संजय गुप्त। नए वर्ष का आगमन होते ही एक अप्रत्याशित घटनाक्रम में अमेरिकी सेना वेनेजुएला पर हमला कर वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनकी पत्नी समेत उठाकर अमेरिका ले आई। विश्व को हैरान करने वाली इस घटना को पहले तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति के कथित संरक्षण में चल रहे नारकोटिक्स आतंक से जोड़ा, लेकिन शीघ्र ही यह स्पष्ट हो गया कि इस हमले का मूल उद्देश्य वेनेजुएला के तेल भंडारों पर कब्जा करना था।

वेनेजुएला में कच्चे तेल के सबसे अधिक भंडार हैं। ट्रंप ने जिस तरह यह कहा कि अब वेनेजुएला के तेल को अमेरिका बेचेगा और वहां की अंतरिम राष्ट्रपति को उनका सहयोग करना होगा, उससे साफ है कि अमेरिकी राष्ट्रपति दादागीरी पर उतर आए हैं। वे संयुक्त राष्ट्र चार्टर के साथ अंतरराष्ट्रीय नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। इसकी कल्पना करना कठिन था कि लोकतंत्र की दुहाई देने वाला अमेरिका किसी देश के राष्ट्रपति का अपहरण कर लेगा, लेकिन ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने ऐसा ही किया।

यह चोरी और सीनाजोरी ही है। अमेरिका ऐसी हरकतें पहले भी करता रहा है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद से उसने अपने संकीर्ण स्वार्थों को पूरा करने के लिए अनेक देशों पर हमले किए अथवा वहां छल-छद्म से तख्तापलट कराया। इस कोशिश में उसे कई बार मुंह की खानी पड़ी, लेकिन वह सबक सीखने को तैयार नहीं। अमेरिका को वियतनाम में मात मिली।

इसके बाद अफगानिस्तान, इराक और लीबिया में भी वह वैसा कुछ नहीं कर सका, जिसका दावा कर उसने इन देशों पर हमला किया था। वह इन देशों में कुल मिलाकर नाकाम ही रहा। उसकी इस नाकामी का दुष्परिणाम इन देशों ने अस्थिरता और अशांति के रूप में देखा।

वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले की विश्व के अनेक देशों ने निंदा की, लेकिन कई देश ऐसे भी रहे, जिन्होंने ट्रंप की सैन्य कार्रवाई का समर्थन किया अथवा जो मौन बने रहे। चूंकि अमेरिका एक बड़ी आर्थिक एवं सैन्य शक्ति है, इसलिए कोई भी देश एक सीमा से अधिक उसका विरोध करने की स्थिति में नहीं। ट्रंप इसी का लाभ उठाकर मनमानी कर रहे हैं। उनके बेलगाम होने का एक कारण यह है कि उसे चुनौती दे सकने वाला रूस यूक्रेन युद्ध में उलझा है।

करीब चार साल पहले यूक्रेन पर रूस का हमला उसकी मनमानी ही था। लगता है उसकी इस हरकत ने ट्रंप को भी मनमानी करने का मौका दिया। अब वे बेलगाम हैं। वेनेजुएला पर हमले के बाद वे डेनमार्क के स्वायत्तशासी क्षेत्र ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की बात कर रहे हैं। ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है। ट्रंप इस बहाने ग्रीनलैंड पर कब्जा करना चाहते हैं कि उस पर रूस और चीन की निगाह है। उनका कहना है कि अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए ग्रीनलैंड अमेरिका का हिस्सा होना चाहिए।

ग्रीनलैंड में अकूत प्राकृतिक संपदा है, जिसका अभी तक दोहन नहीं किया गया है। अमेरिका के अंदर यह विचार पहले भी रहा है कि जिस तरह अलास्का उसके नियंत्रण में आया, उसी तरह ग्रीनलैंड भी आए। ट्रंप उस पर सैन्य कार्रवाई के जरिये कब्जा करने के अलावा उसे खरीदने की बात भी कह रहे हैं। हालांकि वहां के लोग इसका विरोध कर रहे हैं, लेकिन वे बेपरवाह हैं। उन्हें डेनमार्क के साथ यूरोपीय देशों की नाराजगी की भी चिंता नहीं, जबकि वे नाटो के भविष्य को खतरे में बता रहे हैं।

ट्रंप किस तरह अहंकार से भरे हुए हैं, इसका पता उनके इस कथन से चलता है कि उनकी आक्रामकता को सिर्फ वही रोक सकते हैं और अमेरिकी हितों के आगे किसी अंतरराष्ट्रीय नियम-कानून का कोई महत्व नहीं। यह तानाशाही वाला रवैया है। ट्रंप आक्रामक रणनीति पर इसलिए चल रहे हैं, क्योंकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था बुरे दौर से गुजर रही है। उसे पटरी पर लाने के लिए उन्होंने अमेरिका आयात होने वाली वस्तुओं पर टैरिफ बढ़ा दिया है।

उनका दावा है कि उनकी टैरिफ नीति से अमेरिका की आय बढ़ी है, लेकिन सच्चाई कुछ और है। ट्रंप इसलिए भी बौखलाए हुए हैं, क्योंकि डॉलर का प्रभुत्व कमजोर हो रहा है। डॉलर का प्रभुत्व तब बढ़ना शुरू हुआ, जब अमेरिका ने 1970 के दशक में सऊदी अरब से समझौता किया कि तेल का व्यापार डालर में होगा। इससे अमेरिका को लाभ मिला और डॉलर का प्रभुत्व बढ़ा, लेकिन बीते कुछ वर्षों में वह टूटा है। इसका कारण दुनिया के कई देशों का डॉलर से इतर मुद्रा में व्यापार करना है।

रूस, वेनेजुएला, ईरान आदि देश तो अपना तेल डॉलर के बजाय अन्य मुद्रा में बेच रहे हैं। अमेरिका से आजिज आए कई देश डॉलर के बजाय अन्य मुद्रा में व्यापार करने की राह तलाश रहे हैं। ट्रंप को यह रास नहीं आ रहा है। उन्हें लगता है कि वे दुनिया को धमकाकर उसे डॉलर में व्यापार करने के लिए मजबूर कर लेंगे, लेकिन इसके उलटे नतीजे आएं तो हैरानी नहीं।

ट्रंप ने हाल में उस विधेयक को सहमति दी, जो उन्हें उन देशों पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने की अनुमति देगा, जो रूस से तेल खरीदते हैं। इन देशों में चीन, भारत और ब्राजील प्रमुख हैं। ट्रंप का मानना है कि रूस से तेल खरीदने वाले देश उसे यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी रखने में मदद कर रहे हैं। यदि ट्रंप रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर सचमुच 500 प्रतिशत टैरिफ लगाते हैं, तो इससे भारत समेत अन्य देशों की कठिनाई बढ़ जाएगी। ट्रंप ने भारत पर पहले ही सबसे अधिक 50 प्रतिशत टैरिफ लगा रखा है।

इसमें 25 प्रतिशत व्यापार समझौता न हो पाने और 25 प्रतिशत रूस से तेल खरीदने के कारण है। ट्रंप प्रधानमंत्री मोदी को महान नेता और अपना दोस्त तो बताते हैं, पर उनके प्रति अशालीन भाषा का प्रयोग करने से भी नहीं हिचकते। वे ऐसा इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि मोदी उनकी मनमानी के समक्ष झुकने को तैयार नहीं। ट्रंप अपनी मनमानी से दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने में लगे हैं। उनकी मनमानी के कारण संयुक्त राष्ट्र आप्रसंगिक हो गया है।

हालांकि अमेरिका में अनेक जाने-माने लोग यह चेता रहे हैं कि उनकी मनमानी के दुष्परिणाम अमेरिका को उनके सत्ता से हटाने के बाद भी भोगने पड़ेंगे, लेकिन वे किसी की सुनने के लिए तैयार नहीं।