन उसे सोखने में असमर्थ हो जाती है और वह सतह पर प्रचंड बाढ़ का रूप ले लेता है।
इसके साथ ही हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों के तेजी से लगातार पिघलने के कारण नई ग्लेशियल झीलों का निर्माण हो रहा है और पुरानी झीलों का आकार खतरनाक रूप से बढ़ रहा है। भूकंप या अत्यधिक जल-दबाव के कारण लाखों क्यूसेक पानी और मलबा कुछ ही मिनटों में नीचे घाटी की ओर बहता है, जिसकी विनाशकारी क्षमता सामान्य बाढ़ से कई गुना अधिक होती है।
नेपाल की त्रासदी को केवल एक आपदा के रूप में न देखकर एक सामरिक, वैज्ञानिक और मानवीय चुनौती के रूप में देखा जाए। पारंपरिक रूप से हमारा ध्यान केवल आपदा के बाद राहत और बचाव कार्य तक सीमित रहता है। इस प्रतिक्रियात्मक रवैये को बदलकर आपदा जोखिम न्यूनीकरण की दिशा में काम करना होगा। सबसे पहली आवश्यकता एक प्रभावी, आधुनिक और रियल-टाइम पूर्व-चेतावनी प्रणाली को विकसित करने की है।
यदि निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को बाढ़ आने से कुछ घंटे पहले भी सटीक सूचना मिल जाए तो जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। दूसरा महत्वपूर्ण कदम भारत और नेपाल के बीच जल प्रबंधन को लेकर दशकों पुराने समझौतों और ठप पड़ी वार्ताओं को पुनर्जीवित करना है। कोसी और गंडक परियोजनाओं पर नए सिरे से ध्यान देना होगा। केवल बुनियादी ढांचा खड़ा करना ही काफी नहीं है, बल्कि उस ढांचे का नियमित रखरखाव, नदियों से गाद निकालने की निरंतर प्रक्रिया और जल भंडारण क्षमता में वृद्धि के लिए आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल जरूरी है।
अब पूरे हिमालयी क्षेत्र में विकास की अवधारणा को फिर से परिभाषित करने की सख्त जरूरत है। पहाड़ों में बुनियादी ढांचे का विकास पारिस्थितिकी की कीमत पर नहीं होना चाहिए। सड़कों के निर्माण में भारी विस्फोटकों के बजाय हरित निर्माण तकनीकों का प्रयोग होना चाहिए। नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में अतिक्रमण को सख्ती से रोकते हुए नो-कंस्ट्रक्शन जोन घोषित किया जाना चाहिए। जब तक पहाड़ों की हरियाली और उसकी मिट्टी की पकड़ मजबूत नहीं होगी, तब तक भूस्खलन और मलबे के साथ आने वाली बाढ़ को नहीं रोका जा सकता।
ग्लेशियल झीलों के खतरे से निपटने के लिए आधुनिक उपग्रह निगरानी प्रणालियों का उपयोग कर नियमित मैपिंग की जानी चाहिए और खतरनाक झीलों से साइफनिंग तकनीक द्वारा पानी को नियंत्रित रूप से बाहर निकालकर उनके जलस्तर को सुरक्षित सीमा में रखा जाना चाहिए। सीमावर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण देना और उन्हें पूर्व-चेतावनी नेटवर्क से जोड़ना अत्यंत आवश्यक है। जब तक विज्ञान, नीति-निर्माण और पर्यावरणीय संवेदनशीलता का सही समन्वय नहीं होगा, तब तक हम इस प्राकृतिक और मानवजनित आपदा के भंवर से बाहर नहीं निकल पाएंगे।
(लेखक पर्यावरण मामलों के विशेषज्ञ एवं वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी हैं)
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