ज्योतिरादित्य सिंधिया। सोमनाथ मंदिर के विध्वंस के एक हजार वर्ष पूर्ण होना हमें उस शाश्वत चेतना का स्मरण कराता है, जिसने सदियों से भारत के आत्मा को पोषित किया। सोमनाथ की यह यात्रा प्रमाण है कि हमारी सभ्यतागत चेतना वह ‘अक्षयवट’ है, जिसे कोई भी आक्रांता नष्ट नहीं कर सका। महमूद गजनवी द्वारा इस पवित्र मंदिर पर किया गया आक्रमण मात्र एक स्थापत्य संरचना पर आघात नहीं, बल्कि वह उस गौरवशाली सभ्यतागत पहचान को नष्ट करने का कुत्सित प्रयास था, जो युगों-युगों से इस पूण्यभूमि को भारत के रूप में परिभाषित करती आई है। वर्ष 1026 का वह घाव गहरा था, जिसने न केवल मंदिर की शिलाओं को खंडित किया, बल्कि राष्ट्रीय आत्मसम्मान को भी चुनौती दी थी। हालांकि समय की धारा ने यह सिद्ध किया कि भारत की सांस्कृतिक चेतना कभी समाप्त नहीं होती।

छत्रपति शिवाजी महाराज के हिंदवी स्वराज्य के संकल्प से लेकर ज्योतिर्लिंगों की मर्यादा की रक्षा तक, यह यात्रा निरंतर जारी रही। स्वराज की इस लौ को छत्रपति शिवाजी महाराज से लेकर मेरे पूर्वज महाराजा महादजी सिंधिया जैसे हजारों योद्धाओं ने अनवरत अपने शौर्य से जलाए रखा। इस ऐतिहासिक अन्याय के विरुद्ध एक सशक्त प्रतिकार अठारहवीं शताब्दी में तब देखने को मिला, जब महाराजा महादजी सिंधिया की शक्ति ने भारत के स्वाभिमान को पुनर्जीवित किया। पानीपत के तृतीय युद्ध (1761) की भीषण त्रासदी के पश्चात, जब महादजी महाराज ने अपने परिवार के सोलह सदस्यों को खोया तो यह मराठाओं की शक्ति के अस्तित्व की कठोर परीक्षा थी।

तब महादजी महाराज ने अदम्य धैर्य, निरंतर संघर्ष और दूरदर्शी रणनीति के बल पर 10 फरवरी, 1771 को दिल्ली के लालकिले पर मराठा-भगवा ध्वज फहराया। यह विजय मात्र एक नगर की प्राप्ति नहीं, बल्कि मराठा-सनातन स्वाभिमान और राजनीतिक प्रभुत्व की पुनः स्थापना का प्रतीक भी थी। वर्ष 1771 से 1803 तक दिल्ली पर सिंधिया वंश का प्रभावी नियंत्रण रहा।

वर्ष 1785 में महाराजा महादजी सिंधिया ने दिल्ली विजय के बाद लाहौर विजय अभियान आरंभ किया। उन्होंने सिखों के साथ रणनीतिक गठबंधन और स्थानीय समर्थन के बल पर सशक्त युद्धनीति अपनाई। 29 मई, 1785 को दिल्ली से भारी तोपखाने के साथ लाहौर की ओर कूच करते हुए उन्होंने अफगान गढ़ी को घेर लिया। जुलाई में हुए लगातार संघर्षों में अफगान सेनापति शाह गुलजार हुसैन, परवेज खान और अशरफ अली मारे गए। मानसून के बाद सितंबर में निर्णायक विजय मिली और मोहम्मद शाह अब्दाली को मराठाओं की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी।

इस विजय के साथ अटक से कटक तक और प्रयागराज से भरूच तक ‘हिंदवी स्वराज्य’ की सुदृढ़ और प्रतिष्ठित स्थापना हुई। 1785 का लाहौर युद्ध महाराजा महादजी सिंधिया की अद्वितीय सैन्य कुशलता का प्रमाण था, जिसने अफगान सेनाओं में भय उत्पन्न किया। उनके शासन में मराठा साम्राज्य अटक से कटक तथा भरूच से प्रयागराज तक विस्तृत हुआ और भगवा ध्वज सर्वत्र लहराया। इस बार लाहौर की धरती पर उन्होंने विजय पताका फहराई और अफगान सेनाओं को सिंधु के पार खदेड़ा। इस युद्ध में महादजी महाराजा ने सदियों पहले 1026 ईस्वी में सोमनाथ पर किए गए उस आघात का वह सभ्यतागत प्रतिशोध लिया, जिसने भारत के आत्मा पर गहरी चोट की थी।

महाराजा महादजी सिंधिया लाहौर में मोहम्मद शाह अब्दाली के महल से वे ऐतिहासिक चांदी के द्वार वापस लेकर आए, जिन्हें गजनवी सोमनाथ से लूटकर ले गया था। उन्होंने भारी सुरक्षा में उन द्वारों को सोमनाथ ज्योतिर्लिंग भेजने की व्यवस्था की, परंतु उन द्वारों के सोमनाथ पहुंचने पर पुजारियों का कहना था कि वर्षों तक विदेशी आक्रांताओं के अधीन रहने के कारण उन्हें पुनः स्थापित नहीं किया जाना चाहिए। इस पर महादजी महाराज ने उन्हें उज्जैन भेजा, जहां गोपाल मंदिर में उन द्वारों की प्रतिष्ठा की गई।

760 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद यह पहला अवसर था जब किसी भारतीय शासक ने सीमाओं के पार जाकर अपनी सांस्कृतिक विरासत को आक्रांताओं के चंगुल से वापस लाने का अदम्य साहस दिखाया। उन द्वारों का भारत लौटना ‘सांस्कृतिक न्याय’ की पुनर्स्थापना थी। 1234–1235 ईस्वी में इल्तुतमिश द्वारा ध्वस्त किए गए महाकाल मंदिर का 1734 में उज्जैन में महादजी महाराज के पिता महाराजा राणोजीराव सिंधिया द्वारा शून्य से पुनर्निर्माण कराया गया और आगे चलकर स्वयं महादजी महाराज ने उसे भव्यता एवं गौरव का स्वरूप प्रदान किया। यही वह वैचारिक भूमि थी, जिसने सोमनाथ के गौरव को सहेजने का आधार तैयार किया।

स्वतंत्रता के बाद सोमनाथ का पुनर्निर्माण आधुनिक भारत के आत्मविश्वास का प्रखर चेहरा बना। 12 नवंबर, 1947 को लौहपुरुष सरदार पटेल ने सोमनाथ के पुनरुद्धार का ऐतिहासिक संकल्प लिया। सोमनाथ ट्रस्ट के संस्थापकों में से एक केएम मुंशी के प्रयासों और भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद के सान्निध्य में 11 मई, 1951 को जब ज्योतिर्लिंग की प्राण-प्रतिष्ठा हुई, तो दुनिया ने देखा कि भारत अब अपनी सभ्यतागत जड़ों से विमुख नहीं होगा। सोमनाथ आंदोलन से प्रेरणा लेकर 1990 में राम-रथ यात्रा सोमनाथ से आरंभ हुई और 10,000 किलोमीटर की यात्रा तय करते हुए अयोध्या की ओर बढ़ी। इस ऐतिहासिक यात्रा के उद्घाटन में मेरी आजी अम्मा राजमाता विजयाराजे सिंधिया का योगदान भी रहा है, मानो इतिहास स्वयं अपनी निरंतरता को साक्षात अनुभव कर रहा हो।

सोमनाथ कारिडोर का निर्माण इस सत्य का साक्ष्य है कि हम अपनी आस्था के केंद्रों को न केवल सुरक्षित कर रहे हैं, बल्कि उन्हें दुनिया के सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक केंद्रों के रूप में प्रतिष्ठित भी कर रहे हैं। पिछले 11 वर्षों में सोमनाथ से लेकर राम जन्मभूमि तक जो कायाकल्प हुआ है, वह इस बात का प्रतीक है कि भारत अब अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करने वाला एक आत्मविश्वास से परिपूर्ण राष्ट्र बन चुका है। सोमनाथ की यह एक हजार वर्ष की यात्रा हमें सिखाती है कि स्मृतियां कभी मिटती नहीं और सच्ची आस्था कभी हारती नहीं।

(लेखक केंद्रीय संचार एवं उत्तर पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्री हैं)