शंकर शरण। राहुल गांधी ने जब भारत की 'सत्तर करोड़ स्त्रियों' की बात की, तो वे मुस्लिम स्त्रियों को भूल गए। इन पर मुस्लिम समाज के मजहबी नेता इस्लामी पर्सनल ला लागू करते हैं। राहुल को हिंदू स्त्रियां हीनता में दिखीं, जिसका कारण उन्होंने 'मनुस्मृति' को बताया, जबकि मनुस्मृति से भारतीय संविधान या कानून का एक भी अनुच्छेद प्रभावित नहीं है। हालांकि उसी मनुस्मृति से प्रेरणा लेकर स्वामी दयानंद और विवेकानंद जैसे अनेक महापुरुषों ने समाज सुधार के ऐतिहासिक काम किए। इसका उल्लेख उनके लेखन, व्याख्यानों और सामाजिक विरासत में मिलता है। निश्चित ही राहुल गांधी ने मनुस्मृति नहीं पढ़ी लगती है, जिसमें स्त्रियों का आदर करना दैवीय शिक्षा जैसा है। उन्हें अधकचरे वामपंथी सलाहकारों ने गलत पट्टी पढ़ा दी। जिससे वे हवा में तीर चलाने लगे।

हिंदू स्त्रियां न अभी, न पहले उस हाल में थीं, जैसा वे समझ रहे हैं। जबकि वास्तविक पीड़ितों और पीड़ित करने वाले मौजूद कायदों से राहुल अनजान लगते हैं। भारत में 1978 में शाहबानो से लेकर 2016 में सायरा बानो तक पीड़ित मुस्लिम स्त्रियों को अदालत से गुहार लगानी पड़ी, ताकि वे उन पर लादी गई जुल्मी मजहबी प्रथाओं से राहत पा सकें। इन प्रथाओं के तहत मुस्लिम पुरुष जब जी आए, सरसरी तलाक देते हैं और तलाकशुदा बीवी को उसके हाल पर छोड़ देते हैं। इनका स्रोत इस्लामी कायदे हैं। हर मौलाना उसे सही ठहराने या सफाई देने में अपनी मूल किताबों का ही हवाला देते हैं। राहुल गांधी कभी वह किताब उद्धृत करेंगे, जो स्त्रियों को पुरुषों की संपत्ति और भोग वस्तु से अधिक शायद ही कुछ और मानती है।

शाहबानो से लेकर अभी तक जितने मामले चर्चित हुए, सबमें यही समानता थी कि मुस्लिम स्त्री की अपनी इच्छा या मान-सम्मान गायब था। प्रत्येक स्त्री शौहर या उलेमा द्वारा संपत्ति के टुकड़े की तरह तय की गई। इस्लामी निकाह के केंद्र में पुरुष है। उसके शारीरिक सुख, भोग तथा उम्मा की संख्या-वृद्धि के सिवा कोई अन्य भाव, आध्यात्मिक तत्व वहां नहीं मिलता। मनमाना अधिकार मुस्लिम पुरुषों को जहां से मिल रहा है, उसका स्रोत कुरान, हदीसें और उन पर आधारित शरीयत कानून हैं। इसलिए हैरत है कि राहुल को मुस्लिम स्त्रियों का हाल मालूम नहीं।

वे हिंदू ग्रंथ पर शेर बन रहे हैं, जिसका आज जीवन से कोई संबंध नहीं। वह मात्र अकादमिक दिलचस्पी की पुस्तक है। जबकि जिस किताब से करोड़ों मुस्लिमों का जीवन-मरण, शिक्षा-संस्कार और निजी कानून भी चल रहा है, उस पर राहुल मौन हैं, जिसकी शिकायत खुद मुस्लिम स्त्रियों ने बार-बार की और जो लिखित दस्तावेजों में सबके सामने है। राहुल भी उसे परख सकते हैं। तब वे देख सकेंगे कि किसी भी मुस्लिम देश में स्त्रियों की स्थिति हिंदू स्त्रियों जितनी सम्मानित या उन्नत नहीं है। इसका कारण यहां की मानवीय मान्यताएं एवं तदनुरूप सेक्युलर संविधान है, जिससे स्त्री पुरुष, बिना भेदभाव के समान रूप से अधिकार रखते हैं।

हिंदू और मुस्लिम स्त्रियों की कानूनी और सामाजिक हालत की तुलना करने पर भी राहुल सच्चाई देख सकेंगे। इसमें एक का उल्लेख भीमराव आंबेडकर ने भी किया है। उन्होंने लिखा है कि 1939 तक भारत में जब कोई विवाहित मुस्लिम महिला इस्लाम छोड़ देती थी, तो उसका विवाह स्वतः भंग हो जाता था और ‘वह अपने नए धर्म के किसी भी पुरुष से विवाह करने के लिए स्वतंत्र हो जाती थी। साठ वर्ष तक भारत की सभी अदालतों में इस कानून का दृढ़तापूर्वक पालन किया गया।’ तब किसी मुस्लिम स्त्री का इस्लाम छोड़कर हिंदू बनना भी स्वीकृत था, मगर मौलानाओं ने अधिकाधिक इस्लाम लागू करने के लिए दबाव देकर 1937 में शरीयत एक्ट बनवाया और 1939 में मुस्लिम मैरिज एक्ट को खत्म कराया। वह शरीयत एक्ट अभी भी भारत में लागू है। इसलिए मुस्लिम स्त्रियों पर लागू तीन तलाक, एक पुरुष के लिए एक समय चार बीवियों और हलाला जैसी अन्यायी प्रथाओं का स्रोत उनकी किताब में ही है। उनके विरुद्ध खुद मुस्लिम स्त्रियां लड़ती रही हैं।

इस्लाम की दुनिया पूरी तरह पुरुषों की है, जिसमें स्त्रियों की जगह साफ तौर से बहुत नीचे है। क्या राहुल को इस पर नहीं बोलना चाहिए था? उन्हें तो उस किताब को उद्धृत करना चाहिए, जिसमें औरतों को मर्दों की खेतियां बताया गया है। बीवियों के अलावा 'लौंडियां' भी अतिरिक्त भोग्या हैं। हदीसें भी इसी तरह के आदेश दोहराती हैं। मानो स्त्री एक संपत्ति भर हो, जिसे इच्छानुसार लाया, बांटा, छोड़ा जा सकता है। एक हदीस के अनुसार, अपनी इच्छा से शादी करने वाली स्त्री बदचलन है। अन्य हदीस के अनुसार, बिना संरक्षक के किसी स्त्री की शादी अवैध, अमान्य है। ऐसे अनगिनत व्यवहार आज भी मुस्लिमों के लिए कानून हैं। दुनिया भर के मौलाना यही मानते हैं और जितनी उनकी ताकत हो, उसे लागू करते रहते हैं। अफगानिस्तान या ईरान इसके मौजूदा उदाहरण हैं। मुस्लिम स्त्रियों की दुर्गति में केवल मनमाना तलाक ही नहीं। हलाला, बहुपत्नी प्रथा, मुताह, स्त्री-खतना आदि सब जबरिया और एकतरफा हैं। मुस्लिम स्त्रियों पर आतंक का स्थायी साया रहता है, क्योंकि उनके समाज में मनमाना तलाक किसी शिकायत का मामला ही नहीं है।

भारत जैसे उदार देश में संविधान के स्पष्ट निर्देश के बावजूद अभी तक समान नागरिक कानून नहीं बना, क्योंकि उलेमा विरोध करते हैं। समान कानून के लिए तसलीमा नसरीन बार-बार आग्रह करती रही हैं। वे ठीक यही सवाल उठाती हैं कि क्या मनुष्य के लिए उसका विवेक बेहतर सत्ता है या कोई किताब? क्या राहुल को तसलीमा या तहमीना दुर्रानी, वफा सुलतान, यासमीन मोहम्मद, अय्यान हिरसी अली आदि किसी मुस्लिम विदुषी की आवाज सुनाई नहीं पड़ी? आज जब स्वयं मुस्लिम स्त्रियां मानवीय न्याय और समान अधिकारों के लिए खड़ी हो रही हैं, तो राहुल को उनके समर्थन में आवाज उठानी चाहिए। इसके बदले वे हिंदू स्त्रियों पर तरस खा रहे हैं, जो बेवजह, बेवक्त मर्सिया पढ़ने जैसा है। जिस घर में वास्तविक पीड़ा है, वहां जाने के बदले वे खुशहाल घर जाकर चीख-पुकार कर रहे हैं। इससे किसी का भला नहीं होगा।

(लेखक राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)