राजीव सचान। आरक्षण एक ऐसी व्यवस्था है, जिससे असहमत लोग तो उसके विरोध में खड़े ही होते रहते हैं। जो सहमत हैं और आरक्षण के दायरे में आते हैं, उन्हें भी उससे कई तरह की शिकायतें हैं। एक शिकायत यह है कि सरकारें उसे सही तरह लागू नहीं कर रही हैं और इसी कारण आरक्षित पद रिक्त बने रहते हैं। उनकी यह भी शिकायत है कि योग्य अभ्यर्थी नहीं मिले यानी 'नाट फाउंड सुटेबल' का हवाला देकर आरक्षित वर्गों के अभ्यर्थियों को किनारे कर दिया जाता है और इस तरह एनएफएस के चलते तमाम पद अगली भर्तियों के लिए सुरक्षित रख लिए जाते हैं। इसी कारण सरकारी नौकरियों में बैकलाग बढ़ता रहता है।

आरक्षित वर्गों की शिकायत यह भी है कि आरक्षण लागू होने के बाद भी एससी-एसटी और ओबीसी वर्गों को सरकारी नौकरियों में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है। आरक्षित वर्ग में आने वाले सामाजिक और शैक्षणिक रूप से कहीं अधिक पिछड़े-निर्धन तबकों को यह शिकायत है कि आरक्षण का अधिकतम लाभ एससी-एसटी-ओबीसी की अपेक्षाकृत समर्थ जातियां उठा रही हैं। इसी कारण वे आरक्षण के अंदर आरक्षण की मांग कर रही हैं। आरक्षण के अंदर आरक्षण की सुविधा ओबीसी आरक्षण में पहले से है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एससी-एसटी आरक्षण में भी कोटे के अंदर कोटा दिया जा सकता है, लेकिन एक-दो राज्यों को छोड़कर अन्य राज्य इसके बाद भी आगे नहीं बढ़ रहे हैं कि आरक्षण के लाभ से वंचित जातियां इसकी मांग कर रही हैं।

इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता कि एससी-एसटी के साथ ओबीसी में कई जातियां ऐसी हैं, जो आरक्षण का लाभ नहीं उठा पा रही हैं। इसके बाद भी राज्य सरकारें एससी-एसटी आरक्षण में कोटे के अंदर कोटे की व्यवस्था करने से बच रही हैं। वे इससे भी अनजान नहीं हो सकतीं कि अति पिछड़े वर्ग की कई जातियां इसलिए एससी या एसटी दर्जे में आने की मांग करती रहती हैं, क्योंकि वे ओबीसी आरक्षण का लाभ उठा पाने में नाकाम हैं। आरक्षण का वर्गीकरण पिछड़ी जातियों के हित में है, लेकिन राजनीतिक कारणों से इस पर अमल नहीं हो रहा है। आरक्षण से असंतोष 10 प्रतिशत आरक्षण का लाभ उठा रहे सामान्य वर्ग के निर्धन तबके को भी है। उनका सवाल है कि उन्हें एससी-एसटी-ओबीसी की तरह फीस में छूट और मुफ्त कोचिंग क्यों नहीं दी जा रही है? ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर को लेकर भी शिकायतें हैं। अभी क्रीमी लेयर की व्यवस्था ओबीसी आरक्षण में ही है। इसे एससी-एसटी आरक्षण में भी लागू करने की मांग की जा रही है, लेकिन उसका विरोध भी हो रहा है।

आरक्षण से असहमत लोगों में भी कई समूह हैं। एक आरक्षण को समाप्त करने की जरूरत जता रहा है तो दूसरा उसमें सुधार की मांग कर रहा है। वर्तमान परिस्थितियों में आरक्षण खत्म होने का तो सवाल ही नहीं और वह अभी होना भी नहीं चाहिए, लेकिन आरक्षण समर्थक इसके भी खिलाफ हैं कि इसका आकलन किया जाए कि आरक्षण से कितनी जातियां लाभान्वित हुईं और वह वंचित लोगों के सामाजिक उत्थान और उन्हें मुख्यधारा में लाने में सहायक सिद्ध हुआ है या नहीं? सामाजिक न्याय की बातें करने वाले नेताओं का तर्क है कि आरक्षण की समीक्षा की मांग करना वस्तुतः उसे खत्म करने का षड़्यंत्र रचना है। कुल मिलाकर आरक्षण के दायरे में आने वाले भी उसे लागू करने के तौर-तरीकों से असहमत हैं और आरक्षण के दायरे से बाहर के लोग तो उसे अपने लिए अन्याय मानते ही हैं।

ऐसे ही कुछ लोगों और विशेषकर युवाओं ने दिल्ली में जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन किया। इसके बाद से आरक्षण को लेकर नए सिरे से बहस शुरू हो गई है। यह स्पष्ट नहीं कि जंतर-मंतर पर जुटे लोग जातिगत आरक्षण खत्म करने की मांग कर रहे हैं या उसे सुधारने की। शायद उनमें दोनों तरह के लोग थे। जो भी हो, इस मुद्दे पर गहन विचार-विमर्श की आवश्यकता है, ताकि आरक्षित तबकों के साथ आरक्षण के विरोध में खड़े लोगों को संतुष्ट किया जा सके और बीच का कोई रास्ता निकाला जा सके। यदि ऐसा नहीं होता तो जातीय वैमनस्य बढ़ने का खतरा है। डिजिटल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्मों पर आरक्षण के कतिपय समर्थकों और विरोधियों के बीच जैसी गाली-गलौज हो रही है, उससे ऐसा लगता है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे के शत्रु हैं। यह सामाजिक एकता के लिए शुभ संकेत नहीं।

मुश्किल यह है कि राजनीतिक दल आरक्षण के मामले में नीर-क्षीर ढंग से विचार-विमर्श करने के लिए तैयार नहीं। यह समझ आता है कि कोई भी दल आरक्षण के खिलाफ नहीं दिखना चाहता, लेकिन कठिनाई यह है कि वे इस पर भी विचार करने के लिए तैयार नहीं कि आरक्षण को प्रभावी तरीके से कैसे लागू किया जाए? यह तब है, जब आरक्षण समर्थकों को ही यह शिकायत है कि उसे प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया जा रहा है। राजनीतिक वर्ग ऐसे प्रश्नों पर विचार करने के लिए भी तैयार नहीं दिखता कि क्या आरक्षण में सुधार की जरूरत है, ताकि पात्र लोगों को ही उसका लाभ देना सुनिश्चित किया जा सके। किसी भी व्यवस्था की समीक्षा में कोई हर्ज नहीं, यदि उसका उद्देश्य उसे और प्रभावी-बेहतर बनाना हो। पता नहीं इससे क्यों बचा जा रहा है। जितना यह सच है कि असमानता दूर करने के लिए आरक्षण की जरूरत है, उतना ही यह भी कि वह सुधार की भी मांग कर रहा है।

(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)